प्राचीन और मध्यकालीन भारत की स्थापत्य कला पर नज़र डालें तो ज़्यादातर चर्चा राजाओं और बादशाहों के दौर में बनी इमारतों तक सीमित रह जाती है। इसके विपरीत हमारे देश की वास्तुकला परंपरा में कई ऐसी प्रभावशाली रानियां और महिला शासक भी रही हैं, जिन्होंने अपने समय में अद्भुत और बेमिसाल ढांचों की नींव रखी। इनमें से कुछ निर्माण जीवनसाथी की स्मृति को संजोने के उद्देश्य से किए गए, तो कुछ का मकसद जनहित, जल संरक्षण और अपनी सल्तनत की सांस्कृतिक भव्यता को प्रदर्शित करना था। गुजरात, दिल्ली और मध्य प्रदेश में मौजूद ऐसे पांच प्रमुख ऐतिहासिक स्थल आज भी इन दूरदर्शी महिलाओं के हुनर और निर्णय क्षमता की गवाही देते हैं।
रानी की वाव: पाटन में जल संरक्षण और आस्था का संगम
गुजरात के पाटन में स्थित रानी की वाव भारत की सबसे भव्य और कलात्मक बावड़ियों में शुमार है। ग्यारहवीं शताब्दी के दौरान रानी उदयमती ने अपने दिवंगत पति राजा भीमदेव प्रथम के सम्मान में इस अनूठे जल मंदिर की नींव रखी थी। साधारण बावड़ियों की तुलना में इसे एक उल्टे खड़े मंदिर की कल्पना के आधार पर गढ़ा गया, ताकि पानी की अहमियत को आध्यात्मिक गरिमा दी जा सके।
कला और इंजीनियरिंग के लिहाज से यह बावड़ी सात सीढ़ीदार मंजिलों में गहराई तक फैली हुई है। इसके खंभों और आंतरिक गलियारों की दीवारों पर बेहद बारीक नक्काशी की गई है, जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं, पौराणिक आख्यानों और उस समय के आम जनजीवन के दृश्य उकेरे गए हैं। यहां पांच सौ से अधिक विशाल मूर्तियां और एक हज़ार से ज़्यादा लघु शिल्प मौजूद हैं। जल संचयन के व्यावहारिक साधन होने के साथ-साथ यह तत्कालीन शिल्पकला का अद्वितीय नमूना है, जिसे साल 2014 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्रदान की गई थी।
अदालज की वाव: गांधीनगर के पास रानी रुदाबाई की बेजोड़ वास्तुकला
गुजरात में ही गांधीनगर के निकट स्थित अदालज की वाव अपनी विशिष्ट ज्यामितीय बनावट और नक्काशीदार सौंदर्य के लिए जानी जाती है। वर्ष 1499 में तैयार हुई इस पांच मंजिला बावड़ी का संबंध रानी रुदाबाई से है। इमारत के स्तंभों, झरोखों और भीतरी सतहों पर बेल-बूटों, पत्तियों और फूलों के मनमोहक रूपांकन तराशे गए हैं।
इस बावड़ी का सबसे व्यावहारिक पहलू इसका तापमान नियंत्रण तंत्र है। जैसे-जैसे कोई इसकी निचली मंजिलों की तरफ बढ़ता है, बाहर की भीषण लू और गर्मी का असर कम होने लगता है और शीतलता महसूस होती है। मध्यकाल में ऐसी बावड़ियां राहगीरों और स्थानीय लोगों के लिए जल एकत्र करने के अलावा भीषण धूप से पनाह लेने और सामाजिक जुड़ाव का अहम केंद्र हुआ करती थीं। विभिन्न स्थापत्य धाराओं का सुंदर संतुलन अदालज को विशेष दर्जा देता है।
हुमायूं का मकबरा: दिल्ली में बेगा बेगम की चारबाग विरासत
राजधानी दिल्ली में यमुना किनारे बना हुमायूं का मकबरा भी एक महिला की दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतिफल है। मुगल सम्राट हुमायूं की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी बेगा बेगम ने इस स्मारक का निर्माण अपने मार्गदर्शन में करवाया, जो वर्ष 1570 तक पूरी तरह बनकर तैयार हुआ। इस ऐतिहासिक परिसर की सबसे बड़ी खूबी इसके इर्द-गिर्द बिछाया गया विशाल चारबाग प्रारूप है।
इस उद्यान को सुनियोजित रास्तों, ज्यामितीय क्यारियों और बहती पानी की नहरों के साथ विभाजित किया गया है। मकबरे की बनावट में फारसी ज्यामिति और भारतीय कारीगरी का संतुलित समन्वय देखने को मिलता है। यह समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में विशाल बगीचे वाले मकबरों के शुरुआती उदाहरणों में शामिल है। बाद के दौर में निर्मित अनेक स्मारकों की रूपरेखा इसी से प्रेरित हुई, और आगे चलकर ताजमहल की संरचना में भी इसी चारबाग शैली का अत्यधिक परिष्कृत रूप सामने आया।
मोती मस्जिद: भोपाल में सिकंदर जहां बेगम का श्वेत नगीना
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित मोती मस्जिद उन्नीसवीं सदी की वास्तुकला का चमकता उदाहरण है, जिसकी निर्माता नवाब सिकंदर जहां बेगम थीं। अपनी धवल आभा और विशिष्ट सुंदरता के कारण इसे पर्ल मॉस्क के नाम से भी प्रसिद्धि मिली।
इस धार्मिक इमारत के बाहरी हिस्से में सफेद पत्थरों के साथ गहरे लाल पत्थरों का सटीक संतुलन साधा गया है। मस्जिद की नक्काशीदार दीवारें और नुकीली मीनारें इसे शहर के अन्य ढांचों के बीच अलग पहचान दिलाती हैं। सिकंदर जहां बेगम ने अपने शासनकाल में भोपाल के ढांचागत विकास और जनोपयोगी निर्माणों पर विशेष ध्यान दिया था, और यह मस्जिद उनके प्रशासनिक विज़न व कलात्मक पसंद का जीवंत प्रमाण है।
ताज-उल-मसाजिद: दो महिला शासकों के प्रयासों से साकार हुआ भव्य ढांचा
भोपाल की ताज-उल-मसाजिद देश की सबसे विशाल और मशहूर मस्जिदों में गिनी जाती है, जिसका शाब्दिक अर्थ ही 'मस्जिदों का ताज' होता है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत नवाब शाहजहां बेगम ने की थी। बाद में उनकी पुत्री सुल्तान जहां बेगम ने भी इसके निर्माण कार्य को गति देने में सक्रिय भूमिका निभाई।
आर्थिक और प्रशासनिक कारणों से इसका निर्माण कार्य एक लंबे अरसे तक रुका रहा, जिसे बाद के दौर में दोबारा शुरू कर मुकाम तक पहुंचाया गया। गुलाबी पत्थरों से सजी बाहरी दीवारें, खुला विशालकाय प्रांगण और आसमान छूती मीनारें इस परिसर को भव्य स्वरूप देती हैं। यह स्मारक इस सच्चाई को भी उजागर करता है कि किस तरह भोपाल की महिला शासकों ने पीढ़ियों के फासले के बावजूद अपने पूर्वजों के कलात्मक स्वप्न को अधूरा नहीं रहने दिया।



















