जापान में आशिमा अहलावत ने साधा सटीक निशाना, एशियाई खेलों में भारत की झोली में डाला रजत पदककिचन में तैयार करें मलाईदार अफगानी मोमोज, तीखे और क्रीमी स्वाद की आसान तरकीबवृषभ राशिफल 1 अक्टूबर 2026: कामकाज और घर में बनाएं तालमेल, मंगल बढ़ाएगा प्रभावसस्टेनेबिलिटी के क्षेत्र में अनंत अंबानी को न्यूकैसल यूनिवर्सिटी ने दी प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस की जिम्मेदारीफ्रांस के वित्तीय संकट और वैश्विक आंकड़ों के बीच यूरो संभला, सोना 4200 डॉलर के पारयूरो और पाउंड में सीमित हलचल के आसार, वैश्विक मुद्राओं, सोने और क्रिप्टो में दिखा दबावसंतान की दीर्घायु का महापर्व जीवित्पुत्रिका: पहली बार उपवास रख रही माताओं के लिए संपूर्ण विधि और नियमअक्टूबर 2026 में त्योहारों और विशेष दिनों की पूरी सूची: नवरात्रि, दशहरा, करवा चौथ से लेकर संयुक्त राष्ट्र दिवस तकमिथुन राशिफल 1 अक्टूबर 2026: बजट संभालें और बातचीत में बरतें स्पष्टता, मानसिक शांति बनाए रखने पर दें जोरसस्ते कबाड़ के झांसे में 9 लाख की डकैती, 12 जिलों में 1300 किमी पीछा कर दबोचे गए 7 बदमाश
झारखंड के मूलीबनी गांव में बंगू पत्तों से हस्तनिर्मित टोपियां तैयार कर आर्थिक संबल पा रहीं महिलाएंझारखंड
30 सित॰ 2026, 10:03 pm (1 घंटे पहले)· 0

झारखंड के मूलीबनी गांव में बंगू पत्तों से हस्तनिर्मित टोपियां तैयार कर आर्थिक संबल पा रहीं महिलाएं

जमशेदपुर से 100 किमी दूर स्थित मूलीबनी की ग्रामीण महिलाएं बिना किसी मशीन के पारंपरिक बंगू पत्तों से धूप और बारिश से बचाने वाली टोपियां बनाकर स्थानीय बाजारों में बेच रही हैं।

झारखंड के सुदूर ग्रामीण अंचलों में महिलाएं स्थानीय वन संपदा और पारंपरिक हुनर के दम पर अपनी आजीविका का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। जमशेदपुर शहर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर बसे मूलीबनी गांव में महिलाओं का एक समूह प्रकृति से सीधे प्राप्त होने वाले बंगू पत्तों का उपयोग करके विशेष प्रकार की सुरक्षात्मक टोपियां तैयार कर रहा है। बिना किसी आधुनिक मशीनरी अथवा कारखाने के चलने वाला यह जमीनी उपक्रम पूरी तरह से हाथों की कारीगरी पर निर्भर है, जिससे ग्रामीणों को तेज धूप और भारी मानसूनी वर्षा से बचाव का प्राकृतिक साधन मिल रहा है।

सीमित विकल्पों के बीच आजीविका का जरिया बना बंगू पत्ता

मूलीबनी में रोजगार के आधुनिक औपचारिक अवसर न के बराबर हैं, जिसके चलते ग्रामीण आबादी को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए स्थानीय परिवेश पर ही निर्भर रहना पड़ता है। गांव की निवासी जमुना के अनुसार, आजीविका के बहुत सीमित साधन होने की वजह से महिलाओं ने आसपास सहजता से मिलने वाले बंगू पत्तों को अपनी आय का जरिया बनाने का निर्णय लिया। इस पहल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि महिलाओं को अपने घरों और बाल-बच्चों को छोड़कर कहीं दूर पलायन नहीं करना पड़ता, बल्कि वे घरेलू जिम्मेदारियां निभाते हुए अतिरिक्त आय अर्जित कर अपने परिवार का खर्च चलाने में महत्वपूर्ण हाथ बंटा रही हैं।

