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झारखंड में सिमटा नक्सलियों का दायरा, सिर्फ 17 वांटेड बचे पर जेल में बंद एक हजार से ज्यादा उग्रवादियों पर पुलिस की पैनी नजरझारखंड
23 अग॰ 2026, 9:20 am (2 घंटे पहले)· 2

झारखंड में सिमटा नक्सलियों का दायरा, सिर्फ 17 वांटेड बचे पर जेल में बंद एक हजार से ज्यादा उग्रवादियों पर पुलिस की पैनी नजर

झारखंड में सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों के चलते वांटेड नक्सलियों की संख्या सिमटकर 17 रह गई है। हालांकि, पुलिस अब जेल में बंद एक हजार से अधिक उग्रवादियों और उनके पुराने नेटवर्क पर भी विशेष नजर रख रही है।

झारखंड में सुरक्षा बलों द्वारा लंबे समय से चलाए जा रहे नक्सल विरोधी अभियानों के अब दूरगामी परिणाम सामने आने लगे हैं। पिछले कुछ समय में शीर्ष स्तर के कई बड़े नेताओं की गिरफ्तारी हुई है, जबकि विभिन्न मुठभेड़ों में कई कुख्यात कैडर मारे गए हैं और बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। इन सब कार्रवाइयों के चलते प्रतिबंधित संगठनों की जमीनी ताकत काफी कमजोर हो गई है। इसी साल जुलाई के महीने में एक करोड़ रुपये के इनामी माओवादी नेता मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी को इस पूरे अभियान की एक बहुत बड़ी कामयाबी के रूप में देखा गया था। हालांकि, तमाम सफलताओं के बावजूद पुलिस महकमे की चौकसी जरा भी कम नहीं हुई है और अब झारखंड पुलिस का पूरा फोकस राज्य की अलग-अलग जेलों में बंद एक हजार से ज्यादा नक्सलियों और उग्रवादियों पर टिक गया है।

जेलों के भीतर से चलने वाले नेटवर्क पर कड़ा पहरा

पुलिस मुख्यालय से मिली जानकारियों के मुताबिक, सुरक्षा एजेंसियां अब सलाखों के पीछे बंद ऐसे कैदियों की हरकतों और उनके पुराने संपर्कों का बारीकी से हिसाब लगा रही हैं। हाल के दिनों में ताबड़तोड़ गिरफ्तारियों और आत्मसमर्पण के कारण भले ही संगठन का मैदानी ढांचा चरमरा गया हो, लेकिन पुलिस जानती है कि खतरा पूरी तरह टला नहीं है। झारखंड पुलिस का मानना है कि जेलों में बंद कुछ बेहद कुख्यात नक्सलियों के पुराने लिंक और प्रभाव अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। इस बात की गहरी आशंका बनी हुई है कि जेल के अंदर से ही कोई पुराना चेहरा अपने बचे हुए संपर्कों का इस्तेमाल करके संगठन को दोबारा खड़ा करने की साजिश रच सकता है। यही मुख्य वजह है कि राज्य की विभिन्न जेलों में बंद इन तमाम तत्वों की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों पर बेहद कड़ी निगरानी रखी जा रही है ताकि किसी भी नापाक कोशिश को समय रहते विफल किया जा सके।

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अब सिर्फ 17 वांटेड नक्सली बचे जिनकी तलाश जारी

हाल ही में गुमला जिले के डुमरी इलाके में एक और बड़ी सफलता हाथ लगी जब जेजेएमपी के पांच लाख रुपये के इनामी सब-जोनल कमांडर रामदेव लोहरा समेत कुल चार उग्रवादियों को धर दबोचा गया। इस कार्रवाई में रामदेव लोहरा के अलावा एरिया कमांडर अरविंद नायक और दो अन्य सदस्य पुलिस के हत्थे चढ़े। सुरक्षा बलों ने इनके पास से AK-56, SLR, सेमी ऑटोमैटिक राइफल, पिस्तौल, भारी मात्रा में कारतूस और अन्य सामग्रियां भी बरामद की हैं। पुलिस सूत्रों के अनुसार, इन गिरफ्तारियों के बाद अब झारखंड की धरती पर सक्रिय वांटेड नक्सलियों की कुल संख्या घटकर मात्र 17 पर आ गई है। इनमें से 9 अकेले भाकपा माओवादी संगठन से जुड़े हुए बताए जा रहे हैं। इन बचे हुए वांटेड उग्रवादियों को दबोचने के लिए झारखंड पुलिस के साथ-साथ केंद्रीय सुरक्षा बल भी लगातार संयुक्त अभियान चला रहे हैं।

चालू वर्ष के आंकड़े और आईजी ऑपरेशन का बयान

झारखंड पुलिस द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी से 5 अगस्त 2026 के बीच की अवधि में कुल 103 नक्सलियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसी समयावधि के दौरान 46 नक्सलियों ने हथियार छोड़कर आत्मसमर्पण का रास्ता चुना, जबकि सुरक्षा बलों के साथ हुई अलग-अलग मुठभेड़ों में 22 नक्सली मारे गिराए गए। इस दौरान पुलिस ने भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद बरामद किया है जिनमें कुल 98 हथियार, 7,470 कारतूस और 11 किलोग्राम विस्फोटक शामिल हैं। इस सूची में एक करोड़ रुपये का इनामी माओवादी मिसिर बेसरा भी शामिल है। पुलिस का स्पष्ट तौर पर यह मानना है कि लगातार और आक्रामक अभियानों ने इन नक्सली संगठनों की कमर पूरी तरह तोड़ दी है।

