शिवपुरी शहर के फिजिकल क्षेत्र में एक छोटी सी ठेला दुकान है, जिसकी कोई बड़ी चमचमाती दुकान नहीं, कोई नामी बोर्ड नहीं, फिर भी बीते 15 सालों से यह शहरवासियों की पहली पसंद बनी हुई है। लोग इसे प्यार से ‘ग्वालियर वाले मामा’ के नाम से बुलाते हैं और यहां मिलने वाले गरमागरम आलू पकौड़े और ब्रेड पकौड़े चखने के लिए दूर-दूर से लोग खिंचे चले आते हैं।
बिना किसी विज्ञापन या मार्केटिंग के इतने लंबे समय तक ग्राहकों को बांधे रखना आसान काम नहीं है, लेकिन इस ठेले ने सिर्फ अपने स्वाद की बदौलत यह मुकाम हासिल किया है।
लकड़ी की धीमी आंच का पुराना नुस्खा
इस दुकान की सबसे बड़ी खासियत इसकी तलने की परंपरागत तकनीक है। यहां आज भी गैस के बजाय लकड़ी की आंच पर ही पकौड़े तैयार किए जाते हैं। दुकान चलाने वाले राधेश्याम अग्रवाल के अनुसार, धीमी आंच पर तलने से आलू और ब्रेड पकौड़े बाहर से बेहद खस्ते और अंदर से नरम बने रहते हैं। तेज आंच या गैस पर बनी चीजों में यह बनावट मिलना मुश्किल होता है, इसलिए यही पुराना तरीका इस दुकान को शहर की बाकी दुकानों से अलग पहचान देता है।
घर के मसाले और खास चटनी का तड़का
पकौड़ों में डाले जाने वाले मसाले बाजार से खरीदकर नहीं, बल्कि घर पर ही तैयार किए जाते हैं। इसके साथ परोसी जाने वाली तीखी-खट्टी चटनी स्वाद को और भी खास बना देती है। सालों से एक ही हाथ और एक जैसी गुणवत्ता बनाए रखने की वजह से ग्राहकों का भरोसा कभी डगमगाया नहीं। यही वजह है कि पुराने ग्राहक बार-बार यहीं लौटकर आते हैं।
घंटों इंतजार के बाद मिलता है नंबर
दुकान रोजाना दोपहर करीब 1 बजे खुलती है और रात लगभग 9 बजे तक चलती है। हालत यह है कि दुकान खुलने से पहले ही ग्राहक कतार में लग जाते हैं। कई बार लोगों को आधे घंटे से लेकर पूरे एक घंटे तक इंतजार करना पड़ता है, लेकिन शिवपुरी में शायद ही कोई ऐसा हो जो ‘ग्वालियर वाले मामा’ के खस्ते पकौड़ों का स्वाद चखे बिना वापस लौटना चाहे।
बिना बैनर के बनी अलग पहचान
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस दुकान की पहचान किसी चमकते साइनबोर्ड या प्रचार से नहीं बनी, बल्कि सिर्फ स्वाद के दम पर बनी है। 15 साल बीत जाने के बाद भी फिजिकल क्षेत्र का यह छोटा सा ठिकाना शिवपुरी के सबसे लोकप्रिय स्ट्रीट फूड स्पॉट्स में गिना जाता है। लगातार डेढ़ दशक तक बिना बड़े प्रचार के ग्राहकों का भरोसा बनाए रखना एक मिसाल है, और ‘ग्वालियर वाले मामा’ ने यह करके दिखाया है। यही कारण है कि अब यह छोटा सा ठेला शिवपुरी के स्थानीय खान-पान की पहचान का अहम हिस्सा बन चुका है।


