ये भी पढ़ें

कारीगरी, उपयोगिता और हाथ से निर्माण की पूरी प्रक्रिया

वर्तमान समय में इस विशिष्ट हस्तशिल्प कार्य से गांव की करीब 10 से 15 महिलाएं सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। यह पूरा उद्यम सामूहिक सहयोग के आधार पर संचालित होता है। महिलाएं जंगलों से बंगू के पत्तों को एकत्रित करती हैं, फिर उनकी गुणवत्ता परखकर उन्हें आवश्यक आकार में तराशती हैं और फिर पूरी निपुणता के साथ अपने हाथों से सिलकर टोपी का रूप देती हैं। यह टोपी मुख्य रूप से खेतों में काम करने वाले किसान भाइयों और खेतिहर मजदूरों के लिए अत्यंत व्यावहारिक मानी जाती है, क्योंकि पत्तों की प्राकृतिक परत वर्षा के पानी को सिर पर नहीं ठहरने देती और भीषण गर्मी में चुभती धूप से भी ठंडक प्रदान करती है।

स्थानीय हाट-बाजारों में बिक्री और व्यापक पहुंच की उम्मीद

तैयार की गई इन टोपियों को महिलाएं स्थानीय ग्रामीण हाटों, साप्ताहिक बाजारों और क्षेत्रीय मेलों में बिक्री के लिए ले जाती हैं। बाजार में एक टोपी की कीमत 10 से 20 रुपये के बीच मिलती है। प्रति टोपी मिलने वाली यह राशि पहली नजर में भले ही सीमित प्रतीत होती हो, लेकिन जब अधिक मात्रा में टोपियों का निर्माण और विक्रय होता है, तो इससे संचित होने वाला कुल लाभ इन महिलाओं के लिए सम्मानजनक आर्थिक संबल बन जाता है। महिलाओं का मानना है कि इस पहल ने न केवल उनकी प्राचीन हस्तकला और पारंपरिक पद्धतियों को विलुप्त होने से बचाया है, बल्कि उन्हें कठिन मजदूरी के लिए भटकने से भी राहत दी है। समूह की आकांक्षा है कि उनके इन पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों को बड़े शहरी बाजारों तक सीधी पहुंच मिले, जिससे उनके उद्यम का विस्तार हो सके और उनकी दैनिक आय में और इजाफा हो सके।

सवाल-जवाब

मूलीबनी गांव किस शहर से और कितनी दूरी पर स्थित है?
मूलीबनी गांव झारखंड के जमशेदपुर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
महिलाएं टोपियां बनाने के लिए किस प्राकृतिक संसाधन का उपयोग करती हैं?
महिलाएं इन टोपियों को बनाने के लिए आसपास आसानी से मिलने वाले बंगू के पत्तों का उपयोग करती हैं।
इस टोपी की मुख्य उपयोगिता और विशेषताएं क्या हैं?
यह टोपी बरसात के पानी और तेज धूप से सिर का बचाव करती है, जो विशेष रूप से खेतों में काम करने वाले ग्रामीणों के लिए बहुत उपयोगी है।
इस निर्माण कार्य से गांव की कितनी महिलाएं जुड़ी हुई हैं?
वर्तमान में मूलीबनी गांव की करीब 10 से 15 महिलाएं मिलकर इस काम से जुड़ी हुई हैं।
बाजार में एक टोपी किस कीमत पर बेची जाती है?
एक टोपी की कीमत स्थानीय हाट और मेलों में लगभग 10 से 20 रुपये के बीच होती है।
गांव की महिलाएं इस काम को आगे बढ़ाने के लिए क्या चाहती हैं?
महिलाएं चाहती हैं कि उनके इन प्राकृतिक उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंच मिले, ताकि उनकी आमदनी में और वृद्धि हो सके।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·41 मिनट पहले

सिर्फ़ 10 से 20 रुपये में बिकने वाली ये टोपियां सुनकर अच्छा लगा कि महिलाएं बिना कहीं बाहर गए घर बैठे ही इतनी मेहनत से अपना चूल्हा-चौका संभाल रही हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·41 मिनट पहले

अर्जुन जी, बात सही है आपकी, पर 10-20 रुपये में इतनी मेहनत का मोल सच में मिल भी पाता होगा या नहीं, यह सोचना थोड़ा मुश्किल लगता है।

Rohan Verma@rohan-verma·53 मिनट पहले

झारखंड के इन गांवों की महिलाएं बिना मशीनों के पत्तों से ऐसी कमाल की टोपियां बना रही हैं, जो वाकई काबिले-तारीफ है। पलायन रोके बिना रोज़गार का यह ज़रिया बहुत बढ़िया है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·52 मिनट पहले

रोहन भाई, बात तो सही है पर दस-बीस रुपये में बेचने से सचमुच कितना घर चलता होगा? इसमें थोड़ी उलझन है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp