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मेहनत की मिसाल: बुरहानपुर में पांच साल हुनर सीखकर शुरू किए दो फूड स्टॉल, पांच अन्य लोगों को भी दिया सहाराखानपान
3 अक्तू॰ 2026, 8:25 pm (1 घंटे पहले)· 0

मेहनत की मिसाल: बुरहानपुर में पांच साल हुनर सीखकर शुरू किए दो फूड स्टॉल, पांच अन्य लोगों को भी दिया सहारा

मजदूरी के दिनों में खाना बनाने की कला सीखने वाले बुरहानपुर के रवि ने इंदिरा कॉलोनी में अपना काम खड़ा किया और अब दो स्टॉल चलाकर पांच लोगों को रोजगार दे रहे हैं।

कठिन परिस्थितियों के बीच अपने हुनर पर भरोसा करके इंसान किस तरह अपनी तकदीर बदल सकता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में देखने को मिला है। मजदूरी का काम करते हुए रवि को भोजन पकाने के काम को नजदीक से देखने और समझने का अवसर प्राप्त हुआ था। इसी दौरान उनका रुझान इस दिशा में बढ़ा और उन्होंने तकरीबन पांच वर्षों का लंबा समय देकर विभिन्न प्रकार के व्यंजन तैयार करने की बारीकियां पूरी लगन के साथ सीखीं। इस कला में पूरी तरह पारंगत होने के बाद उन्होंने किसी अन्य के अधीन काम करने के बजाय स्वयं का उद्यम खड़ा करने का संकल्प लिया।

सीमित साधनों के बीच इंदिरा कॉलोनी से शुरुआत

व्यापार की शुरुआत करना रवि के लिए कतई सरल नहीं था, क्योंकि उस समय उनके पास संसाधन बेहद सीमित थे। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद उन्होंने बुरहानपुर के इंदिरा कॉलोनी इलाके में जय अंबे चाइनीज के नाम से अपना छोटा सा स्टॉल स्थापित किया। शुरुआती दिनों में नए ग्राहकों का भरोसा जीतना और रोजमर्रा के खर्चे निकालकर दुकान को मजबूती से चलाना बेहद मुश्किल साबित हो रहा था। कई तरह की व्यावहारिक दिक्कतों के बाद भी उन्होंने कभी धैर्य नहीं खोया। निरंतर परिश्रम और अपने काम के प्रति ईमानदारी के कारण धीरे-धीरे उनके हाथ के बने व्यंजनों का स्वाद इलाके के लोगों की जुबान पर चढ़ने लगा।

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स्वादिष्ट व्यंजन, किफायती दाम और बढ़ता कारोबार

लगातार प्रयासों का सुखद परिणाम यह निकला कि आज रवि सफलतापूर्वक दो अलग-अलग स्टॉल संभाल रहे हैं। उनके प्रतिष्ठान पर ग्राहकों के लिए व्यंजनों के कई बेहतरीन विकल्प उपलब्ध रहते हैं। किफायती दरें और शानदार गुणवत्ता होने के कारण प्रतिदिन बड़ी संख्या में ग्राहक उनके स्टॉल पर खान-पान का आनंद लेने पहुंचते हैं। अपने स्वाद और सेवा के दम पर उन्होंने शहर के इस क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

खुद के साथ पांच अन्य लोगों को बनाया आत्मनिर्भर

रवि की इस व्यावसायिक यात्रा की सबसे प्रेरक बात यह है कि उन्होंने स्वयं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने तक ही अपनी सफलता को सीमित नहीं रखा। उन्होंने अपने भाई को भी इस काम की पूरी ट्रेनिंग दी, जिससे वह आत्मनिर्भर बनकर आज कारोबार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटा रहे हैं। इसके साथ ही वर्तमान में उनके दोनों प्रतिष्ठानों पर करीब पांच अन्य व्यक्ति नियमित रूप से काम कर रहे हैं। इस तरह एक समय मजदूरी करने वाला युवा आज दूसरों को आजीविका प्रदान करने वाला रोजगार प्रदाता बनकर समाज के सामने खड़ा है।

सवाल-जवाब

रवि ने खाना बनाने का काम कब और कैसे सीखा?
मजदूरी करने के दौरान उन्हें यह काम देखने और समझने का मौका मिला, जिसके बाद उन्होंने करीब पांच साल तक इसे सीखा।
रवि ने अपना पहला फूड स्टॉल किस नाम से और कहां शुरू किया था?
उन्होंने बुरहानपुर की इंदिरा कॉलोनी में 'जय अंबे चाइनीज' नाम से अपना पहला स्टॉल शुरू किया था।
शुरुआती दिनों में उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
सीमित संसाधनों के कारण उन्हें ग्राहकों को जोड़ने और स्टॉल के दैनिक संचालन को सुचारू बनाए रखने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
वर्तमान में रवि कितने स्टॉल चलाते हैं और कितने लोगों को काम दे रहे हैं?
वह वर्तमान में दो स्टॉल संचालित कर रहे हैं और उनके साथ करीब पांच लोग काम कर रहे हैं।
व्यवसाय में उनके भाई की क्या भूमिका है?
रवि ने अपने भाई को भी यह काम सिखाया है, जिससे वह आत्मनिर्भर होकर कारोबार में हाथ बंटा रहे हैं।
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