झारखंड का देवघर शहर अपनी गहरी आध्यात्मिक पहचान और बारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल बाबा बैद्यनाथ धाम के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। वर्ष भर देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु यहां बाबा भोलेनाथ के दर्शन, जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। हालांकि देवघर की पहचान सिर्फ उसके भव्य मंदिरों, धार्मिक अनुष्ठानों और पवित्र वातावरण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां की गलियों में बसने वाली खान-पान की सदियों पुरानी परंपरा भी उतनी ही विशिष्ट है। इन संकरी गलियों में मिलने वाले कई पारंपरिक पकवान अपनी अनूठी बनावट और खास स्वाद के कारण अन्य शहरों की तुलना में बिल्कुल अलग पहचान बनाते हैं। ऐसे ही चुनिंदा और मशहूर व्यंजनों में बाबा मंदिर के सिंह दरवाजा के पास मिलने वाला मोहनभोग सबसे प्रमुख माना जाता है, जिसकी भीनी-भीनी सुगंध मंदिर परिसर से बाहर निकलने वाले हर राहगीर को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है।
धीमी आंच पर छह से सात घंटे की कड़ी मेहनत से संवरता है स्वाद
बाबा बैद्यनाथ मंदिर के सिंह दरवाजा के समीप पहुंचते ही शुद्ध देसी घी की सोंधी महक वातावरण में घुलती महसूस होने लगती है। यह पारंपरिक मोहनभोग मुख्य रूप से उत्तम गुणवत्ता वाली सूजी, शुद्ध घी, गाढ़े खोवा और भरपूर सूखे मेवों के सटीक मिश्रण से पकाया जाता है। हलवाई इसे तैयार करने में किसी तरह की जल्दबाजी नहीं दिखाते, बल्कि इस पकवान को अपनी वास्तविक बनावट और गहरा स्वाद पाने के लिए लगभग 6 से 7 घंटे तक धीमी आंच पर लगातार भूनना और पकाना पड़ता है। यही लंबी और धैर्यपूर्ण प्रक्रिया इस मिठाई को बाजार में मिलने वाली सामान्य मिठाइयों से एकदम जुदा और खास बना देती है। बाबा मंदिर में पूजा-अर्चना संपन्न करने के बाद श्रद्धालु जब सिंह दरवाजा की ओर बढ़ते हैं, तो वे यहां रुककर गर्मागर्म ताजे मोहनभोग का आनंद लेना नहीं भूलते। इस व्यंजन की एक और बड़ी विशेषता यह है कि कई लोग इसे उपवास के दिनों में फलाहारी व्यंजन के रूप में भी चाव से खाते हैं।
ज्ञानदेव जजवारे की दुकान और पांच दशकों की अटूट परंपरा
सिंह दरवाजा के पास इस दुकान का संचालन करने वाले दुकानदार ज्ञानदेव जजवारे बताते हैं कि उनके यहां मोहनभोग तैयार करने का यह सिलसिला कोई नया नहीं है, बल्कि यह यात्रा 50 साल से भी अधिक पुरानी हो चुकी है। आधी सदी से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी इस दुकान पर उसी पुरानी पारंपरिक विधि और शुद्ध सामग्री के अनुपात का कड़ाई से पालन किया जा रहा है। ज्ञानदेव जजवारे के अनुसार, यह खास मिठास विशेष रूप से देवघर के सिंह दरवाजा के आसपास की गलियों में ही अपनी असली पहचान बनाए हुए है। बदलते दौर के साथ बाजार में खान-पान के कई आधुनिक विकल्प और नए स्वाद आए, परंतु मोहनभोग का वही पुराना और विश्वसनीय स्वाद आज भी पुरानी पीढ़ी से लेकर नई पीढ़ी तक के लोगों को खींच लाता है। यही कारण है कि यहां केवल स्थानीय निवासियों का ही जमावड़ा नहीं रहता, बल्कि बाहरी राज्यों और शहरों से आने वाले तीर्थयात्रियों की भी नियमित रूप से भारी भीड़ देखने को मिलती है।
प्रतिदिन 50 किलो की खपत और दूर-दराज तक मांग
दुकानदार के दिए गए आंकड़ों के अनुसार, इस छोटी सी दुकान पर रोजाना करीब 50 किलो मोहनभोग की खपत बहुत आसानी से हो जाती है। बाबा बैद्यनाथ के दर्शन करने पहुंचे श्रद्धालु न सिर्फ मौके पर इसका स्वाद चखते हैं, बल्कि इसे पवित्र प्रसाद मानकर डिब्बों में पैक करवाकर अपने साथ घर भी ले जाते हैं। इसके अतिरिक्त देवघर से दूर अन्य शहरों में रहने वाले कई लोग, जो किसी कारणवश मंदिर नहीं पहुंच पाते, वे भी यहां से विशेष रूप से मोहनभोग मंगवाकर इसका लुत्फ उठाते हैं। इस तरह सिंह दरवाजा की तंग गलियों में बनने वाला यह पारंपरिक स्वाद अब केवल स्थानीय भूगोल तक बंधा नहीं रह गया है, बल्कि बाहरी क्षेत्रों में भी इसकी मजबूत मांग बनी हुई है।
बीस साल पुराना भरोसा और किफायती दाम
दुकान पर नियमित आने वाले ग्राहक अमन द्वारी बताते हैं कि वे पिछले लगभग 20 वर्षों से निरंतर इस दुकान के मोहनभोग का आनंद ले रहे हैं। उनका अनुभव है कि शुद्ध घी और भरपूर खोवा के मेल से तैयार होने के कारण इसका स्वाद मुंह में रखते ही घुल जाता है और एक अलग ही तृप्ति देता है। मौजूदा समय में बाजार में यह पारंपरिक मोहनभोग करीब 200 रुपये प्रति किलो की किफायती दर पर उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके साथ ही इस दुकान पर मिलने वाली देवघर की गाढ़ी लस्सी और सर्दियों में गर्मागर्म गाजर का हलवा भी आने वाले ग्राहकों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। इस प्रकार बाबा की इस पावन नगरी में पूजा-अर्चना के साथ-साथ पारंपरिक व्यंजनों का लुत्फ उठाने की यह सांस्कृतिक परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी निरंतर आगे बढ़ रही है।



















