किसानों के लिए अपनी खून पसीने की कमाई यानी फसलों को बचाना आज के समय में सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है. छुट्टा जानवरों और जंगली जीवों के कारण रातों रात पूरी फसल बर्बाद हो जाने का डर हमेशा सताता रहता है. नीलगाय, जंगली सूअर और आवारा मवेशी अक्सर खेतों में घुसकर भारी तबाही मचाते हैं. इस परेशानी से बचने के लिए कई किसान महंगे लोहे के जालों और कंटीले तारों का सहारा लेते हैं. लेकिन इन महंगे विकल्पों की जगह एक बेहद कारगर और कुदरती उपाय करौंदे का पौधा है. यह साधारण सी दिखने वाली कांटेदार झाड़ी दोहरे फायदे देती है. यह न सिर्फ खेतों के चारों ओर एक मजबूत जैविक दीवार बनकर खड़ी हो जाती है, बल्कि इसके औषधीय गुणों वाले खट्टे मीठे फल भी लगातार मिलते रहते हैं. पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारंपरिक जीवनशैली का एक बहुत बड़ा हिस्सा है. यह साबित करता है कि प्रकृति के पास हमारी कृषि और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का सबसे सस्ता और बेहतरीन इलाज मौजूद है.
खेतों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत प्राकृतिक दीवार
करौंदे के पौधे को खेतों की मेड़ पर लगाने का सबसे बड़ा कारण इसकी शारीरिक बनावट है. इस झाड़ी में बहुत घनी शाखाएं होती हैं और ये बेहद नुकीले तथा मजबूत कांटों से भरी होती हैं. जब किसान इन्हें अपने खेत की सीमा पर लगाते हैं, तो कुछ ही समय में ये पौधे आपस में उलझकर एक बहुत ही मजबूत और अभेद्य दीवार का रूप ले लेते हैं. इनके खतरनाक कांटों को देखकर नीलगाय, जंगली सूअर और आवारा मवेशी खेत के अंदर घुसने की हिम्मत बिल्कुल नहीं जुटा पाते हैं.
एक प्राकृतिक बाड़ का चुनाव करने से किसानों के लाखों रुपये बच जाते हैं. कई एकड़ जमीन को कंटीले तारों या लोहे की जाली से घेरने में बहुत ज्यादा शुरुआती खर्च आता है. इसके अलावा तारों में जंग लगने या टूटने पर बार बार भारी निवेश की जरूरत भी पड़ती है. वहीं दूसरी तरफ इस हरी बाड़ को लगाने में शुरुआत के बाद कोई बड़ा खर्च नहीं आता है. एक बार जड़ें जमा लेने के बाद यह खुद ही सालों साल फलती फूलती रहती है. आर्थिक फायदों के साथ ही इसके कई पर्यावरणीय लाभ भी हैं. इस पौधे की गहरी जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़ कर रखती हैं, जिससे बारिश के दौरान मिट्टी का कटाव रुक जाता है. इसके अलावा इसकी घनी छाया खेत की सीमा पर नमी को बनाए रखने में भी बड़ी भूमिका निभाती है.
कम पानी और सूखी जमीन का साथी
इस कुदरती रक्षक की सबसे बड़ी खासियत इसके जीवित रहने की अद्भुत क्षमता है. यह पौधा बहुत कम देखभाल में भी आसानी से पनप जाता है. भारतीय उपमहाद्वीप के जंगलों, पथरीले इलाकों और सूखे क्षेत्रों में यह मुख्य रूप से अपने आप ही उग आता है. इसे जीवित रहने के लिए बहुत ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती और यह लंबे समय तक बिना पानी के भी हरा भरा रह सकता है. इसे किसी तरह के रासायनिक खाद या बहुत ज्यादा रखरखाव की जरूरत भी नहीं होती है.
इसकी यही मजबूती इसे पारंपरिक खेती का एक बहुत ही अहम हिस्सा बनाती है. कई पीढ़ियों से लोग अपने खेतों को सुरक्षित रखने और हर साल इसके फलों की पैदावार लेने के लिए इसी पौधे पर भरोसा जताते आए हैं. इस पौधे पर छोटे आकार के फल लगते हैं. समय के साथ इन फलों के रंग और स्वाद में बहुत बड़ा बदलाव आता है और इसी वजह से घरेलू व्यंजनों से लेकर आयुर्वेदिक उपचारों में इनकी भारी मांग रहती है.
रसोई में कच्चे फल की खटास से लेकर पके फल की मिठास तक
इस फल का रसोई का सफर दो अलग अलग चरणों में बंटा हुआ है. जब यह फल कच्चा होता है, तो इसका रंग हल्का हरा या सफेद दिखाई देता है. इस अवस्था में इसका स्वाद बहुत ज्यादा खट्टा होता है. अपने इसी तीखे खट्टेपन के कारण कच्चे फल का इस्तेमाल रोजमर्रा के खानपान में स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है. भारतीय घरों में इसका चटपटा अचार और हरी मिर्च के साथ स्वादिष्ट चटनी खूब चाव से बनाई जाती है. सब्जियों में भी हल्का खट्टापन लाने के लिए इसे डाला जाता है.
