मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में रहने वाली 107 वर्षीय बुजुर्ग महिला अल्ला पालि अपने सहज और प्रसन्नचित्त स्वभाव के कारण पूरे क्षेत्र में आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। परिवार के मुताबिक वे जिले की सबसे बुजुर्ग जीवित महिलाओं की सूची में शुमार हैं। उम्र के इस दुर्लभ मुकाम पर भी उनके चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान तैरती रहती है। वे अपने लंबे जीवन का राज किसी जटिल चिकित्सा पद्धति, महंगी दवाओं या विशेष उपचारों को नहीं, बल्कि जीवनभर अपनाई गई खान-पान की सादगी और नियमित दिनचर्या को मानती हैं।
सादा घरेलू आहार और अनुशासित दिनचर्या ही सबसे बड़ी ताकत
औपचारिक शिक्षा कभी न लेने के बावजूद अल्ला पालि ने सेहत के बुनियादी नियमों को हमेशा प्राथमिकता दी। उनका साफ तौर पर मानना है कि एक स्वस्थ काया के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि भोजन पूरी तरह सात्विक, संतुलित और समय पर लिया जाए। उन्होंने ताउम्र बाहर की चीजों या गरिष्ठ भोजन के बजाय घर की रसोई में बने सामान्य भोजन को ही अपनाया और खान-पान में किसी भी तरह की लापरवाही बरतने से दूरी बनाए रखी। यही सतत अनुशासन आज 107 वर्ष की उम्र पार करने के बाद भी उन्हें ऊर्जावान बनाए रखता है और परिवार के बीच सक्रिय रहने का संबल देता है।
पांच पीढ़ियों को एक डोर में बांधने वाला पारिवारिक अनुभव
अल्ला पालि की जिंदगी महज एक व्यक्ति का सफर नहीं, बल्कि पांच पीढ़ियों को आपस में जोड़ने वाली एक मजबूत कड़ी है। घर के नन्हें बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक सभी उनके साथ बैठकर बातें करना और समय गुजारना बेहद पसंद करते हैं। परिवार के लोगों का कहना है कि उनकी मौजूदगी घर के माहौल को जोड़े रखती है और पूरे कुनबे को एक सूत्र में पिरोकर रखती है। जीवन भर के संचित अनुभव, पुरानी यादें और किस्से आज उनके परिजनों के लिए किसी अनमोल पारिवारिक धरोहर की तरह हैं।
संतोष, वैवाहिक जीवन की स्मृतियां और खुशहाली का जीवन मंत्र
सेंचुरी से भी आगे निकल चुकी उम्र में भी अल्ला पालि अपने वैवाहिक जीवन की यादों को साझा करते हुए भावुक और प्रसन्न हो जाती हैं। आज भी सुहागन होने का भाव उनके चेहरे पर एक अलग ही चमक और आत्मविश्वास बिखेर देता है। परिवारजन उनके दीर्घायु और निरोगी जीवन को एक वरदान के रूप में देखते हैं। विशेषज्ञों के नजरिए से दीर्घायु होने के पीछे आनुवंशिक या अन्य स्वास्थ्य संबंधी पहलू हो सकते हैं, किंतु दादी के व्यक्तिगत जीवन दर्शन में शुद्ध आहार, मन का गहरा संतोष और अपनों का अटूट स्नेह ही सबसे बड़ा संबल रहा है। 107 वर्ष की दहलीज पर उनका यह उल्लास नई पीढ़ी के लिए एक अनूठी सीख पेश करता है।



















