दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के बीच नितिन नवीन का विपक्ष पर बड़ा हमला, विदेशी ताकतों के इशारे पर अशांति फैलाने का लगाया आरोपबस्तर के जगदलपुर में कांतारा फिल्म की तर्ज पर सजा अनोखा दुर्गा पंडाल, बांस की कारीगरी बनी मुख्य आकर्षणत्योहारी सीजन में मुफ्त एलपीजी सिलेंडर पाने के लिए ई-केवाईसी जरूरी, जानिए विभिन्न राज्यों के नियमउपवास के दिनों में कमजोरी दूर भगाएंगे मेवों से बने चूरमा लड्डू, जानिए आसान विधि और फायदेअहमदाबाद में नवरात्र उत्सव पर सख्त पहरा, 14,000 जवान और आधुनिक निगरानी तकनीक तैनातमणिपुर के कामजोंग में नए सिरे से भड़की जातीय हिंसा, गोलीबारी में महिला की मौत के बाद धारा 163 लागूडूंगरपुर में महुआ बीनते ग्रामीण से आभूषण छीनने वाला हिस्ट्रीशीटर पकड़ा गया, चोरी की बाइक और चांदी बरामदनागौर में आम के बगीचों की मॉनसून बाद देखभाल से बढ़ेगी अगली पैदावार, जानें जरूरी कृषि उपायसैटेलाइट इंटरनेट स्टारलिंक पर अत्यधिक निर्भरता से भारत की सुरक्षा और रणनीतिक संप्रभुता को गंभीर खतरेभागलपुर में हरी मिर्च की खेती से कैसे बढ़ाएं मुनाफा, जानिए उन्नत किस्में और कीट प्रबंधन के नियम
महिला शासकों और रानियों की दूरदर्शिता: भारत के 5 नायाब ऐतिहासिक स्मारक जो महिलाओं की देन हैंजीवनशैली
10 अक्तू॰ 2026, 3:38 pm (2 घंटे पहले)· 0

महिला शासकों और रानियों की दूरदर्शिता: भारत के 5 नायाब ऐतिहासिक स्मारक जो महिलाओं की देन हैं

भारतीय इतिहास में केवल पुरुषों का ही नहीं बल्कि रानियों और महिला शासकों का भी वास्तुकला में अप्रतिम योगदान रहा है। पाटन की बावड़ी से लेकर दिल्ली और भोपाल की ऐतिहासिक इमारतों तक, जानिए महिलाओं द्वारा बनवाए गए 5 प्रमुख स्मारकों का इतिहास।

प्राचीन और मध्यकालीन भारत की स्थापत्य कला पर नज़र डालें तो ज़्यादातर चर्चा राजाओं और बादशाहों के दौर में बनी इमारतों तक सीमित रह जाती है। इसके विपरीत हमारे देश की वास्तुकला परंपरा में कई ऐसी प्रभावशाली रानियां और महिला शासक भी रही हैं, जिन्होंने अपने समय में अद्भुत और बेमिसाल ढांचों की नींव रखी। इनमें से कुछ निर्माण जीवनसाथी की स्मृति को संजोने के उद्देश्य से किए गए, तो कुछ का मकसद जनहित, जल संरक्षण और अपनी सल्तनत की सांस्कृतिक भव्यता को प्रदर्शित करना था। गुजरात, दिल्ली और मध्य प्रदेश में मौजूद ऐसे पांच प्रमुख ऐतिहासिक स्थल आज भी इन दूरदर्शी महिलाओं के हुनर और निर्णय क्षमता की गवाही देते हैं।

रानी की वाव: पाटन में जल संरक्षण और आस्था का संगम

गुजरात के पाटन में स्थित रानी की वाव भारत की सबसे भव्य और कलात्मक बावड़ियों में शुमार है। ग्यारहवीं शताब्दी के दौरान रानी उदयमती ने अपने दिवंगत पति राजा भीमदेव प्रथम के सम्मान में इस अनूठे जल मंदिर की नींव रखी थी। साधारण बावड़ियों की तुलना में इसे एक उल्टे खड़े मंदिर की कल्पना के आधार पर गढ़ा गया, ताकि पानी की अहमियत को आध्यात्मिक गरिमा दी जा सके।

ये भी पढ़ें

कला और इंजीनियरिंग के लिहाज से यह बावड़ी सात सीढ़ीदार मंजिलों में गहराई तक फैली हुई है। इसके खंभों और आंतरिक गलियारों की दीवारों पर बेहद बारीक नक्काशी की गई है, जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं, पौराणिक आख्यानों और उस समय के आम जनजीवन के दृश्य उकेरे गए हैं। यहां पांच सौ से अधिक विशाल मूर्तियां और एक हज़ार से ज़्यादा लघु शिल्प मौजूद हैं। जल संचयन के व्यावहारिक साधन होने के साथ-साथ यह तत्कालीन शिल्पकला का अद्वितीय नमूना है, जिसे साल 2014 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्रदान की गई थी।

अदालज की वाव: गांधीनगर के पास रानी रुदाबाई की बेजोड़ वास्तुकला

गुजरात में ही गांधीनगर के निकट स्थित अदालज की वाव अपनी विशिष्ट ज्यामितीय बनावट और नक्काशीदार सौंदर्य के लिए जानी जाती है। वर्ष 1499 में तैयार हुई इस पांच मंजिला बावड़ी का संबंध रानी रुदाबाई से है। इमारत के स्तंभों, झरोखों और भीतरी सतहों पर बेल-बूटों, पत्तियों और फूलों के मनमोहक रूपांकन तराशे गए हैं।

इस बावड़ी का सबसे व्यावहारिक पहलू इसका तापमान नियंत्रण तंत्र है। जैसे-जैसे कोई इसकी निचली मंजिलों की तरफ बढ़ता है, बाहर की भीषण लू और गर्मी का असर कम होने लगता है और शीतलता महसूस होती है। मध्यकाल में ऐसी बावड़ियां राहगीरों और स्थानीय लोगों के लिए जल एकत्र करने के अलावा भीषण धूप से पनाह लेने और सामाजिक जुड़ाव का अहम केंद्र हुआ करती थीं। विभिन्न स्थापत्य धाराओं का सुंदर संतुलन अदालज को विशेष दर्जा देता है।

हुमायूं का मकबरा: दिल्ली में बेगा बेगम की चारबाग विरासत

राजधानी दिल्ली में यमुना किनारे बना हुमायूं का मकबरा भी एक महिला की दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतिफल है। मुगल सम्राट हुमायूं की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी बेगा बेगम ने इस स्मारक का निर्माण अपने मार्गदर्शन में करवाया, जो वर्ष 1570 तक पूरी तरह बनकर तैयार हुआ। इस ऐतिहासिक परिसर की सबसे बड़ी खूबी इसके इर्द-गिर्द बिछाया गया विशाल चारबाग प्रारूप है।

इस उद्यान को सुनियोजित रास्तों, ज्यामितीय क्यारियों और बहती पानी की नहरों के साथ विभाजित किया गया है। मकबरे की बनावट में फारसी ज्यामिति और भारतीय कारीगरी का संतुलित समन्वय देखने को मिलता है। यह समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में विशाल बगीचे वाले मकबरों के शुरुआती उदाहरणों में शामिल है। बाद के दौर में निर्मित अनेक स्मारकों की रूपरेखा इसी से प्रेरित हुई, और आगे चलकर ताजमहल की संरचना में भी इसी चारबाग शैली का अत्यधिक परिष्कृत रूप सामने आया।

मोती मस्जिद: भोपाल में सिकंदर जहां बेगम का श्वेत नगीना

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित मोती मस्जिद उन्नीसवीं सदी की वास्तुकला का चमकता उदाहरण है, जिसकी निर्माता नवाब सिकंदर जहां बेगम थीं। अपनी धवल आभा और विशिष्ट सुंदरता के कारण इसे पर्ल मॉस्क के नाम से भी प्रसिद्धि मिली।

