मध्य प्रदेश के विंध्य अंचल के ग्रामीण घरों में सदियों पुरानी खानपान की परंपराएं आज भी पूरी सादगी और स्वाद के साथ जीवित हैं। बघेली इंद्रहार इसी समृद्ध विरासत का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे ग्रामीण इलाकों में बड़े चाव से बनाया और खाया जाता है। यह खास पकवान कई प्रकार की दालों के पोषण और भाप की धीमी आंच पर तैयार होता है, जिसके चलते इसे पेट के लिए बेहद हल्का और प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत माना जाता है।
चार दालों का पोषण और बघेलखंड की पहचान
बघेलखंड अपनी प्राचीन परंपराओं, प्राकृतिक संपदा और ऐतिहासिक धरोहरों के अलावा अपने ठेठ देसी खानपान के लिए भी जाना जाता है। बघेली इंद्रहार इस इलाके की पाक कला का एक प्रमुख हिस्सा है। इसे तैयार करने के लिए मूंग दाल, उड़द दाल, मसूर दाल और चना दाल को एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है। चारों दालों का यह अनूठा संगम न सिर्फ इसके स्वाद को अलग बनाता है, बल्कि शरीर को प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व भी उपलब्ध कराता है।
मसालों का अनूठा मेल और तैयारी का तरीका
रीवा जिले के रायपुर कर्चुलियान की रहने वाली अलका सिंह करचूली बताती हैं कि इंद्रहार बनाने की प्रक्रिया एक दिन पहले से शुरू होती है। सबसे पहले चारों दालों को रात भर या पूरे एक दिन के लिए साफ पानी में भिगोकर रखा जाता है। अच्छी तरह फूल जाने के बाद इन दालों को पीसकर एक गाढ़ा और चिकना पेस्ट बना लिया जाता है। इसके बाद इस मिश्रण में डोडा, कुटी हुई काली मिर्च, स्वादानुसार नमक, हींग और चैली पत्ता जैसे पारंपरिक मसाले मिलाए जाते हैं। यह देसी मसाला मिश्रण टिक्कियों को एक खास सौंधी खुशबू और गहरा स्वाद देता है।
चूल्हे की आंच और भाप पर पकाने की देसी विधि
अलका सिंह के मुताबिक, गांवों में आज भी इस व्यंजन को मिट्टी के पारंपरिक चूल्हे पर ही बनाया जाता है। इसे पकाने की तकनीक भी काफी अनोखी है। एक बड़े भगोने में पानी भरकर उसे चूल्हे पर उबलने के लिए रखा जाता है। जब पानी से तेज भाप निकलने लगती है, तो बर्तन के मुंह पर सूखी घास बिछा दी जाती है। तैयार दाल के पेस्ट से छोटी-छोटी गोल टिक्कियां बनाई जाती हैं और उन्हें इस घास के ऊपर सलीके से रख दिया जाता है। बर्तन को ढककर करीब 10 से 12 मिनट तक भाप में पकाया जाता है, जिससे दाल अंदर तक अच्छी तरह पक जाती है।
परोसने का अंदाज और कढ़ी-सब्जी में प्रयोग
मूल रूप से इंद्रहार को पूरी तरह भाप में पकाकर बिना तेल में तले ही सीधे खाया जाता है। हालांकि, स्वाद में विविधता लाने के लिए कुछ लोग इन उबली हुई टिक्कियों को तवे या कड़ाही में हल्का तलकर कुरकुरा बना लेते हैं। खाने की थाली में इसे ताजी पिसी टमाटर की चटनी या दही की चटनी के साथ परोसा जाता है। समय के साथ इसके इस्तेमाल में भी नए प्रयोग जुड़े हैं; अब कई घरों में इंद्रहार की टिक्कियों को कढ़ी या ग्रेवी वाली सब्जी में डालकर भी पकाया जाने लगा है। बघेलखंड के कई देहाती परिवारों में यह पारंपरिक व्यंजन आज भी आम दिनचर्या का हिस्सा है, जहां इसे हर एक से दो महीने के अंतराल पर बड़े उत्साह के साथ बनाया जाता है।



















