हरियाणा राज्य के फरीदाबाद जिले में स्थित सोतई गांव में जेवर एयरपोर्ट को जोड़ने वाले नए एक्सप्रेसवे के निर्माण कार्य और भूमि अधिग्रहण मुआवजे को लेकर किसान अनिश्चितकालीन प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले 6 से 7 दिनों से लगातार जारी इस आंदोलन में गांव के पुरुष, महिलाएं और बुजुर्ग कड़ाके की तपती दोपहरी में भी अपनी मांगों पर डटे हुए हैं। प्रदर्शनकारी ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि जिस भूमि पर एक्सप्रेसवे का निर्माण किया जा रहा है, वह उनके पूर्वजों की पुश्तैनी संपत्ति है। पीढ़ियों से इस जमीन पर खेतीबाड़ी होती आई है, जो उनके परिवारों के भरण पोषण और आजीविका का एकमात्र सहारा रही है। मंगलवार के दिन धरना स्थल पर किसानों द्वारा एक विशाल महापंचायत का आयोजन किया गया, जिसमें सोतई के अलावा आसपास के अनेक गांवों से बड़ी संख्या में किसान, क्षेत्र के सरपंच, नंबरदार तथा गणमान्य नागरिक सम्मिलित हुए। कानून व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से हरियाणा पुलिस बल टेंट लगाकर मौके पर तैनात है और उपमंडलीय मजिस्ट्रेट (SDM) भी स्थिति का जायजा लेने पहुंचे हैं। किसानों ने दो टूक शब्दों में ऐलान किया है कि जब तक उन्हें न्यायसंगत अधिकार नहीं मिल जाता, तब तक उनका यह संघर्ष बिना रुके जारी रहेगा।
1908 के बंदोबस्त और चकबंदी रिकॉर्ड पर आधारित मालिकाना हक का दावा
सोतई गांव के स्थायी निवासी जम्मन चौधरी ने स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था और राजस्व रिकॉर्ड की स्थिति को लेकर कई महत्वपूर्ण तथ्य उजागर किए हैं। उन्होंने बताया कि जिस जमीन को लेकर विवाद चल रहा है, वह वर्ष 1908-1909 के ऐतिहासिक बंदोबस्त रिकॉर्ड में दर्ज है। इसके अलावा उनके पास वर्ष 1954 की चकबंदी से जुड़े प्रामाणिक दस्तावेज भी मौजूद हैं। उस चकबंदी प्रक्रिया के समय पूरा रिकॉर्ड कलेक्टर के पास जमा था और बाकायदा गिरदावारी कराई गई थी। राजस्व अभिलेखों में थोक सामलात की खतौनी के अंतर्गत कुल 16 अलग-अलग खाते दर्ज हैं, जिनमें किला नंबर, मुस्ततीन और संबंधित किसानों के नाम स्पष्ट रूप से उल्लेखित हैं। हालांकि वर्ष 1955-56 की जमाबंदी में कुछ तकनीकी कारणों से किसानों के नाम दर्ज होने से रह गए थे, परंतु बाद में कलेक्टर कार्यालय से रिकॉर्ड वापस मिलने के उपरांत वर्ष 1962-63 की जमाबंदी में किसानों के नाम पुनः विधिवत दर्ज कर दिए गए थे। इसी 1962-63 की जमाबंदी और 1908-1909 के बंदोबस्त दस्तावेजों के आधार पर सोतई के किसान उक्त जमीन पर अपना वास्तविक मालिकाना हक और कब्जा सिद्ध करते आ रहे हैं। उनका प्रश्न है कि जब सरकारी रिकॉर्ड में किसानों का कब्जा और मिल्कियत दर्ज है, तो उस जमीन का स्वामित्व नगर निगम फरीदाबाद (MCF) को किस आधार पर हस्तांतरित कर दिया गया।
मुआवजा राशि को दो वर्ष दबाकर कोर्ट में भेजने पर उठे गंभीर सवाल
भूमि अधिग्रहण के बदले मिलने वाले वित्तीय मुआवजे के वितरण में भी भारी विसंगतियां सामने आई हैं। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने वर्ष 2022 में ही अधिग्रहण की पूरी मुआवजा राशि फरीदाबाद के नोडल अधिकारी के पास ट्रांसफर कर दी थी। उसी वर्ष 2022 में नोडल अधिकारी द्वारा मुआवजे का वितरण आरंभ किया गया, लेकिन प्रशासन ने केवल निजी मिल्कियत दर्ज वाली जमीनों का ही पैसा किसानों को दिया। जिस जमीन का इंद्राज राजस्व रिकॉर्ड में 'सामलात थोक जाटान हस्म्म' के रूप में दर्ज है, उसका मुआवजा किसानों को नहीं दिया गया, जबकि किसान इस जमीन पर अपना प्रत्यक्ष कब्जा और मिल्कियत दोनों का दावा कर रहे हैं। जिला राजस्व अधिकारी (DRO) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए ग्रामीणों ने बताया कि अधिकारी ने वर्ष 2022 से लेकर 2024 तक मुआवजे की भारी राशि अपने पास दबाकर रखी। इसके पश्चात अधिकारियों ने मुआवजा राशि को चुपचाप अदालत में जमा करा दिया, जिसकी कोई पूर्व सूचना किसानों को नहीं दी गई। लगभग 6 महीने बीत जाने के बाद ग्रामीणों को पता चला कि उनका पैसा कोर्ट में जमा कराया जा चुका है। अदालत में सुनवाई के दौरान जब नगर निगम फरीदाबाद (MCF) से जमीन के मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज पेश करने को कहा गया, तो निगम ने स्पष्ट कर दिया कि उनके पास कोई कागजात नहीं हैं और उन्हें केवल DRO की तरफ से एक पत्र प्राप्त हुआ था। वहीं DRO भी कोर्ट के समक्ष जमीन की मिल्कियत से जुड़ा कोई ठोस दस्तावेज प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे।
प्रशासनिक रुख और राष्ट्रीय परियोजना के कार्य पर चेतावनियां
दूसरी तरफ मामले की गंभीरता को देखते हुए मयंक भारद्वाज ने प्रशासनिक और कानूनी स्थिति पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उन्होंने रेखांकित किया कि यह संपूर्ण निर्माण कार्य जेवर एयरपोर्ट एक्सप्रेसवे का एक हिस्सा है, जो एक अति महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परियोजना (National Project) के तहत आता है। मयंक भारद्वाज के अनुसार, भूमि की वास्तविक मिल्कियत को लेकर जो भी विवाद वर्तमान में अदालत के समक्ष लंबित हैं, उनसे संबंधित मुआवजा राशि NHAI द्वारा पहले ही कोर्ट में सुरक्षित जमा कराई जा चुकी है। न्यायपालिका में मामले का निपटारा होने के बाद कोर्ट के अंतिम फैसले के आधार पर जिस भी पक्ष का मालिकाना हक वैध सिद्ध होगा, उसे कोर्ट के माध्यम से मुआवजे की राशि तुरंत वितरित कर दी जाएगी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मुआवजा राशि अदालत में जमा हो जाने के कारण इस राष्ट्रीय परियोजना के निर्माण कार्य को रोका जाना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत और उचित नहीं है। बुनियादी ढांचे के निर्माण का काम निर्बाध रूप से जारी रहना चाहिए। बिना किसी पूर्व अनुमति के धरना देकर राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण में बाधा डालना पूरी तरह से अवैध है, और ऐसा करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जा सकती है। इसके बावजूद सोतई गांव के किसान अपनी मांग पर अड़े हुए हैं और पारदर्शी समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।





