इस धार्मिक इमारत के बाहरी हिस्से में सफेद पत्थरों के साथ गहरे लाल पत्थरों का सटीक संतुलन साधा गया है। मस्जिद की नक्काशीदार दीवारें और नुकीली मीनारें इसे शहर के अन्य ढांचों के बीच अलग पहचान दिलाती हैं। सिकंदर जहां बेगम ने अपने शासनकाल में भोपाल के ढांचागत विकास और जनोपयोगी निर्माणों पर विशेष ध्यान दिया था, और यह मस्जिद उनके प्रशासनिक विज़न व कलात्मक पसंद का जीवंत प्रमाण है।

ताज-उल-मसाजिद: दो महिला शासकों के प्रयासों से साकार हुआ भव्य ढांचा

भोपाल की ताज-उल-मसाजिद देश की सबसे विशाल और मशहूर मस्जिदों में गिनी जाती है, जिसका शाब्दिक अर्थ ही 'मस्जिदों का ताज' होता है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत नवाब शाहजहां बेगम ने की थी। बाद में उनकी पुत्री सुल्तान जहां बेगम ने भी इसके निर्माण कार्य को गति देने में सक्रिय भूमिका निभाई।

आर्थिक और प्रशासनिक कारणों से इसका निर्माण कार्य एक लंबे अरसे तक रुका रहा, जिसे बाद के दौर में दोबारा शुरू कर मुकाम तक पहुंचाया गया। गुलाबी पत्थरों से सजी बाहरी दीवारें, खुला विशालकाय प्रांगण और आसमान छूती मीनारें इस परिसर को भव्य स्वरूप देती हैं। यह स्मारक इस सच्चाई को भी उजागर करता है कि किस तरह भोपाल की महिला शासकों ने पीढ़ियों के फासले के बावजूद अपने पूर्वजों के कलात्मक स्वप्न को अधूरा नहीं रहने दिया।

सवाल-जवाब

रानी की वाव का निर्माण किसने और किस उद्देश्य से करवाया था?
रानी की वाव का निर्माण 11वीं सदी में रानी उदयमती ने अपने दिवंगत पति राजा भीमदेव प्रथम की याद में करवाया था।
रानी की वाव को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल कब घोषित किया गया?
इस ऐतिहासिक बावड़ी को वर्ष 2014 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल किया गया था।
अदालज की वाव किस वर्ष बनकर तैयार हुई और इसका संबंध किससे है?
यह पांच मंजिला बावड़ी वर्ष 1499 में तैयार हुई थी और इसका संबंध रानी रुदाबाई से है।
हुमायूं के मकबरे का निर्माण किसके संरक्षण में हुआ था?
हुमायूं के मकबरे का निर्माण मुगल बादशाह हुमायूं की पत्नी बेगा बेगम के संरक्षण में हुआ था और यह 1570 तक बनकर तैयार हुआ।
हुमायूं के मकबरे की स्थापत्य शैली की मुख्य विशेषता क्या है?
यह मकबरा चारबाग उद्यान शैली में बना है, जिसमें सुनियोजित रास्ते, पानी की नहरें और फारसी व भारतीय शिल्पकला का मेल दिखाई देता है।
भोपाल की मोती मस्जिद का निर्माण किसने करवाया था?
भोपाल की मोती मस्जिद का निर्माण 19वीं सदी में सिकंदर जहां बेगम ने करवाया था।
ताज-उल-मसाजिद के निर्माण में किन महिला शासकों की भूमिका रही?
इस मस्जिद की शुरुआत शाहजहां बेगम ने की थी और बाद में उनकी पुत्री सुल्तान जहां बेगम ने भी इसके निर्माण को आगे बढ़ाया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp