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शिवपुरी में लकड़ी की आंच पर 15 साल से बनते ‘ग्वालियर वाले मामा’ के पकौड़ों की दीवानगी, बिना बोर्ड जुटती है भीड़खानपान
6 सित॰ 2026, 3:02 pm (27 मिनट पहले)· 2

शिवपुरी में लकड़ी की आंच पर 15 साल से बनते ‘ग्वालियर वाले मामा’ के पकौड़ों की दीवानगी, बिना बोर्ड जुटती है भीड़

शिवपुरी के फिजिकल क्षेत्र में एक छोटी सी ठेला दुकान बीते 15 साल से बिना किसी बोर्ड या प्रचार के सिर्फ अपने स्वाद के दम पर मशहूर है, जहां लकड़ी की आंच पर बने आलू-ब्रेड पकौड़े चखने रोज घंटों लाइन लगती है।

शिवपुरी शहर के फिजिकल क्षेत्र में एक छोटी सी ठेला दुकान है, जिसकी कोई बड़ी चमचमाती दुकान नहीं, कोई नामी बोर्ड नहीं, फिर भी बीते 15 सालों से यह शहरवासियों की पहली पसंद बनी हुई है। लोग इसे प्यार से ‘ग्वालियर वाले मामा’ के नाम से बुलाते हैं और यहां मिलने वाले गरमागरम आलू पकौड़े और ब्रेड पकौड़े चखने के लिए दूर-दूर से लोग खिंचे चले आते हैं।

बिना किसी विज्ञापन या मार्केटिंग के इतने लंबे समय तक ग्राहकों को बांधे रखना आसान काम नहीं है, लेकिन इस ठेले ने सिर्फ अपने स्वाद की बदौलत यह मुकाम हासिल किया है।

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लकड़ी की धीमी आंच का पुराना नुस्खा

इस दुकान की सबसे बड़ी खासियत इसकी तलने की परंपरागत तकनीक है। यहां आज भी गैस के बजाय लकड़ी की आंच पर ही पकौड़े तैयार किए जाते हैं। दुकान चलाने वाले राधेश्याम अग्रवाल के अनुसार, धीमी आंच पर तलने से आलू और ब्रेड पकौड़े बाहर से बेहद खस्ते और अंदर से नरम बने रहते हैं। तेज आंच या गैस पर बनी चीजों में यह बनावट मिलना मुश्किल होता है, इसलिए यही पुराना तरीका इस दुकान को शहर की बाकी दुकानों से अलग पहचान देता है।

घर के मसाले और खास चटनी का तड़का

पकौड़ों में डाले जाने वाले मसाले बाजार से खरीदकर नहीं, बल्कि घर पर ही तैयार किए जाते हैं। इसके साथ परोसी जाने वाली तीखी-खट्टी चटनी स्वाद को और भी खास बना देती है। सालों से एक ही हाथ और एक जैसी गुणवत्ता बनाए रखने की वजह से ग्राहकों का भरोसा कभी डगमगाया नहीं। यही वजह है कि पुराने ग्राहक बार-बार यहीं लौटकर आते हैं।

घंटों इंतजार के बाद मिलता है नंबर

दुकान रोजाना दोपहर करीब 1 बजे खुलती है और रात लगभग 9 बजे तक चलती है। हालत यह है कि दुकान खुलने से पहले ही ग्राहक कतार में लग जाते हैं। कई बार लोगों को आधे घंटे से लेकर पूरे एक घंटे तक इंतजार करना पड़ता है, लेकिन शिवपुरी में शायद ही कोई ऐसा हो जो ‘ग्वालियर वाले मामा’ के खस्ते पकौड़ों का स्वाद चखे बिना वापस लौटना चाहे।

बिना बैनर के बनी अलग पहचान

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस दुकान की पहचान किसी चमकते साइनबोर्ड या प्रचार से नहीं बनी, बल्कि सिर्फ स्वाद के दम पर बनी है। 15 साल बीत जाने के बाद भी फिजिकल क्षेत्र का यह छोटा सा ठिकाना शिवपुरी के सबसे लोकप्रिय स्ट्रीट फूड स्पॉट्स में गिना जाता है। लगातार डेढ़ दशक तक बिना बड़े प्रचार के ग्राहकों का भरोसा बनाए रखना एक मिसाल है, और ‘ग्वालियर वाले मामा’ ने यह करके दिखाया है। यही कारण है कि अब यह छोटा सा ठेला शिवपुरी के स्थानीय खान-पान की पहचान का अहम हिस्सा बन चुका है।

सवाल-जवाब

यह दुकान किस शहर में है?
यह दुकान मध्यप्रदेश के शिवपुरी शहर के फिजिकल क्षेत्र में स्थित है।
दुकान को किस नाम से जाना जाता है?
इसे शहर में ‘ग्वालियर वाले मामा’ के नाम से जाना जाता है।
यह दुकान कितने साल पुरानी है?
यह दुकान पिछले 15 सालों से चल रही है।
यहां पकौड़े किस तरह बनाए जाते हैं?
पकौड़े आज भी गैस की जगह लकड़ी की धीमी आंच पर तले जाते हैं, जिससे वे बाहर से खस्ते और अंदर से नरम रहते हैं।
यहां कौन-कौन से पकौड़े मिलते हैं?
यहां मुख्य रूप से आलू पकौड़े और ब्रेड पकौड़े मिलते हैं।
दुकान का समय क्या है?
दुकान रोजाना दोपहर करीब 1 बजे खुलती है और रात लगभग 9 बजे तक चलती है।
क्या यहां लंबा इंतजार करना पड़ता है?
हां, कई बार ग्राहकों को आधे घंटे से लेकर एक घंटे तक कतार में इंतजार करना पड़ता है।
दुकान चलाने वाले का नाम क्या है?
दुकान राधेश्याम अग्रवाल चलाते हैं, जिन्होंने लकड़ी की आंच पर तलने की विधि के बारे में बताया।
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