देश भर में इस समय 61,668 ऐसे मरीज हैं जिनकी दोनों किडनियां गंभीर रूप से खराब हो चुकी हैं और उनका जीवन बचाने के लिए ट्रांसप्लांट बेहद जरूरी हो चुका है। जब तक नया अंग नहीं मिलता, तब तक इन सभी लोगों का जीवन केवल डायलिसिस के सहारे खिंच रहा है। सबसे गंभीर चुनौती यह है कि उपयुक्त डोनर न मिलने के कारण कई मरीजों को प्रत्यारोपण के लिए पांच-पांच साल तक लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। यह पूरी अवधि मरीज और उसके परिवार के लिए अत्यधिक शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कठिनाइयों से भरी होती है।
ट्रांसप्लांट की नौबत क्यों आती है
सीनियर नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. मनीष मल्लिक के अनुसार किसी व्यक्ति को किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत तब पड़ती है जब दोनों किडनियां अपनी सामान्य क्षमता के केवल 10 प्रतिशत या उससे भी कम स्तर पर काम कर रही हों। चिकित्सकीय भाषा में इसे क्रोनिक किडनी डिजीज का अंतिम चरण माना जाता है। किडनियों का इस स्तर तक खराब होना अचानक नहीं होता, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से चली आ रही स्वास्थ्य समस्याएं जिम्मेदार होती हैं।
शुरुआती दौर में हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी बीमारियां अनियंत्रित रहती हैं। यदि इन पर समय रहते नियंत्रण न किया जाए, तो गुर्दे की सूक्ष्म रक्त नलिकाओं और कोशिकाओं पर लगातार अत्यधिक दबाव पड़ने लगता है। एक स्वस्थ शरीर में किडनियों का प्राथमिक कार्य रक्त से विषाक्त और गैर-जरूरी तत्वों को छानकर मूत्र के माध्यम से बाहर निकालना होता है। इस पूरी प्रक्रिया में नेफ्रॉन मुख्य क्रियाशील इकाई की तरह काम करता है, जिसके भीतर बारीक नलिकाएं होती हैं जिन्हें रीनल ट्यूबूल्स कहा जाता है।
रीनल ट्यूबूल्स की बनावट बेहद विशिष्ट होती है। ये नलिकाएं शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्वों और पानी को दोबारा अवशोषित करके रक्त में वापस भेज देती हैं, जबकि यूरिया और क्रिएटिनिन जैसे नुकसानदेह अपशिष्ट पदार्थों को आगे मूत्राशय की ओर धकेल देती हैं, जहां से वे शरीर से उत्सर्जित हो जाते हैं। जब हाई बीपी और शुगर का दबाव लगातार बना रहता है, तो इन ट्यूबूल्स के ऊतकों में फाइब्रोसिस की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। फाइब्रोसिस के कारण वहां कठोर निशान और घाव बन जाते हैं, जिससे ट्यूबूल्स अवरुद्ध हो जाते हैं। नलिकाएं जाम होने पर अपशिष्ट पदार्थ बाहर नहीं निकल पाते और रक्त में यूरिया तथा क्रिएटिनिन का स्तर तेजी से बढ़ने लगता है। यह जहरीला जमाव मस्तिष्क, हृदय और लिवर सहित शरीर के प्रमुख अंगों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाने लगता है।
डायलिसिस पर निर्भर मरीजों के सामने मंडराते खतरे
डॉ. मनीष मल्लिक स्पष्ट करते हैं कि ट्रांसप्लांट की प्रतीक्षा में जो लोग डायलिसिस पर निर्भर हैं, उन्हें कई तरह के स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ता है। डायलिसिस मशीन कभी भी एक स्वस्थ प्राकृतिक किडनी की पूरी तरह बराबरी नहीं कर सकती। यह मशीन एक सामान्य गुर्दे के मुकाबले केवल 10 प्रतिशत क्षमता से ही काम कर पाती है। यही कारण है कि नियमित डायलिसिस कराने के बावजूद मरीज में बीमारी की गंभीरता और जटिलताओं का जोखिम लगातार बना रहता है।
