उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में पारंपरिक फसलों की खेती के साथ पशुपालन के जरिए आमदनी बढ़ाने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। ग्रामीण अंचलों में नौजवान और किसान सीमित पूंजी लगाकर बकरी पालन को अतिरिक्त कमाई और रोजगार का मजबूत विकल्प बना रहे हैं। शुरुआती दौर में कुछ पशुओं से काम शुरू करके धीरे-धीरे इस कारोबार को बड़े पैमाने पर ले जाया जा रहा है। हालांकि वैज्ञानिक तौर-तरीकों और सही तकनीकी जानकारी के अभाव में कई बार पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना भी करना पड़ जाता है।
मुनाफे के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन और बुनियादी जानकारी जरूरी
बकरी पालन का व्यवसाय शुरू करने से पूर्व पशुपालक को उपयुक्त नस्ल की पहचान, संतुलित आहार व्यवस्था, अनुकूल आवास, नियमित टीकाकरण और साफ-सफाई के नियमों को समझना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही पशुओं में दिखने वाले शुरुआती रोग लक्षणों की पहचान का हुनर होना चाहिए। तकनीकी ज्ञान न होने पर किसान अक्सर गलत नस्ल के पशु खरीद लेते हैं या उनके रख-रखाव में अनदेखी कर बैठते हैं। इस लापरवाही के चलते बकरियों का शारीरिक विकास बाधित होता है और झुंड में जानलेवा बीमारियों के फैलने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
कृषि विज्ञान केंद्र जमुनाबाद में युवाओं को मुफ्त प्रशिक्षण
पशु एक्सपर्ट डॉ. एनके त्रिपाठी ने बताया कि ग्रामीण युवा रोजगारपरक प्रशिक्षण योजना के तहत कृषि विज्ञान केंद्र जमुनाबाद में किसानों और युवाओं को निशुल्क प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है। इस कार्यक्रम में इकाई स्थापित करने के शुरुआती चरणों से लेकर तैयार पशुओं को बाजार में बेचने तक का पूरा व्यावहारिक ज्ञान दिया जाता है। कार्यशाला में उच्च गुणवत्ता वाली नस्लें चुनना, मौसमी थपेड़ों से बचाने वाला शेड बनाना, पौष्टिक आहार तैयार करना और तय समय सारिणी के मुताबिक टीके लगवाने जैसे जरूरी पहलुओं की विस्तार से जानकारी दी जाती है।
मौसम के उतार-चढ़ाव और बारिश में रख-रखाव के नियम
मानसून के महीनों में वातावरण में अत्यधिक नमी और बाड़े में कीचड़ होने के कारण जीवाणु संक्रमण और संक्रामक रोगों का प्रकोप सबसे अधिक बढ़ता है। ऐसे संवेदनशील वक्त में बकरियों के रहने की जगह को पूरी तरह सूखा, हवादार और स्वच्छ रखना चाहिए। पशुपालकों को नियमित रूप से आवास कीटाणुरहित करने के साथ-साथ बकरियों के सामान्य स्वास्थ्य, चरने की क्षमता और शारीरिक गतिविधियों पर लगातार निगाह रखनी चाहिए ताकि किसी भी गड़बड़ी का पता तुरंत चल सके।
क्षेत्र की जलवायु के मुताबिक करें नस्ल का चुनाव
सफल व्यवसाय की बुनियाद सही नस्ल के चयन पर टिकी होती है। किसानों और युवाओं को अपने इलाके के तापमान, आर्द्रता और उपलब्ध स्थानीय चारे के संसाधनों को ध्यान में रखकर ही बकरियों की नस्ल चुननी चाहिए। स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल उच्च नस्ल की बकरियों में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है, उनकी प्रजनन दर बेहतर रहती है और मेमनों का वजन भी कम समय में तेजी से बढ़ता है, जिससे पालने वाले को बेहतर आर्थिक रिटर्न मिलता है।
संक्रमण से बचाव, टीकाकरण और समय पर उपचार
प्रशिक्षण सत्रों में सामान्य बीमारियों के लक्षण पहचानने और उनके प्राथमिक उपचार के व्यावहारिक तरीके सिखाए जाते हैं। समय पर रोग प्रतिरोधक टीके लगवाने और किसी भी समस्या पर तुरंत पशु चिकित्सक से परामर्श लेने से पशुधन को गंभीर और जानलेवा संक्रमणों से बचाया जा सकता है। बाड़े में किसी भी बकरी के अस्वस्थ दिखने पर उसे फौरन बाकी स्वस्थ बकरियों से अलग क्वारंटीन करने की सलाह दी जाती है, जिससे पूरे झुंड में छूत की बीमारी न फैले। संतुलित दाना-पानी, स्वच्छता, सटीक नस्ल और सजग निगरानी के बल पर बकरी पालन को टिकाऊ और संगठित व्यवसाय बनाया जा सकता है।



















