झारखंड के कोडरमा जिला स्थित डोमचांच प्रखंड की बंगाखलार पंचायत में आजादी के दशकों बाद भी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव बना हुआ है। यहां एक स्थानीय नदी पर पुल निर्माण न होने के कारण आधे दर्जन से अधिक गांवों की बड़ी आबादी को रोजाना अपनी जान जोखिम में डालकर आवाजाही करनी पड़ती है। बरसात के मौसम में जब नदी उफान पर होती है, तब ग्रामीणों की मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं। इस भौगोलिक बाधा का सबसे बुरा असर छोटे स्कूली बच्चों, बुजुर्गों, गंभीर रूप से बीमार मरीजों और गर्भवती महिलाओं की दिनचर्या तथा सुरक्षा पर पड़ रहा है। नदी पार करने की सुरक्षित वैकल्पिक राह न होने से रोजाना हर मिनट बड़े हादसे की आशंका बनी रहती है।
शिक्षा पाने की राह में जानलेवा पानी का जोखिम
बंगाखलार पंचायत में स्थित सरकारी विद्यालयों तक पहुंचने के लिए स्कूली छात्र-छात्राओं को रोज एक भयावह दौर से गुजरना पड़ता है। पानी के बहाव और गहराई की परवाह किए बिना बच्चे नदी में उतरने को मजबूर हैं। कक्षा पांचवीं में पढ़ने वाली छात्रा अंशु कुमारी ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि प्रतिदिन स्कूल पहुंचने के लिए नदी के तेज बहाव के बीच से होकर गुजरना पड़ता है। कई बार जलस्तर घुटनों से ऊपर और कमर तक पहुंच जाता है। ऐसे में पानी के तेज थपेड़ों के बीच संतुलन बिगड़ने और बह जाने का गहरा डर बना रहता है, लेकिन शिक्षा प्राप्त करने की मजबूरी में बच्चों के पास इसके अलावा कोई अन्य मार्ग उपलब्ध नहीं है।
सिर पर बस्ता और हाथ में जूते लेकर पार करते हैं नदी
स्कूली बच्चे अपनी किताबों और पोशाक को पानी में भीगने से बचाने के लिए अनोखी तरकीब अपनाते हैं। नदी तट पर पहुंचते ही बच्चे अपने जूते और मोजे उतारकर हाथों में ले लेते हैं। वहीं, किताबों और कॉपियों से भरे भारी बस्ते को सिर पर संतुलित करके पानी के बीच से कदम आगे बढ़ाते हैं। नदी का दूसरा किनारा सुरक्षित पार करने के बाद बच्चे पानी सुखाकर दोबारा जूते-मोजे पहनते हैं और फिर विद्यालय की कक्षाओं में पढ़ाई के लिए जाते हैं। बारिश के दिनों में जब अचानक पहाड़ी इलाकों से पानी आने से नदी का जलस्तर बढ़ जाता है, तब स्कूल गए बच्चे दूसरे छोर पर ही फंस जाते हैं। ऐसे में पानी का बहाव कम होने तक उन्हें घंटों इंतजार करना पड़ता है, जिसके बाद ही वे सुरक्षित घर लौट पाते हैं।
खाट के सहारे अस्पताल पहुंचते हैं मरीज
पुल के अभाव में स्वास्थ्य आपातकाल के समय स्थिति बेहद भयावह रूप ले लेती है। स्थानीय ग्रामीण फौजदार सिंह ने गांव के इस गंभीर संकट पर बात करते हुए बताया कि यह समस्या आज की नहीं बल्कि कई वर्षों पुरानी है। जब गांव में कोई व्यक्ति अचानक बीमार पड़ जाता है या किसी गर्भवती महिला को त्वरित चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है, तो चारपाई अथवा खाट ही एकमात्र सहारा बनती है। ग्रामीण बीमार व्यक्ति को खाट पर लिटाकर चार लोग अपने कंधों पर उठाकर उफनती नदी को पार कराते हैं। बरसात के दिनों में नदी की तेज धार के बीच मरीज को खाट पर ढोकर ले जाना बेहद जोखिम भरा काम होता है, जिसमें थोड़ी सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है।
जनप्रतिनिधियों के वादे और प्रशासनिक अनदेखी
ग्रामीणों के अनुसार चुनावों के समय राजनीतिक दलों के नेता और जनप्रतिनिधि गांव में वोट मांगने तो जरूर पहुंचते हैं। हर चुनाव के दौरान नदी पर पक्के पुल का निर्माण कराने का बड़े-बड़े वादों के साथ आश्वासन दिया जाता है। हालांकि, चुनाव समाप्त होते ही ये वादे कागजों तक सीमित रह जाते हैं और कई दशक बीत जाने के बावजूद नदी पर पुल का निर्माण नहीं हो सका है।
अधिकारियों से बार-बार गुहार पर नहीं मिला समाधान
इस विषय पर बंगाखलार के स्थानीय मुखिया शिव शंकर राय ने बताया कि पंचायत और ग्रामीणों की ओर से इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए लगातार प्रयास किए गए हैं। उन्होंने प्रखंड स्तर से लेकर जिला स्तर के उच्च अधिकारियों को कई बार ज्ञापन देकर पक्के पुल के निर्माण की मांग की है। इसके बावजूद अब तक प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस और सकारात्मक पहल नहीं की गई है। मुखिया का कहना है कि यदि नदी पर पुल का निर्माण करा दिया जाए, तो नदी के दोनों किनारों पर बसे गांवों का आपसी संपर्क सुगम हो जाएगा। इससे न केवल सैकड़ों ग्रामीणों की रोजाना की परेशानी खत्म होगी, बल्कि मासूम बच्चों को भी रोजाना जान जोखिम में डाले बिना सुरक्षित माहौल में स्कूल जाने का अधिकार मिल सकेगा।



