डायलिसिस करा रहे मरीजों में सामान्य लोगों की तुलना में दिल का दौरा पड़ने और ब्रेन स्ट्रोक होने का जोखिम कई गुना अधिक बढ़ जाता है। चूंकि मशीन शरीर से सारे विषाक्त पदार्थों को पूरी तरह बाहर नहीं निकाल पाती, इसलिए रक्त में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगड़ने की आशंका हमेशा बनी रहती है। पोटैशियम, मैग्नीशियम और सोडियम का संतुलन गड़बड़ाने से हृदय की धड़कन अनियंत्रित हो सकती है, जिससे कार्डियक अरेस्ट और हार्ट अटैक का खतरा पैदा हो जाता है। इसके अतिरिक्त, मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है, जिससे उन्हें गंभीर संक्रमण घेर लेते हैं और शरीर में हीमोग्लोबिन की भारी कमी होने लगती है। उचित चिकित्सकीय देखरेख में इन खतरों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
शारीरिक, मानसिक और आर्थिक मोर्चे पर जूझते मरीज
लंबे समय तक डायलिसिस पर रहने वाले मरीजों के रक्त में टॉक्सिन जमा रहने के कारण उन्हें लगातार कमजोरी महसूस होती है। खून की कमी के चलते वे बहुत जल्दी थक जाते हैं। गंभीर संक्रमण का खतरा हमेशा सिर पर रहता है। इसके साथ ही मरीजों में मांसपेशियों का ह्रास होने लगता है, जिससे शारीरिक क्षमता तेजी से घटती है। मरीज यूरेमिया और कुपोषण की चपेट में भी आ जाते हैं।
सप्ताह में दो से तीन बार डायलिसिस केंद्र जाना पड़ता है, जिसके चलते मरीज नियमित रूप से काम या नौकरी पर नहीं जा पाते। इससे उनके सामने न केवल गंभीर शारीरिक और मानसिक तनाव पैदा होता है, बल्कि आमदनी घटने और इलाज के भारी खर्च के कारण आर्थिक संकट भी गहरा जाता है। कई मामलों में लगातार बीमारी और सामाजिक गतिविधियों से कटने के कारण मरीज सामाजिक अलगाव का शिकार भी हो जाते हैं।
अंग प्रत्यारोपण में देरी के मुख्य कारण
हमारे देश में ट्रांसप्लांट के लिए लंबा इंतजार करने की सबसे बड़ी वजह उपयुक्त डोनर का अभाव है। डॉ. मनीष मल्लिक बताते हैं कि सफल प्रत्यारोपण के लिए ऐसा डोनर चाहिए जो पूरी तरह स्वस्थ हो और जिसे हाई बीपी अथवा डायबिटीज जैसी कोई क्रोनिक बीमारी न हो। परिवार के निकटतम सदस्यों में ऐसे डोनर मिलने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। पति या पत्नी अक्सर निस्वार्थ भाव से अंगदान के लिए आगे आते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो पति या पत्नी की तुलना में सगे माता-पिता या सगे भाई-बहनों के साथ बायोलॉजिकल और जेनेटिक मैचिंग की संभावना बहुत अधिक होती है। लेकिन वर्तमान समय में एकल परिवारों का चलन बढ़ने की वजह से भाई-बहन अक्सर अंगदान के लिए आसानी से सहमत नहीं होते। इस गंभीर समस्या का सबसे स्थायी और प्रभावी समाधान कैडेवर डोनेशन यानी ब्रेन डेड घोषित व्यक्तियों का अंगदान है। यह व्यवस्था तभी व्यापक स्तर पर कारगर हो सकती है जब आम नागरिक अपने जीवनकाल में ही अंगदान का संकल्प लें, ताकि किसी अप्रिय दुर्घटना की स्थिति में उनके अंग जरूरतमंद मरीजों को नया जीवन दे सकें। हालांकि सामाजिक संकोच और जागरूकता के अभाव के कारण बहुत कम लोग आगे आते हैं, जिसके लिए सरकार और स्वास्थ्य संगठन जागरूकता अभियान चला रहे हैं।
ट्रांसप्लांट होने तक मरीजों के लिए जरूरी सावधानियां
जब तक डोनर नहीं मिलता और सर्जरी की बारी नहीं आती, तब तक मरीजों को अपनी दिनचर्या और खानपान को लेकर बेहद सतर्क रहना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि केवल डॉक्टर द्वारा सुझाई गई दवाइयों का ही निर्धारित समय पर नियमित सेवन करें। डॉक्टर द्वारा तय किए गए डाइट चार्ट और तरल पदार्थों की मात्रा का कड़ाई से पालन करना चाहिए। मरीज को अपनी मर्जी से किसी भी दवा की खुराक नहीं बदलनी चाहिए और न ही कोई नई दवा शुरू करनी चाहिए। नियमित चिकित्सकीय निगरानी में रहकर ही इस लंबे इंतजार के दौरान शरीर को ट्रांसप्लांट के लिए तैयार रखा जा सकता है।



















