उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद में परंपरागत मिष्ठान का एक ऐसा स्वाद मौजूद है, जिसने बीते सात दशकों में अपनी खास पहचान कायम की है। आम तौर पर बाजारों में मिलने वाला खुरमा मैदे से तैयार किया जाता है, परंतु मऊ स्थित त्रिवेणी स्वीट हाउस में इसे विशुद्ध दूध के पनीर से बनाया जाता है। 600 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिकने वाला यह खास खुरमा अपने अनोखे स्वाद और बनावट की वजह से लगभग 20 दिनों तक बिल्कुल सुरक्षित रहता है और खराब नहीं होता। स्वाद और टिकाऊपन के इसी तालमेल के कारण इसकी पूछ-परख केवल पूर्वांचल तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के बड़े महानगरों और विदेशों तक इसके मुरीद फैले हुए हैं।
सात दशकों पुरानी पारिवारिक परंपरा और कारीगरी
त्रिवेणी स्वीट हाउस के संचालक धर्मचंद के अनुसार, उनके प्रतिष्ठान में पनीर का खुरमा बनाने की परंपरा करीब 70 वर्षों से निरंतर चली आ रही है। यह हुनर उनके परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा है। शुरुआत में उनके दादाजी इस खास खुरमे को तैयार करते थे, जिसके बाद उनके पिताजी ने इस काम को संभाला और धर्मचंद स्वयं भी बचपन से ही इस मिष्ठान निर्माण की प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं। इतने लंबे अरसे के बाद भी दुकान ने स्वाद और गुणवत्ता के पैमाने में कोई बदलाव नहीं आने दिया, जिससे ग्राहकों का भरोसा अटूट बना हुआ है।
दूध, पनीर और चाशनी का संतुलित मेल
इस विशिष्ट खुरमे को तैयार करने की विधि काफी सधी हुई और सरल सामग्रियों पर आधारित है। इसमें किसी कृत्रिम सामग्री या मैदे का प्रयोग नहीं होता, बल्कि केवल दूध और चीनी का इस्तेमाल किया जाता है। सबसे पहले दूध को कढ़ाई में अच्छी तरह पकाया जाता है। इसके पश्चात दूध को फाड़कर उसे उत्तम किस्म के पनीर का रूप दिया जाता है। जब पनीर पूरी तरह तैयार होकर जम जाता है, तब कारीगर इसे समान आकार के छोटे-छोटे चौकोर टुकड़ों में काटते हैं। टुकड़ों को अलग ट्रे में रखकर खुरमे की मिठास के लिए चीनी की चाशनी पकाई जाती है।
हल्की मिठास और नर्म बनावट की खासियत
चाशनी तैयार करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि वह अधिक गाढ़ी न हो। चाशनी को हल्का और पतला रखा जाता है, ताकि पनीर के अंदर मिठास का असर संतुलित रहे। इस पतली चाशनी में पनीर के कटे हुए टुकड़ों को डालकर कुछ देर तक पकाया जाता है। चाशनी सोखने के बाद टुकड़ों को बाहर निकालकर अलग ट्रे में ठंडा होने के लिए फैला दिया जाता है। गर्म अवस्था से जब यह खुरमा सामान्य तापमान पर आता है, तब यह बेहद नर्म और रसदार हो जाता है। हल्की मिठास और शुद्ध छेने की सुगंध होने की वजह से यह खाने में भारी नहीं लगता और स्वाद ऐसा होता है कि लोग इसे बार-बार खाना पसंद करते हैं।
तीन सप्ताह तक ताजगी और दूर-दराज से लगातार मांग
धर्मचंद बताते हैं कि पनीर से बनने के बावजूद उचित विधि से पकाने के कारण यह खुरमा करीब 20 दिनों तक खराब नहीं होता। इसी खूबी के चलते यह सफर में ले जाने और उपहार स्वरूप भेजने के लिए बेहद मुफीद माना जाता है। दुकान पर इसे अधिकतर ग्राहकों के अग्रिम ऑर्डर पर ही तैयार किया जाता है। मऊ, आजमगढ़ और वाराणसी जैसे आसपास के जनपदों के अलावा मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों और विदेशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय भी नियमित रूप से इसका ऑर्डर देते हैं। 600 रुपए प्रति किलोग्राम के मूल्य पर बिकने वाला यह पारंपरिक मिष्ठान अपनी शुद्धता और सादगी के दम पर लगातार अपनी महक बिखेर रहा है।



















