दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही देश भर में जल संकट और सूखे की गहरी चिंताएं सामने आने लगी हैं। इस साल का मानसून बेहद असामान्य रहा है, जहां राष्ट्रीय स्तर पर वर्षा सामान्य से 12 प्रतिशत कम दर्ज की गई है। औसत बारिश में इस कमी के कारण देश का 51 प्रतिशत क्षेत्र अब गंभीर सूखे जैसी परिस्थितियों का सामना कर रहा है। असमान वर्षा वितरण ने कृषि और जल भंडारण के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
विदाई की समयसीमा और असमान बारिश का प्रभाव
मौसम चक्र के अनुसार मानसून की विदाई की प्रक्रिया 19 सितंबर से शुरू हो चुकी है और इसके 15 अक्टूबर तक पूरे देश से पूरी तरह विदा होने की संभावना है। इस पूरे मौसम के दौरान वर्षा के वितरण में भारी विषमता देखने को मिली। जहां कुछ क्षेत्रों में पिछले 20 वर्षों में सबसे कम वर्षा दर्ज की गई, वहीं देश के कुछ अन्य हिस्सों में बीते 17 वर्षों का सर्वाधिक वर्षा रिकॉर्ड टूट गया। यह असमानता भूजल स्तर और जलाशयों की क्षमता पर सीधे असर डाल रही है।
कृषि और जनजीवन पर मंडराता खतरा
आधे से अधिक देश में सूखे जैसी परिस्थितियों के कारण आने वाले महीनों में रबी फसलों की बुवाई और पेयजल आपूर्ति पर सीधा दबाव बढ़ सकता है। जिन इलाकों में बारिश की भारी कमी रही है, वहां मिट्टी में नमी का स्तर तेजी से गिरा है। वहीं अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अचानक आई बाढ़ और जलजमाव ने स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया है। 15 अक्टूबर तक मानसून की पूर्ण वापसी के बाद पानी की उपलब्धता और आगामी शुष्क मौसम की चुनौतियों से निपटना एक प्रमुख प्राथमिकता बन जाएगा।


















