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बलिया की 65 साल पुरानी दुकान पर मिलने वाली रसमलाई क्यों पहुंच रही है लखनऊ तक, जानें इसकी रेसिपीखानपान
22 सित॰ 2026, 9:19 pm (1 घंटे पहले)· 0

बलिया की 65 साल पुरानी दुकान पर मिलने वाली रसमलाई क्यों पहुंच रही है लखनऊ तक, जानें इसकी रेसिपी

बलिया के कचहरी रोड पर स्थित साधु जी का दिव्यांशु मिष्ठान भंडार अपनी खास रसमलाई के लिए दूर-दूर तक मशहूर है, जिसे छेने और कम चीनी की रबड़ी से फलाहार रूप में तैयार किया जाता है।

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में एक ऐसी परंपरागत मिठाई की मिठास घुली है, जिसकी खुशबू और स्वाद का दायरा आसपास के जिलों से लेकर लखनऊ तक फैल चुका है। प्लेट में परोसी गई यह रसमलाई अपनी प्राकृतिक चमक और हल्की मिठास से भरपूर रस की वजह से हर उम्र के लोगों को लुभाती है। मुंह में रखते ही घुल जाने वाली यह रसमलाई साठ के दशक से लगातार लोगों की जुबान पर राज कर रही है और इसे तैयार करने की पुरानी विधि आज भी जस की तस निभाई जा रही है।

तीन पीढ़ियों से संजोई गई पारंपरिक मिठास

इस प्रतिष्ठान का संचालन दिव्यांशु गुप्ता कर रहे हैं, जो बताते हैं कि यह दुकान उनके दादाजी ने शुरू की थी। लगभग 65 वर्षों से चली आ रही इस दुकान की पहचान यहां की खास रसमलाई बन चुकी है। इस मिष्ठान को तैयार करने के लिए सबसे बेहतरीन दूध और उच्च गुणवत्ता वाली रबड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। यहां रोजाना शाम ढलते ही मिठाई प्रेमियों का तांता लग जाता है, जो मौके पर खाने के साथ-साथ बड़ी मात्रा में रसमलाई और रबड़ी पैक करवाकर भी ले जाते हैं।

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कई जिलों में मांग और सरकारी महकमों की पहली पसंद

बलिया की सीमाएं लांघकर यह रसमलाई अब मऊ, गाजीपुर और राजधानी लखनऊ तक पार्सल के जरिए भेजी जाती है। स्थानीय प्रशासनिक और कानूनी गलियारों में भी इसका खास रुतबा देखने को मिलता है। न्यायालय परिसर के नजदीक होने के चलते जजों, वकीलों और पुलिस अधिकारियों के विभागों में इस रसमलाई की नियमित रूप से मांग रहती है। विशिष्ट अवसरों पर यहां से विशेष ऑर्डर तैयार कर इन कार्यालयों तक पहुंचाए जाते हैं।

छेने की कारीगरी और व्रत के अनुकूल फलाहारी तैयारी

इस रसमलाई को बनाने का जिम्मा उन पुराने कारीगरों के हाथों में है, जो बीते तीन पीढ़ियों से इसी परिवार के साथ जुड़े हुए हैं। करीब 60 से 70 साल पुरानी पारंपरिक विधि का पालन करते हुए कारीगर सबसे पहले शुद्ध छेने से इसका बेस तैयार करते हैं। इसके बाद अच्छी क्वालिटी के गाढ़े दूध को धीमी आंच पर पकाकर रबड़ी का रूप दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे पूरी तरह फलाहारी रखा जाता है, जिससे धार्मिक उपवास और व्रत के दौरान भी श्रद्धालु बिना किसी संकोच के इसका सेवन कर सकते हैं।

कम चीनी का संतुलन और 40 रुपये की किफायती कीमत

दुकान संचालक दिव्यांशु के अनुसार, उनकी दुकान में रसमलाई और कलाकंद ऐसी दो प्रमुख मिठाइयां हैं जिनमें शर्करा का अनुपात बेहद नियंत्रित रखा जाता है। चीनी की सीमित मात्रा होने के कारण ऐसे लोग भी इसका आनंद ले पाते हैं जो अधिक मीठा खाने से परहेज करते हैं या शुगर की समस्या से जूझ रहे हैं। शुद्ध खोये की बर्फी और छेने की रसमलाई की मूल रेसिपी में दशकों से कोई फेरबदल नहीं किया गया है। हर एक पीस की कीमत 40 रुपये रखी गई है, जो इसकी गुणवत्ता और स्वाद के लिहाज से काफी किफायती मानी जाती है।

कचहरी रोड पर साधु जी का दिव्यांशु मिष्ठान भंडार

यह ऐतिहासिक प्रतिष्ठान बलिया के कचहरी रोड पर पालिका गेट के पास 'साधु जी का दिव्यांशु मिष्ठान भंडार' के नाम से जाना जाता है। दुकान पर मिठाई का लुत्फ उठा रहे रघुनाथपुर पिपरपाति के बुजुर्ग निवासी सूर्य नारायण ओझा ने बताया कि 40 रुपये में मिलने वाली यह रसमलाई न सिर्फ बेहद स्वादिष्ट है, बल्कि इसमें मिठास का स्तर इतना हल्का और संतुलित है कि इसे खाते वक्त भारीपन का अहसास बिल्कुल नहीं होता। यही वजह है कि बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक सभी इसके मुरीद बने हुए हैं।

सवाल-जवाब

बलिया में यह प्रसिद्ध दुकान कहां स्थित है और इसका क्या नाम है?
यह दुकान बलिया में कचहरी रोड पर पालिका गेट के पास स्थित है और इसका नाम साधु जी का दिव्यांशु मिष्ठान भंडार है।
इस दुकान की रसमलाई की एक पीस की कीमत कितनी है?
दुकान पर इस खास रसमलाई की कीमत 40 रुपये प्रति पीस रखी गई है।
क्या व्रत और उपवास के दौरान इस रसमलाई को खाया जा सकता है?
हां, यह पूरी तरह फलाहारी मिठाई है और इसे छेने व शुद्ध दूध की रबड़ी से बनाया जाता है, इसलिए इसे व्रत में खाया जा सकता है।
दुकान में कौन-सी दो मिठाइयों में चीनी की मात्रा कम रखी जाती है?
दुकानदार दिव्यांशु गुप्ता के अनुसार, रसमलाई और कलाकंद में चीनी की मात्रा कम रखी जाती है ताकि कम मीठा खाने वाले और शुगर के मरीज भी इसका सेवन कर सकें।
बलिया के अलावा यह रसमलाई किन अन्य शहरों में भेजी जाती है?
यह रसमलाई मऊ, गाजीपुर और लखनऊ जैसे कई जिलों में पैक होकर भेजी जाती है।
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