आईजी ऑपरेशन नरेंद्र कुमार सिंह के मुताबिक, पुलिस का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जेल के अंदर बैठे किसी भी नक्सली या कुख्यात अपराधी को किसी भी प्रकार की साजिश रचने का मौका न मिले। इस खतरे से निपटने के लिए जेल परिसरों के भीतर विशेष निगरानी तंत्र सक्रिय किया गया है। पुलिस केवल कैदियों की सामान्य गतिविधियों पर ही नजर नहीं गड़ाए हुए है, बल्कि उनके पुराने संपर्कों और बाहरी नेटवर्क की गहराई से थाह ली जा रही है। इसका साफ संदेश यही है कि झारखंड में उग्रवाद विरोधी रणनीति अब केवल घने जंगलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि जेल की सलाखों के पीछे छिपे पुराने चेहरों और उनके सिंडिकेट को नेस्तनाबूद करना भी पुलिस की कार्ययोजना का अहम हिस्सा बन चुका है।

सवाल-जवाब

झारखंड में अब कुल कितने वांटेड नक्सली बचे हैं?
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, हालिया गिरफ्तारियों के बाद झारखंड में अब केवल 17 वांटेड नक्सली ही बचे हैं जिनकी तलाश जारी है।
कितने इनामी माओवादी मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी कब हुई थी?
एक करोड़ रुपये के इनामी माओवादी नेता मिसिर बेसरा को जुलाई महीने में गिरफ्तार किया गया था।
1 जनवरी से 5 अगस्त 2026 तक कितने नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया?
इस अवधि के दौरान कुल 46 नक्सलियों ने हथियार छोड़कर आत्मसमर्पण किया है।
जेल में बंद नक्सलियों पर पुलिस क्यों नजर रख रही है?
पुलिस को आशंका है कि जेल के अंदर बंद कुख्यात नक्सली अपने पुराने नेटवर्क के जरिए संगठन को दोबारा सक्रिय करने की साजिश रच सकते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Ravikash Gupta@ravikash·11 मिनट पहले

झारखंड में वांटेड नक्सलियों का सिमटकर 17 पर आना और जेलों में बंद एक हजार से ज्यादा उग्रवादियों पर पैनी नजर रखना सुरक्षा व्यवस्था की एक बड़ी सफलता है। आर्थिक और निवेश के नजरिए से यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस क्षेत्र में सुरक्षा का मजबूत माहौल बनने से खनन, बुनियादी ढांचे के विकास और औद्योगिक निवेश को नया प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·11 मिनट पहले

झारखंड में उग्रवाद के दायरे का सिमटना केवल कानून-व्यवस्था की जीत नहीं है, बल्कि यह केंद्र और राज्य की रणनीतिक समन्वय का परिणाम है। अब जब सक्रिय वांटेड की संख्या मात्र 17 रह गई है और जेलों में बंद कैदियों पर शिकंजा कसा जा रहा है, तो प्रशासनिक मशीनरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना होगी कि वैचारिक पुनर्उत्थान न हो। खुफिया तंत्र और जेल सुधारों के बीच बेहतर तालमेल से ही इस सुरक्षा लाभ को दीर्घकालिक स्थिरता में बदला जा सकेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

झारखंड में वांटेड नक्सलियों का सिमटकर 17 रह जाना और मिसिर बेसरा जैसी गिरफ्तारियां सुरक्षा बलों की बड़ी रणनीतिक जीत हैं। हालांकि, जैसा कि रिपोर्ट में उजागर किया गया है, जेल में बंद एक हजार से अधिक उग्रवादियों की निगरानी अब सबसे बड़ी चुनौती है। यदि सुधारात्मक गृहों के भीतर खुफिया तंत्र मजबूत नहीं किया गया, तो ये कैदी अपने पुराने नेटवर्क के जरिए भूमिगत संगठनों को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर सकते हैं। आने वाले समय में पुलिस और खुफिया एजेंसियों के लिए जेलों के अंदर का सुरक्षा ऑडिट और संवाद पर प्रतिबंध ही वामपंथी उग्रवाद के पूर्ण सफाए की दिशा में निर्णायक साबित होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

यह सफलता सिर्फ मैदानी कार्रवाइयों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि खुफिया आधारित अभियानों ने उग्रवाद की रीढ़ तोड़ दी है। हालांकि, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है, जेलों के भीतर से नेटवर्क संचालन की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश और अन्य पड़ोसी राज्यों के सीमावर्ती जिलों में भी इस प्रकार के संगठित अपराध और उग्रवादी अवशेषों पर इसी तरह की पैनी नजर रखने की आवश्यकता है ताकि ये तत्व सीमा पार से अपनी गतिविधियों को दोबारा सक्रिय न कर सकें। आने वाले समय में अंतर-राज्यीय खुफिया समन्वय और जेलों की सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक कड़ा करना ही इस समस्या का स्थायी समाधान साबित होगा।

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