गोंडा जिले में एक ऐसे वैद्य हैं जिनके पास न कोई बड़ा अस्पताल है, न कोई महंगी जांच मशीन, फिर भी उनके दरवाजे पर रोज सुबह से मरीजों की भीड़ लग जाती है। नाम है वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति, जो सालों से सिर्फ पारंपरिक आयुर्वेद और घर की बनाई जड़ी-बूटियों के सहारे लोगों की तकलीफ दूर कर रहे हैं। खास बात यह है कि इलाज कराने सिर्फ गोंडा के लोग नहीं आते, बल्कि बलरामपुर, श्रावस्ती और बहराइच जैसे पड़ोसी जिलों से भी मरीज रोजाना यहां पहुंचते हैं, यानी उनकी पहचान अब जिले की सीमा से बाहर तक फैल चुकी है।
घर को ही बना लिया इलाज केंद्र
प्रजापति के पास इलाज के लिए न कोई बड़ा अस्पताल है, न कोई आधुनिक सेंटर, वह बरसों से अपने घर पर बैठकर ही मरीजों को देखते आ रहे हैं। उनकी जांच का तरीका आज के डॉक्टरों से बिल्कुल अलग है, वह पहले मरीज की नाड़ी थामकर बीमारी भांपने की कोशिश करते हैं और उसके बाद ही यह तय करते हैं कि किस जड़ी-बूटी की जरूरत है। यह हुनर उन्हें किसी मेडिकल कॉलेज ने नहीं, बल्कि वैद्यों के अपने पारंपरिक समाज ने सिखाया है, जहां यह ज्ञान बरसों से गुरु-शिष्य परंपरा के जरिए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहा है।
घर पर ही तैयार होती हैं दर्जनों औषधियां
उनके घर में ही कई तरह की आयुर्वेदिक औषधियां और हर्बल पाउडर बनाए जाते हैं। इनमें जंगली शतावर, बेल की गिरी का चूर्ण, करेले का पाउडर, नीम की पत्ती और छाल से बना चूर्ण, अश्वगंधा, जराकुश और तुलसी पंचांग जैसी सामग्री शामिल है। हर मरीज को यह औषधियां एक जैसी नहीं, बल्कि उसकी बीमारी और शरीर की स्थिति देखकर अलग-अलग मात्रा और तरीके से दी जाती हैं, ठीक वैसे ही जैसे पुरानी आयुर्वेदिक किताबों में बताया गया है।
जोड़ों के दर्द से सर्दी-खांसी तक, सबसे ज्यादा भीड़ किनकी
प्रजापति बताते हैं कि उनके पास सबसे ज्यादा जोड़ों के दर्द, पेट से जुड़ी दिक्कतों, त्वचा रोग, सर्दी-जुकाम और शरीर की सामान्य कमजोरी के मरीज पहुंचते हैं, यानी ज्यादातर वही परेशानियां जिनमें लोग महंगे इलाज से पहले घरेलू और पारंपरिक नुस्खे आजमाना चाहते हैं। उनका कहना है कि आयुर्वेदिक तरीके से कई मरीजों को राहत मिल जाती है, लेकिन वह इसे हर बीमारी का इलाज नहीं मानते, इसलिए बीमारी गंभीर दिखते ही मरीज को तुरंत डॉक्टर के पास भेज देते हैं ताकि देरी की वजह से नुकसान न हो।
चार जिलों से जुड़ा भरोसे का रिश्ता
गोंडा के अलावा बलरामपुर, श्रावस्ती, बहराइच और आसपास के कई इलाकों से लोग सिर्फ इस भरोसे पर यहां पहुंचते हैं कि पुरानी पद्धति से उन्हें राहत मिल सकती है। बड़े अस्पतालों और आधुनिक मशीनों के इस दौर में भी जड़ी-बूटियों और नाड़ी परीक्षण पर टिका यह यकीन कम नहीं हुआ है, यही वजह है कि इस छोटे से घरेलू इलाज केंद्र पर मरीजों की आवाजाही रोज बनी रहती है।



















