छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में बारिश के दिनों में उगाई जाने वाली करमत्ता भाजी स्थानीय खानपान का एक अहम हिस्सा है। ग्रामीण इलाकों में इस हरी पत्तेदार सब्जी को पकाने का पारंपरिक तरीका काफी अनूठा है, क्योंकि इसे तैयार करने में बिल्कुल भी तेल का इस्तेमाल नहीं किया जाता। बिना तेल के तैयार होने के कारण यह डिश बेहद सुपाच्य रहती है और पाचन तंत्र पर भारी नहीं पड़ती। स्थानीय लोग इसे स्वास्थ्य के नजरिए से काफी उत्तम और पौष्टिक भोजन मानते हैं, जो पेट के लिए बहुत मुफीद साबित होता है।
सादे मसालों और पारंपरिक विधि का संगम
बस्तर के गांवों में लोग इस भाजी को बहुत ही साधारण सामग्री के साथ तैयार करते हैं। इसमें मुख्य रूप से केवल हल्दी और नमक का उपयोग किया जाता है, जबकि तीखेपन के लिए जरूरत के अनुसार मिर्च मिलाई जाती है। इस प्रकार सीमित मसालों में तैयार यह डिश स्वाद में काफी लजीज लगती है। कम तेल-मसाले के कारण इस पारंपरिक विधि को आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से भी स्वास्थ्यवर्धक माना गया है।
यह सब्जी न केवल पौष्टिकता से भरपूर है, बल्कि इसे पकाने में समय भी बेहद कम लगता है। कुछ ही मिनटों में तैयार हो जाने वाली इस हरी भाजी का स्वाद ऐसा होता है कि लोग इसे बार-बार खाना पसंद करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे ठेठ देसी अंदाज में बनाने के लिए एक तय प्रक्रिया अपनाई जाती है।
सब्जी पकाने के लिए आवश्यक सामग्री
देसी तरीके से करमत्ता भाजी तैयार करने के लिए बहुत सीमित चीजों की जरूरत पड़ती है। इसके लिए मुख्य सामग्री इस प्रकार है
- 200 ग्राम ताजा कटी हुई करमत्ता भाजी
- स्वादानुसार नमक
- एक चौथाई छोटी चम्मच हल्दी पाउडर
- दो कटे हुए टमाटर
- दो कली लहसुन
तैयार करने की चरणबद्ध विधि और परोसने का तरीका
इस पौष्टिक सब्जी को बनाने की शुरुआत कड़ाही में आधा गिलास पानी डालकर की जाती है। इस पानी में कटी हुई करमत्ता भाजी डालकर धीमी आंच पर थोड़ी देर उबाला जाता है। जब भाजी हल्की पक जाए, तब इसमें हल्दी और स्वादानुसार नमक मिला दिया जाता है। इसके बाद एक चम्मच की मदद से सामग्री को अच्छी तरह मिलाया जाता है ताकि मसाले भाजी में पूरी तरह समा जाएं।
थोड़ी देर पकने के बाद इसमें दो कटे हुए टमाटर डाले जाते हैं। टमाटर के गलने और भाजी के पूरी तरह नरम होकर पक जाने पर कड़ाही को आंच से नीचे उतार लिया जाता है। स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें लहसुन अथवा कटी हुई हरी मिर्च और प्याज का सादा तड़का भी लगाया जा सकता है। बस्तर के ग्रामीण इलाकों में लोग इस बिना तेल वाली पारंपरिक सब्जी को बड़े चाव से खाते हैं और इसे मुख्य रूप से गरमा-गरम रोटी या सादे चावल के साथ परोसा जाता है।


















