झारखंड के सुदूर ग्रामीण अंचलों में महिलाएं स्थानीय वन संपदा और पारंपरिक हुनर के दम पर अपनी आजीविका का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। जमशेदपुर शहर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर बसे मूलीबनी गांव में महिलाओं का एक समूह प्रकृति से सीधे प्राप्त होने वाले बंगू पत्तों का उपयोग करके विशेष प्रकार की सुरक्षात्मक टोपियां तैयार कर रहा है। बिना किसी आधुनिक मशीनरी अथवा कारखाने के चलने वाला यह जमीनी उपक्रम पूरी तरह से हाथों की कारीगरी पर निर्भर है, जिससे ग्रामीणों को तेज धूप और भारी मानसूनी वर्षा से बचाव का प्राकृतिक साधन मिल रहा है।
सीमित विकल्पों के बीच आजीविका का जरिया बना बंगू पत्ता
मूलीबनी में रोजगार के आधुनिक औपचारिक अवसर न के बराबर हैं, जिसके चलते ग्रामीण आबादी को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए स्थानीय परिवेश पर ही निर्भर रहना पड़ता है। गांव की निवासी जमुना के अनुसार, आजीविका के बहुत सीमित साधन होने की वजह से महिलाओं ने आसपास सहजता से मिलने वाले बंगू पत्तों को अपनी आय का जरिया बनाने का निर्णय लिया। इस पहल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि महिलाओं को अपने घरों और बाल-बच्चों को छोड़कर कहीं दूर पलायन नहीं करना पड़ता, बल्कि वे घरेलू जिम्मेदारियां निभाते हुए अतिरिक्त आय अर्जित कर अपने परिवार का खर्च चलाने में महत्वपूर्ण हाथ बंटा रही हैं।
कारीगरी, उपयोगिता और हाथ से निर्माण की पूरी प्रक्रिया
वर्तमान समय में इस विशिष्ट हस्तशिल्प कार्य से गांव की करीब 10 से 15 महिलाएं सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। यह पूरा उद्यम सामूहिक सहयोग के आधार पर संचालित होता है। महिलाएं जंगलों से बंगू के पत्तों को एकत्रित करती हैं, फिर उनकी गुणवत्ता परखकर उन्हें आवश्यक आकार में तराशती हैं और फिर पूरी निपुणता के साथ अपने हाथों से सिलकर टोपी का रूप देती हैं। यह टोपी मुख्य रूप से खेतों में काम करने वाले किसान भाइयों और खेतिहर मजदूरों के लिए अत्यंत व्यावहारिक मानी जाती है, क्योंकि पत्तों की प्राकृतिक परत वर्षा के पानी को सिर पर नहीं ठहरने देती और भीषण गर्मी में चुभती धूप से भी ठंडक प्रदान करती है।
स्थानीय हाट-बाजारों में बिक्री और व्यापक पहुंच की उम्मीद
तैयार की गई इन टोपियों को महिलाएं स्थानीय ग्रामीण हाटों, साप्ताहिक बाजारों और क्षेत्रीय मेलों में बिक्री के लिए ले जाती हैं। बाजार में एक टोपी की कीमत 10 से 20 रुपये के बीच मिलती है। प्रति टोपी मिलने वाली यह राशि पहली नजर में भले ही सीमित प्रतीत होती हो, लेकिन जब अधिक मात्रा में टोपियों का निर्माण और विक्रय होता है, तो इससे संचित होने वाला कुल लाभ इन महिलाओं के लिए सम्मानजनक आर्थिक संबल बन जाता है। महिलाओं का मानना है कि इस पहल ने न केवल उनकी प्राचीन हस्तकला और पारंपरिक पद्धतियों को विलुप्त होने से बचाया है, बल्कि उन्हें कठिन मजदूरी के लिए भटकने से भी राहत दी है। समूह की आकांक्षा है कि उनके इन पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों को बड़े शहरी बाजारों तक सीधी पहुंच मिले, जिससे उनके उद्यम का विस्तार हो सके और उनकी दैनिक आय में और इजाफा हो सके।























