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वायरल बुखार में कारगर गिलोय की असली पहचान और इसके सुरक्षित इस्तेमाल से जुड़ी जरूरी बातेंस्वास्थ्य
28 अग॰ 2026, 10:32 am (2 घंटे पहले)· 2

वायरल बुखार में कारगर गिलोय की असली पहचान और इसके सुरक्षित इस्तेमाल से जुड़ी जरूरी बातें

गिलोय को आयुर्वेद में अमृता और गुडूची भी कहा जाता है, जो बुखार और कमजोरी दूर करने में सहायक है। आयुष चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर मोहम्मद इकबाल के अनुसार, गिलोय का सेवन करने से पहले उसकी सही पहचान करना और डॉक्टर से सलाह लेना बेहद जरूरी है।

मौसम में बदलाव आते ही सर्दी, खांसी और वायरल बुखार जैसी समस्याएं तेजी से फैलने लगती हैं। ऐसे समय में लोग अक्सर पारंपरिक आयुर्वेदिक उपायों का सहारा लेते हैं, जिनमें गिलोय सबसे प्रमुख जड़ी-बूटी मानी जाती है। आयुर्वेद में इसे अमृता भी कहा जाता है, जिसका अर्थ अमृत के समान फलदायी होना है। प्राचीन काल से ही शरीर को बीमारियों से बचाने और बुखार से राहत दिलाने के लिए इसके तने और पत्तियों का उपयोग किया जाता रहा है। जब भी मौसमी बीमारियां लोगों को परेशान करती हैं, तब गिलोय का घरेलू नुस्खे या पेय के रूप में इस्तेमाल काफी बढ़ जाता है। आयुष चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर मोहम्मद इकबाल के अनुसार, बुखार के समय शरीर को ताकत देने और संक्रमण से लड़ने में गिलोय की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।

आयुर्वेदिक परंपरा में गिलोय का महत्व और स्वास्थ्य लाभ

गिलोय कोई आधुनिक या हाल ही में खोजी गई औषधि नहीं है, बल्कि भारतीय चिकित्सा पद्धति में इसका इतिहास हजारों साल पुराना है। संस्कृत और आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसे गुडूची और अमृता जैसे पवित्र नामों से पुकारा गया है। इस बेल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके औषधीय प्रयोग में केवल पत्तियां ही काम नहीं आतीं, बल्कि इसके तने और पूरी बेल का इस्तेमाल अलग-अलग बीमारियों के इलाज में किया जाता है। यही कारण है कि प्राचीन समय से लेकर आज तक आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली में गिलोय को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है।

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यदि किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक के मार्गदर्शन में इसका सेवन किया जाए, तो यह शरीर को अनगिनत लाभ पहुंचा सकती है। पारंपरिक रूप से गिलोय का उपयोग पाचन तंत्र से जुड़ी गड़बड़ियों को ठीक करने, शरीर में होने वाले बुखार को उतारने, अंदरूनी सूजन को कम करने और जोड़ों के दर्द या समस्याओं में राहत पाने के लिए किया जाता है। इसके अलावा, गिलोय को शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी को मजबूत करने वाली एक बेहतरीन जड़ी-बूटी माना गया है। कई लोग ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी परेशानियों को दूर करने के लिए भी डॉक्टर की सलाह से इसका नियमित सेवन करते हैं।

वायरल फीवर और बदलते मौसम में सेवन का सही तरीका

आयुष चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर मोहम्मद इकबाल का कहना है कि आयुर्वेदिक चिकित्सा में बुखार के इलाज के लिए गिलोय का इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है। खासकर जब वायरल फीवर का प्रकोप बढ़ता है, तब लोग इसके तने को पानी में उबालकर काढ़ा तैयार करते हैं या फिर बाजार में मिलने वाले तैयार गिलोय जूस का सेवन करते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति के शरीर की बनावट, उसकी उम्र और बीमारी की स्थिति अलग होती है। यही वजह है कि गिलोय लेने की सही मात्रा और तरीका भी हर मरीज के लिए भिन्न हो सकता है। इसलिए बिना किसी विशेषज्ञ की सलाह के इसका अत्यधिक या गलत तरीके से सेवन करने के बजाय हमेशा किसी पंजीकृत आयुर्वेदिक डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

असली और नकली बेल की पहचान करने के आसान तरीके

आजकल पार्कों, घरों के आसपास की दीवारों और पेड़ों पर कई तरह की हरी बेलें चढ़ी हुई दिखाई देती हैं। लेकिन यह समझना बेहद जरूरी है कि हर हरी बेल गिलोय नहीं होती। अगर आप खुद बेल से गिलोय तोड़कर इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो उसकी सही पहचान होना बहुत आवश्यक है। असली गिलोय की पत्तियों का आकार आमतौर पर दिल के आकार यानी हार्ट शेप जैसा होता है। इसका तना हरे रंग का और थोड़ा मोटा होता है। गिलोय के तने की सबसे बड़ी पहचान यह है कि उसकी सतह पर छोटे-छोटे गोल उभार नहीं होते, बल्कि वह काफी हद तक चिकना दिखाई देता है।

