उत्तरी आयरलैंड के एंट्रिम काउंटी में जहां अटलांटिक की तेज हवाएं बेसाल्ट की विशाल चट्टानों से टकराती हैं, वहीं बश नदी के किनारे बसा है एक छोटा सा शांत कस्बा बशमिल्स। इसी ऐतिहासिक कस्बे में जौ से बनाई जाने वाली दुनिया की सबसे पहली लाइसेंसशुदा व्हिस्की का जन्म हुआ था। पिछले 400 से अधिक सालों से यहां की डिस्टिलरी लगातार काम कर रही है। इस लाजवाब पेय को बनाने के पीछे एक बेहद दिलचस्प कहानी और सदियों पुराना नायाब तरीका छिपा हुआ है।
'जीवन के जल' से व्हिस्की बनने का सफर
साल 1276 में सर रॉबर्ट सावेज नाम के एक योद्धा ने युद्ध में जाने से पहले अपने सैनिकों को एक्वा विते पिलाया था, जिसे उस समय 'जीवन का जल' कहा जाता था। यही एक्वा विते आगे चलकर उस्के बीथा और आखिरकार व्हिस्की के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस इलाके में शराब बनाने की परंपरा आधिकारिक कागजातों से भी कई सदियों पुरानी है।
20 अप्रैल 1608 को इंग्लैंड के राजा जेम्स ने यहां के जमींदार सर थामस फिलिप्स को बशमिल्स क्षेत्र में शराब बनाने का एक शाही लाइसेंस दिया था। उस दौर में किसानों के बीच गैर कानूनी तरीके से घर में शराब बनाना एक बेहद लोकप्रिय शगल बन चुका था, जिससे सरकार को कोई राजस्व नहीं मिल पाता था। इसी कर चोरी को रोकने और राजस्व वसूलने के लिए राजा जेम्स ने यह ऐतिहासिक कदम उठाया। यह लाइसेंस सात सालों के लिए वैध था, जिसमें सर थामस फिलिप्स को एक्वा विते, उस्काबैग और एक्वा कंपोसिता जैसी शराब बनाने और बेचने का अधिकार मिला। यही कारण है कि आज भी बशमिल्स की हर बोतल के लेबल पर '1608' का साल गर्व से छपा दिखाई देता है।
जब टैक्स से बचने के लिए दूसरों ने बदली राह, पर बशमिल्स अड़ा रहा
साल 1784 में ओल्ड बशमिल्स डिस्टिलरी को आधिकारिक तौर पर रजिस्टर कराया गया और इसका ट्रेडमार्क तैयार किया गया। तांबे का बना पारंपरिक भट्टी नुमा बर्तन, जिसे 'पॉट स्टिल' कहा जाता है, पिछले 300 सालों से इस ब्रांड का स्थायी प्रतीक चिन्ह बना हुआ है।
19वीं सदी के मध्य में जब ब्रिटिश सरकार ने डिस्टिलरी पर माल्ट टैक्स लगाया, तो अधिकांश आयरिश कंपनियों ने इस भारी कर से बचने के लिए जौ का इस्तेमाल बंद कर दिया और मकई या अन्य सस्ते अनाजों से शराब बनाने लगीं। लेकिन बशमिल्स ने अपनी परंपरा से समझौता नहीं किया और शुद्ध माल्ट व्हिस्की ही बनाती रही। यही जिद आगे चलकर उसकी सबसे बड़ी और अनोखी यूएसपी बन गई।
इसके बाद साल 1885 में एक भीषण अग्निकांड में पुरानी बशमिल्स की पूरी इमारत जलकर खाक हो गई। लेकिन इस डिस्टिलरी का सफर यहीं खत्म नहीं होना था। दुनिया भर में इसकी मांग इतनी जबरदस्त थी कि हादसे के तुरंत बाद इसे नए सिरे से तैयार किया गया और पूरी क्षमता के साथ उत्पादन फिर से शुरू हो गया।
समंदर पार का सफर और प्रतिबंधों से मुकाबला
साल 1890 में इस डिस्टिलरी के अपने मालवाहक जहाज 'एसएस बशमिल्स' ने अटलांटिक महासागर को पार कर अमेरिका की ओर अपना पहला कदम बढ़ाया। इस जहाज के जरिए पहली खेप फिलाडेल्फिया और न्यू यॉर्क सिटी पहुंचाई गई। इसके बाद यह ब्रांड सिंगापुर, हांगकांग, शंघाई और जापान के योकोहामा जैसे बड़े शहरों तक जा पहुंचा।
साल 1920 में जब अमेरिका में शराबबंदी कानून लागू हुआ, तो पूरे आयरिश व्हिस्की उद्योग को बड़ा झटका लगा। लेकिन बशमिल्स के तत्कालीन डायरेक्टर विल्सन बॉयड ने भांप लिया था कि यह प्रतिबंध लंबे समय तक नहीं टिकेगा। उन्होंने व्हिस्की का भारी स्टॉक तैयार रखना शुरू कर दिया, ताकि पाबंदी हटते ही अमेरिकी बाजार पर कब्जा किया जा सके। उनकी यह दूरदर्शिता बेहद कारगर साबित हुई।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी इस ब्रांड को काफी नुकसान उठाना पड़ा। बेलफास्ट में स्थित इसके मुख्य कार्यालय और गोदामों पर जर्मन बमबारी हुई, जिसमें कई ऐतिहासिक दस्तावेज और कीमती स्टॉक पूरी तरह नष्ट हो गए। इसके बावजूद कंपनी ने युद्ध में मदद की और अमेरिकी सैनिकों को ठहराने के लिए अपनी फैक्टरी का उत्पादन धीमा कर दिया था। आज फिल्मों, गानों और प्रसिद्ध टीवी शोज़ में इस ब्रांड की उपस्थिति इसकी गहरी सांस्कृतिक पकड़ को दर्शाती है।
तीन बार डिस्टिलेशन और ज्वालामुखीय पानी का जादू
बशमिल्स का स्वाद केवल इसकी उम्र की वजह से नहीं, बल्कि इसके निर्माण की खास तकनीक के कारण अनूठा है। इसके लिए पानी सीधे बश नदी से लिया जाता है, जो सदियों पुरानी बेसाल्ट यानी ज्वालामुखीय चट्टानों के ऊपर से बहकर आता है। ये चट्टानें पानी को एक खास मिनरल बैलेंस देती हैं, जो व्हिस्की के स्वाद को लाजवाब बना देता है।
इसकी सभी सिंगल माल्ट व्हिस्की को पारंपरिक तांबे के पॉट स्टिल में तीन बार डिस्टिल किया जाता है। गौरतलब है कि ज्यादातर स्कॉच व्हिस्की केवल दो बार ही डिस्टिल की जाती हैं, लेकिन यह तीसरी बार की अतिरिक्त प्रक्रिया ही बशमिल्स को उसका बेहद स्मूद और अनोखा स्वाद प्रदान करती है। ट्रेंडकिया के अनुसार, यह पूरी तरह से 100 प्रतिशत आयरिश माल्टेड जौ से तैयार की जाती है। इसकी सालाना उत्पादन क्षमता लगभग 90 लाख लीटर है, जो इसे आयरलैंड की दूसरी सबसे बड़ी व्हिस्की डिस्टिलरी बनाती है। आपको बता दें कि सदियों पुराना इतिहास समेटे हुए यह प्रतिष्ठित ब्रांड आज भारत में भी आसानी से मिल जाता है।
'द ग्रे लेडी' का रहस्यमयी साया
इस ऐतिहासिक डिस्टिलरी के साथ एक बेहद डरावनी और रहस्यमयी कहानी भी जुड़ी हुई है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां "द ग्रे लेडी" नाम की एक भटकती हुई आत्मा का वास है। लोककथाओं के अनुसार, डिस्टिलरी के ठीक सामने रहने वाले एक बुजुर्ग दंपत्ति, जॉर्ज और मार्गरेट में से एक दिन जॉर्ज अपने पालतू कुत्ते को टहलाने निकले थे, लेकिन कभी वापस नहीं आए। मार्गरेट ने अपनी आखिरी सांस तक डिस्टिलरी और उसके आसपास के इलाके में अपने पति की तलाश की। आज भी वहां आने वाले पर्यटकों और कर्मचारियों को अचानक अत्यधिक ठंड महसूस होने और ताले लगे दरवाजों के खुद-ब-खुद खुल जाने जैसे अजीबोगरीब अनुभवों का सामना करना पड़ता है।