जैसे जैसे मौसम आगे बढ़ता है और फल पूरी तरह से पक जाता है, इसके अंदर गजब का बदलाव देखने को मिलता है. पकने के बाद फल की बाहरी परत गहरे लाल या बिल्कुल काले रंग की हो जाती है. इसकी तेज खटास काफी हद तक कम हो जाती है और यह अंदर से थोड़ा मीठा तथा रसीला बन जाता है. इन पके हुए फलों को तोड़कर कई तरह के स्वादिष्ट उत्पाद बनाए जाते हैं. लोग घरों में इसका जैम, जेली और मीठा स्क्वैश तैयार करते हैं. सबसे ज्यादा इसका इस्तेमाल चाशनी में डूबा हुआ मुरब्बा बनाने में होता है. करौंदे का स्वादिष्ट मुरब्बा न सिर्फ खाने का स्वाद दोगुना कर देता है, बल्कि यह बहुत लंबे समय तक खराब भी नहीं होता है.
रोग प्रतिरोधक क्षमता और चमकती त्वचा का राज
रसोई के अलावा यह फल पोषण के मामले में भी किसी खजाने से कम नहीं है. इसमें कई ऐसे जरूरी विटामिन पाए जाते हैं, जो शरीर को अंदर से मजबूत बनाते हैं. आयुर्वेदिक चिकित्सक शालिनी ने इसके सबसे अहम गुण के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया, "करौंदे में प्रचुर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में बेहद मददगार है." जो लोग नियमित रूप से इसका सेवन करते हैं, उनका शरीर बदलते मौसम की बीमारियों से आसानी से लड़ पाता है. सर्दी, खांसी, जुकाम और तरह तरह के मौसमी संक्रमण से बचने के लिए इस फल का इस्तेमाल एक बेहतरीन ढाल का काम करता है.
विटामिन सी के साथ साथ इस छोटे से फल में शक्तिशाली एंटी ऑक्सीडेंट्स की भारी मात्रा होती है. आज के समय में प्रदूषण, तनाव और गलत खानपान की वजह से शरीर में खतरनाक फ्री रेडिकल्स जमा हो जाते हैं. करौंदे में मौजूद ये शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट तत्व इन फ्री रेडिकल्स से लड़ने का काम करते हैं. इस तरह यह शरीर को अंदर से तरोताजा रखता है. शरीर के अंदर की यह मजबूती बाहर त्वचा पर भी साफ दिखाई देती है. इसके सेवन से त्वचा एकदम स्वस्थ रहती है और चेहरे पर एक प्राकृतिक चमक बनी रहती है.
पाचन तंत्र को दुरुस्त करने का अचूक उपाय
पेट की बीमारियों से परेशान लोगों के लिए यह फल एक अचूक औषधि की तरह काम करता है. इसमें प्राकृतिक फाइबर और कई ऐसे खास कुदरती यौगिक मौजूद होते हैं, जो पाचन तंत्र की दिक्कतों को जड़ से खत्म कर देते हैं. कब्ज, पेट में गैस बनना, खाना सही से न पचना और पेट में जलन जैसी गंभीर समस्याओं को इसके लगातार सेवन से आसानी से दूर किया जा सकता है.
आयुर्वेद में पेट की सफाई के लिए इसे बहुत कारगर माना गया है. इसके ताजे फलों का रस निकालकर पीने या सुखाकर बनाए गए पाउडर का सेवन करने से पेट के कीड़े पूरी तरह से मर जाते हैं और आंतों की बहुत अच्छे से सफाई हो जाती है. पारंपरिक आयुर्वेदिक चिकित्सा में भूख को बढ़ाने और पाचन अग्नि को ठीक करने के लिए इसके फलों के साथ साथ पत्तियों का भी इस्तेमाल किया जाता है. अगर एक संतुलित मात्रा में इसे रोज खाया जाए, तो यह आंतों को मजबूत बनाकर पेट के समग्र स्वास्थ्य में सुधार लाता है.
दिल की बीमारियों से बचाव और नसों को आराम
इस बहुपयोगी पौधे के फायदे हमारे हृदय के स्वास्थ्य तक भी पहुंचते हैं. एक स्वस्थ दिल के लिए शरीर में खनिजों का सही संतुलन होना बेहद जरूरी है. इस फल में पोटैशियम, मैग्नीशियम और कई अन्य खनिज भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. ये तत्व खून की नसों को आराम पहुंचाते हैं और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखते हैं. इससे अचानक रक्तचाप बढ़ने की समस्या से बचाव होता है.
इसके अलावा अगर करौंदे को अपने खानपान में सही तरीके से शामिल किया जाए, तो यह कोलेस्ट्रॉल को भी नियंत्रित करता है. यह खून में जमा होने वाले हानिकारक कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल के स्तर को तेजी से कम करने में मदद करता है. खराब कोलेस्ट्रॉल कम होने से दिल की धमनियों में रुकावट आने की संभावना लगभग घट जाती है. साथ ही इसमें शरीर की सूजन कम करने वाले एंटी इन्फ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो नसों की सूजन को मिटाकर हृदय प्रणाली को लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखते हैं.




















