मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला अब तक अपने घने जंगलों, तांबे और मैंगनीज की खदानों के अलावा चिन्नौर चावल के लिए विख्यात रहा है। पूरे प्रदेश में सबसे अधिक धान उत्पादन करने वाले इस जिले के देसी चिन्नौर चावल को वर्ष 2022 में जीआई टैग यानी भौगोलिक संकेतक प्राप्त हुआ था। अब इस जिले की पहचान में एक नया अध्याय जुड़ गया है, क्योंकि यहां के पारंपरिक खानपान 'भट्टा-भात' को सरकारी स्तर पर एक जिला-एक भोजन सूची में शामिल किया गया है। यह फैसला स्थानीय स्वाद और खानपान परंपरा को प्रदेश भर में एक नई पहचान दिलाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
जिले की सांस्कृतिक जड़ों और संस्कारों से जुड़ा भोजन
बालाघाट में भट्टा-भात केवल रोजमर्रा का भोजन नहीं है, बल्कि यह यहां की समृद्ध सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। इस क्षेत्र में वैवाहिक रिश्तों की शुरुआत इसी पारंपरिक दावत से होती है। जब भी किसी परिवार में विवाह का रिश्ता तय होता है, तो सबसे पहली रस्म भट्टा-भात खिलाने की आयोजित की जाती है। स्थानीय समाज में यह कहावत आम है कि भट्टा-भात हो गया, जिसका सीधा अर्थ होता है कि रिश्ता पक्का हो चुका है। शादी-ब्याह के अतिरिक्त, जन्म से लेकर मरण तक आयोजित होने वाले विभिन्न पारिवारिक और सामाजिक आयोजनों में भी अतिथियों को आदरपूर्वक भट्टा-भात ही परोसा जाता है। इन रस्मों के बिना स्थानीय स्तर पर कोई भी बड़ा सामाजिक आयोजन अधूरा समझा जाता है।
कछारों और तालाबों के किनारे साल भर होती है विशेष बैंगन की पैदावार
इस व्यंजन में इस्तेमाल होने वाला भट्टा यानी बैंगन अपनी रंगत और बनावट में सामान्य बैंगन से काफी अलग होता है। यह न तो पूरी तरह हरा होता है और न ही केवल बैंगनी, बल्कि यह हरे और बैंगनी रंग का एक अनूठा मिश्रण लिए होता है। इस विशेष किस्म की पैदावार मुख्य रूप से नदियों के मुहाने पर बनने वाली कछार भूमि और तालाबों के किनारों पर की जाती है। बालाघाट के स्थानीय बाजारों में इस बैंगन की निरंतर भारी मांग बनी रहती है, जिसके चलते आसपास के जिलों और पड़ोसी राज्यों में भी इसकी नियमित आपूर्ति की जाती है। जिले के भीतर यह सब्जी साल के बारहों महीने उपलब्ध रहती है। इसकी व्यापक खेती किरनापुर के कछारों, बालाघाट शहर से लेकर खैरलांजी तक नदी के तटवर्ती हिस्सों, किरनापुर-लांजी क्षेत्र के कछारों के साथ-साथ वारासिवनी, कटंगी और परसवाड़ा के तमाम ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर की जाती है।
रसोई में ऐसे तैयार करें पारंपरिक भट्टा की सब्जी
इस पारंपरिक व्यंजन को घर पर पकाना बेहद सरल है। सबसे पहले चूल्हे पर रखी कढ़ाई में सरसों का तेल गर्म किया जाता है और उसमें जीरे का तड़का लगाया जाता है। इसके बाद बारीक कटा प्याज तथा अदरक-लहसुन का पेस्ट डालकर धीमी आंच पर भूनते हैं। जब मसाला हल्का पक जाए, तब इसमें कटे हुए विशेष भट्टे डाले जाते हैं। थोड़ी देर पकने के बाद इसमें कटे हुए टमाटर और बुनियादी सूखे मसाले मिलाकर अच्छी तरह चलाएं। मसालों के रच-बस जाने के बाद ग्रेवी तैयार करने के लिए आवश्यकतानुसार थोड़ा पानी डाला जाता है। लगभग 20 मिनट के भीतर यह सब्जी पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है। चूल्हे से उतारने से ठीक पहले इसमें ताजी कटी हरी धनिया पत्ती मिलाई जाती है। इसे गरमा-गरम भात यानी पके हुए चावल के साथ परोसा जाता है, जिससे इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है।
स्वाद के साथ सेहत के लिए भी लाभकारी गुण
स्वाद के अलावा भट्टा-भात पौष्टिकता के लिहाज से भी काफी फायदेमंद माना जाता है। इस पारंपरिक भोजन से शरीर को जरूरी प्रोटीन प्राप्त होता है, जो मांसपेशियों और शारीरिक मजबूती के लिए आवश्यक है। यह सब्जी शुगर यानी रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखने में भी मददगार साबित होती है। इसमें उच्च मात्रा में फाइबर मौजूद होता है, जिससे पाचन तंत्र दुरुस्त रहता है और पेट संबंधी समस्याओं से राहत मिलती है। साथ ही, इस बैंगन में प्रचुर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो दिल की सेहत को बेहतर बनाए रखने और हृदय रोगों से बचाव में सहायक भूमिका निभाते हैं।


















