हरियाणा के अंबाला छावनी में कैलाश मंदिर और हाथीखाना इलाके के आसपास सब्जी उगाने वाले किसान इन दिनों मुनाफे की नहीं, बल्कि अपनी लागत बचाने की चिंता में डूबे हैं। तेज धूप, बारिश की कमी और गर्म हवाओं की लगातार मार ने फसलों को इस कदर झुलसा दिया है कि खेत भले हरे-भरे दिखें, पैदावार पहले जैसी नहीं बची। किसानों का कहना है कि इस बार के मौसम ने सब्जी की खेती को बुरी तरह प्रभावित किया है और आने वाले दिनों में हालात सुधरने की उम्मीद भी कम ही नजर आ रही है।
अरबी की फसल को सबसे ज्यादा झटका
किसानों के मुताबिक हर साल जुलाई तक अरबी की फसल पककर तैयार हो जाती थी, लेकिन इस बार सूरज की तेज तपिश ने पौधों को समय से पहले ही मुरझा दिया। कई खेतों में अरबी के पत्ते पीले पड़ चुके हैं और पौधों की लंबाई बढ़नी बंद हो गई है। मौसम की यह बेरुखी सिर्फ अरबी तक सीमित नहीं रही, बल्कि मिर्च जैसी दूसरी फसलों पर भी भारी पड़ी है। खेतों में नमी की कमी और लगातार गर्म हवाओं ने पौधों की जड़ों तक असर डाला है, जिससे उपज का पूरा गणित बिगड़ गया है।
चार दशक से मिट्टी से जुड़े बाबूराम की चिंता
पिछले करीब चालीस साल से इसी इलाके में सब्जियां उगा रहे किसान बाबूराम बताते हैं कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इसी माटी में गुजारी है। वह अरबी, पालक, घीया, तोरी, मिर्च और भिंडी जैसी फसलें हमेशा देसी तरीके से, गोबर खाद के सहारे तैयार करते आए हैं। बाबूराम कहते हैं,
इस बार धूप इतनी तेज रही कि अरबी की फसल लगभग खत्म हो गई।उन्होंने करीब चार बीघा जमीन पर अलग-अलग सब्जियां बोई थीं, जिसमें बीज, खाद, मजदूरी और सिंचाई पर उनका खर्च लगातार बढ़ता गया। अब उन्हें डर सता रहा है कि पैदावार इतनी घट चुकी है कि मंडी पहुंचने से पहले ही लागत निकालना मुश्किल हो जाएगा। यही वजह है कि वह अब सरकार से मुआवजे की मांग कर रहे हैं ताकि महीनों की मेहनत बेकार न जाए।
संजय कुमार के खेत में तोरी के फूल झड़ने की मुसीबत
किसान संजय कुमार के खेत में तोरी की बेलें अभी भी हरी नजर आती हैं, मगर तेज हवाओं के थपेड़ों से इसके फूल बार-बार झड़ जाते हैं, जिससे फल बनने की प्रक्रिया ही रुक जाती है। आमतौर पर तोरी को पककर तैयार होने में करीब एक महीने का वक्त लगता है और इसकी खेती लगभग तीन महीने तक चलती रहती है। फिलहाल रोजाना 12 से 15 किलो तोरी मंडी तक पहुंच रही है, पर उपज पहले के मुकाबले काफी कम रह गई है। संजय के मुताबिक इस सीजन में अब तक खेती पर करीब 50 हजार रुपये खर्च हो चुके हैं। मिर्च और अरबी की फसल तो लगभग बर्बाद हो चुकी है, जबकि भिंडी और तोरी की किस्मत अब भी मौसम के हाथ में टिकी है।
अब हर बादल में उम्मीद, लेकिन बारिश का डर भी
संजय कहते हैं कि हर बादल को देखकर उनके मन में उम्मीद जगती है, लेकिन साथ ही एक डर भी बना रहता है। अगर अचानक बहुत तेज बारिश हो गई, तो जो थोड़ी बहुत फसल अभी बची है, वह भी बर्बाद हो सकती है। यानी किसानों की मुश्किल दोतरफा है, न तो लगातार तेज धूप उन्हें राहत दे रही है और न ही ज्यादा बारिश की आशंका उन्हें चैन से बैठने दे रही है। खेतों में लगातार बदलते मौसम ने पूरे इलाके के छोटे किसानों की आमदनी और आगे की योजनाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं, और फिलहाल वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि किसी तरह अपनी लगाई हुई पूंजी वापस निकल आए।




















