आधुनिक रसोई में समय बचाने के लिए प्रेशर कुकर पहली पसंद बन चुका है, लेकिन कई बार पानी का अनुपात बिगड़ते ही चावल चिपचिपे या जरूरत से ज्यादा गल जाते हैं। दशकों पहले जब रसोई में कुकर का चलन नहीं था, तब घरों में चावल पकाने के लिए पतीले या बड़े भगोने का उपयोग किया जाता था। इस पारंपरिक विधि की खासियत यह थी कि इसमें प्रत्येक दाना अलग और खिला-खिला बनता था, साथ ही चावल का अतिरिक्त मांड भी अलग हो जाता था। चंद्रवती के अनुसार, पहले के दौर में हर घर में इसी खुले बर्तन वाली व्यवस्था से रोजाना भात तैयार किया जाता था।
चावल की धुलाई और भिगोने की सही तैयारी
पारंपरिक विधि से भात तैयार करने की शुरुआत अनाज की सफाई से होती है। चावल को साफ करने के बाद उसे 3 से 4 बार साफ पानी से अच्छी तरह धोया जाता है, जिससे ऊपरी गंदगी और अतिरिक्त सतही पाउडर साफ हो जाए। इसके बाद अनाज को कुछ देर के लिए पानी में भिगोकर छोड़ दिया जाता है। पानी में भिगोने की इस प्रक्रिया से दाने नमी सोख लेते हैं, जिसके कारण पकने के दौरान वे जल्दी नरम होते हैं और समान रूप से फूलते हैं।
उबलते पानी में पकाने का पारंपरिक तरीका
भीगने के बाद अगले चरण में एक बड़े पतीले या भगोने में चावल की मात्रा से काफी अधिक पानी लेकर चूल्हे या गैस पर चढ़ाया जाता है। जब बर्तन का पानी पूरी तरह खौलने लगे और उसमें तेज उबाल आ जाए, तब पहले से धोकर रखे गए चावल उसमें डाले जाते हैं। इसके बाद चूल्हे की आंच को मध्यम स्तर पर कर दिया जाता है ताकि पानी धीमी गति से उबलता रहे। पकने की इस प्रक्रिया के दौरान बीच-बीच में चम्मच या करछी से हल्के हाथों चलाना जरूरी होता है, जिससे अनाज के दाने बर्तन की तली में चिपककर जलें नहीं।
उंगलियों से जांच और मांड अलग करने का चरण
चावल पूरी तरह तैयार हुए हैं या नहीं, इसे जांचने का तरीका भी बेहद सरल और सटीक था। उबलते बर्तन से एक या दो दाने बाहर निकालकर उंगलियों के बीच दबाकर देखा जाता है। यदि दाना आसानी से दब जाए और बीच में कोई सख्त कच्चापन महसूस न हो, तो समझ लिया जाता है कि चावल पक चुका है। इसके तुरंत बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया आती है, जिसे मांड निकालना कहा जाता है। पतीले को कपड़े या संडासी से सावधानीपूर्वक पकड़कर उसका अतिरिक्त खौलता पानी किसी दूसरे बर्तन में उड़ेलकर अलग कर दिया जाता है। इस पानी को ही मांड कहा जाता है, जिसके जरिए चावल में मौजूद अतिरिक्त स्टार्च का एक बड़ा हिस्सा बाहर निकल जाता है।
अंतिम भाप और दानों को खिलाने का राज
मांड पूरी तरह निकाल देने के बाद बर्तन को तुरंत बंद करके नहीं छोड़ा जाता था। चंद्रवती बताती हैं कि मांड निकालने के बाद पतीले को 1 से 2 मिनट के लिए बेहद धीमी आंच पर वापस चूल्हे पर रखा जाता था। इस हल्की आंच की गर्मी से चावल के भीतर बची हुई अतिरिक्त नमी भाप बनकर उड़ जाती है, जिससे चावल आपस में चिपकने के बजाय एकदम खिले-खिले हो जाते हैं। इसके बाद आंच बंद कर दी जाती है और बर्तन को कुछ मिनट के लिए ढक्कन से ढककर आराम दिया जाता है, जिससे भात पूरी तरह परोसने योग्य बन जाता है।
खुले बर्तन में पकाने की उपयोगिता
खुले बर्तन में भोजन तैयार करने में कुकर की तुलना में थोड़ा अतिरिक्त समय अवश्य खर्च होता है, लेकिन इसमें दानों की स्थिति को आंखों से सीधे देखकर सही समय पर चूल्हा बंद करने की पूरी सुविधा रहती है। आज जल्दबाजी के दौर में प्रेशर कुकर बेहद सुविधाजनक उपकरण बन चुका है, लेकिन यदि कभी कुकर खराब हो जाए या अनुपलब्ध हो, तो दादी-नानी का यह पुराना देसी नुस्खा बेहद स्वादिष्ट और दानेदार चावल बनाने में पूरी तरह मददगार साबित होता है।



