गिलोय की बेल आमतौर पर किसी अन्य पेड़ का सहारा लेकर ऊपर की ओर बढ़ती है। अगर आप अपने आसपास उगी किसी बेल को लेकर थोड़े भी असमंजस में हैं या बाजार से खरीदी गई बेल की शुद्धता पर शक है, तो उसका उपयोग तुरंत रोक देना चाहिए। ऐसी स्थिति में किसी अनुभवी जड़ी-बूटी जानकार या आयुष चिकित्सक को दिखाकर बेल की पुष्टि कर लेना ही सुरक्षा के लिहाज से बेहतर कदम होता है। गलत बेल का सेवन स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह भी साबित हो सकता है।

बाजार से गिलोय खरीदते समय ध्यान देने योग्य बातें

यदि आप किसी दुकान या स्टोर से गिलोय से बने उत्पाद खरीद रहे हैं, तो केवल डिब्बा उठाकर घर ले आना काफी नहीं है। खरीदारी करते समय पैकेट पर दी गई जानकारियों को ध्यान से पढ़ना आवश्यक है। सबसे पहले यह जांचें कि उत्पाद किस रूप में उपलब्ध है, जैसे कि गिलोय चूर्ण, सूखी बेल के टुकड़े या कोई तैयार किया गया तरल पेय। इसके बाद पैकेजिंग पर लिखी सामग्री की सूची, अनुशंसित मात्रा, निर्माण तिथि, बैच नंबर और इस्तेमाल करने के निर्देशों को ध्यान से पढ़ें।

खुली हुई गिलोय या बिना लेबल वाले सामान को खरीदने से हमेशा बचना चाहिए और केवल विश्वसनीय कंपनी या दुकान से ही सीलबंद उत्पाद लेना चाहिए। अगर आप पहली बार गिलोय का इस्तेमाल करने जा रहे हैं, तो अपनी शारीरिक आवश्यकता और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार यह तय करने के लिए आयुष डॉक्टर से सलाह लें कि आपके लिए कौन सा रूप सबसे ज्यादा असरदार रहेगा।

डॉक्टर से परामर्श लेते समय पूछें ये तीन अहम सवाल

यदि आप गिलोय को अपनी नियमित जीवनशैली या दिनचर्या में शामिल करने की योजना बना रहे हैं, तो डॉक्टर के पास जाने पर तीन मुख्य बातें जरूर स्पष्ट कर लें। पहली बात यह कि आपको प्रतिदिन इसकी कितनी मात्रा में खुराक लेनी चाहिए। दूसरी बात यह कि आपके शरीर के लिए काढ़ा, चूर्ण, वटी या जूस में से कौन सा रूप सबसे ज्यादा फायदेमंद रहेगा। और तीसरी बात यह कि इस औषधि का इस्तेमाल लगातार कितने दिनों या हफ्तों तक करना सुरक्षित रहेगा।

इन तीनों सवालों के जवाब हर इंसान की उम्र, वजन और पुरानी बीमारियों के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं। विशेष रूप से यदि आप पहले से ही किसी अन्य बीमारी की दवाएं ले रहे हैं या आपको कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, तो गिलोय की शुरुआत करने से पहले अपने डॉक्टर को पूरी जानकारी जरूर दें ताकि किसी भी तरह के विपरीत प्रभाव से बचा जा सके।

सवाल-जवाब

गिलोय को आयुर्वेद में किन अन्य नामों से जाना जाता है?
गिलोय को आयुर्वेद में अमृता और गुडूची के नाम से भी जाना जाता है।
असली गिलोय की बेल को कैसे पहचाना जा सकता है?
असली गिलोय की पत्तियां दिल के आकार की होती हैं और इसका हरा तना थोड़ा मोटा व चिकना होता है, जिस पर छोटे गोल उभार नहीं होते।
वायरल फीवर में गिलोय का सेवन किस रूप में किया जाता है?
वायरल फीवर के दौरान लोग गिलोय के तने से बना काढ़ा या बाजार में मिलने वाला गिलोय जूस का सेवन करते हैं।
गिलोय की सही खुराक तय करने के लिए किससे सलाह लेनी चाहिए?
गिलोय की सही मात्रा, रूप और सेवन की अवधि तय करने के लिए हमेशा आयुष या आयुर्वेदिक डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
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