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भोपाल में साइबर ठगी की FIR के लिए पीड़ितों को दो साल का इंतजार, वजह है सिर्फ एक इंस्पेक्टरमध्य प्रदेश
21 जुल॰ 2026, 12:02 pm (46 दिन पहले)· 3

भोपाल में साइबर ठगी की FIR के लिए पीड़ितों को दो साल का इंतजार, वजह है सिर्फ एक इंस्पेक्टर

मध्य प्रदेश की राजधानी में साइबर अपराध के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन जांच अधिकारियों की भारी कमी के चलते भोपाल साइबर क्राइम यूनिट में सिर्फ एक इंस्पेक्टर पर 104 लंबित मामलों का बोझ आ गया है, जिससे कई मामलों में FIR दर्ज होने में दो साल तक लग रहे हैं.

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में साइबर ठगी के मामले हर साल तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन इनकी जांच करने वाला अमला उतनी ही तेजी से घटता चला गया है. भोपाल साइबर क्राइम यूनिट में इस समय सिर्फ एक इंस्पेक्टर के कंधों पर 104 लंबित मामलों की जांच का जिम्मा है, जबकि नियमों के मुताबिक साइबर फ्रॉड की विवेचना करने का अधिकार सिर्फ इंस्पेक्टर रैंक के अफसर को ही है. इसका सीधा असर पीड़ितों पर पड़ रहा है, कई मामलों में FIR दर्ज कराने के लिए लोगों को दो साल तक इंतजार करना पड़ रहा है और फ्रीज हुआ पैसा भी समय पर वापस नहीं मिल रहा.

वर्कलोड 25 गुना कैसे बढ़ा

पुलिस के रिकॉर्ड बताते हैं कि 2021 में भोपाल साइबर क्राइम यूनिट में कुल 48 मामले जांच के लिए दर्ज थे, और उस वक्त यूनिट में 10 इंस्पेक्टर तैनात थे. इस हिसाब से हर अफसर के पास औसतन चार से पांच केस ही होते थे, जो किसी भी जांच अधिकारी के लिए संभालने लायक संख्या मानी जाती है. लेकिन 2026 आते-आते हालात पूरी तरह पलट गए. अब यूनिट में जांच का अधिकार रखने वाला सिर्फ एक ही इंस्पेक्टर बचा है और उसके सामने लंबित मामलों की संख्या 104 तक पहुंच चुकी है. इसका मतलब है कि पांच साल पहले के मुकाबले एक अफसर पर करीब 25 गुना ज्यादा काम आ गया है.

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बाकी स्टाफ मौजूद, लेकिन जांच का अधिकार नहीं

दिलचस्प बात यह है कि यूनिट में अफसरों और कर्मचारियों की कुल संख्या कम नहीं है. यहां सात सब-इंस्पेक्टर, तीन एएसआई, 15 प्रधान आरक्षक और 56 आरक्षक तैनात हैं. लेकिन मौजूदा नियमों के मुताबिक साइबर फ्रॉड के मामलों की कानूनी विवेचना सिर्फ इंस्पेक्टर स्तर का अफसर ही कर सकता है. बाकी स्टाफ सिर्फ तकनीकी मदद और शुरुआती कार्रवाई में सहयोग दे सकता है, वे केस को आगे नहीं बढ़ा सकते. यही वजह है कि इतनी बड़ी फोर्स होने के बावजूद जांच की रफ्तार एक अकेले अफसर की क्षमता पर टिकी है. विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर अपराधों की जांच पहले से ही पेचीदा होती है, डिजिटल सबूत जुटाने, बैंकिंग लेन-देन ट्रैक करने और दूसरे राज्यों या विदेश तक फैले नेटवर्क से जानकारी हासिल करने में महीनों लग जाते हैं. स्टाफ की कमी ने इस पूरी प्रक्रिया को और धीमा कर दिया है, नतीजा यह है कि कई मामलों में शुरुआती जांच पूरी होने के बाद भी FIR दर्ज होने में लंबा वक्त लग रहा है.

फर्जी बैंक खाते और सिम कार्ड बने बड़ी चुनौती

साइबर ठगी करने वालों के लिए फर्जी बैंक खाते और मोबाइल सिम कार्ड भी एक बड़ा हथियार बने हुए हैं. पुलिस के मुताबिक ठग किरायानामे या दूसरे लोगों के दस्तावेजों के सहारे बैंक खाते खुलवाकर उनका इस्तेमाल ठगी की रकम ठिकाने लगाने में करते हैं. इसी तरह बड़ी तादाद में जारी हो रहे सिम कार्ड भी अपराधियों के लिए आसान रास्ता बन जाते हैं, क्योंकि कई संदिग्ध सिम समय रहते ब्लॉक नहीं हो पाते. जब भी कोई साइबर ठगी का मामला सामने आता है, पुलिस पीड़ित की रकम बचाने के लिए संबंधित बैंक खाते को फ्रीज करा देती है. लेकिन मल्टीलेयर ट्रांजेक्शन, दूसरे राज्यों और विदेशों तक फैला नेटवर्क और बैंकिंग प्रक्रिया की पेचीदगी की वजह से पीड़ितों को उनकी फ्रीज हुई रकम वापस मिलने में भी काफी वक्त लग जाता है.

पुलिस कमिश्नर बोले, स्टाफ बढ़ाने पर होगा फैसला

इस पूरे मसले पर भोपाल पुलिस कमिश्नर संजय कुमार ने कहा कि अगर साइबर क्राइम यूनिट में इंस्पेक्टरों की संख्या जरूरत से कम है, तो इसकी समीक्षा की जाएगी. उन्होंने भरोसा दिलाया कि जरूरत के हिसाब से यूनिट में स्टाफ बढ़ाने की कार्रवाई की जाएगी, ताकि जांच में तेजी लाई जा सके और पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके.

सवाल-जवाब

भोपाल साइबर क्राइम यूनिट में अभी कितने इंस्पेक्टर हैं?
अभी सिर्फ एक इंस्पेक्टर है, जिसके पास 104 लंबित मामलों की जांच का जिम्मा है.
2021 में यूनिट की स्थिति कैसी थी?
2021 में यूनिट में 10 इंस्पेक्टर तैनात थे और कुल 48 मामले विवेचना में थे, यानी हर अफसर के पास औसतन चार से पांच केस थे.
FIR दर्ज होने में इतनी देरी क्यों हो रही है?
क्योंकि नियमों के तहत सिर्फ इंस्पेक्टर रैंक का अफसर ही साइबर फ्रॉड मामलों की विवेचना कर सकता है, और यूनिट में अभी सिर्फ एक ही इंस्पेक्टर बचा है.
यूनिट में और कितना स्टाफ मौजूद है?
सात सब-इंस्पेक्टर, तीन एएसआई, 15 प्रधान आरक्षक और 56 आरक्षक हैं, लेकिन उन्हें विवेचना का कानूनी अधिकार नहीं है.
पीड़ितों को फ्रीज पैसा वापस मिलने में देरी क्यों होती है?
मल्टीलेयर ट्रांजेक्शन, दूसरे राज्यों और विदेशों तक फैले नेटवर्क तथा बैंकिंग प्रक्रिया की जटिलता के चलते पैसा वापस मिलने में समय लगता है.
फर्जी बैंक खाते और सिम कार्ड की क्या भूमिका है?
ठग किरायानामे या दूसरों के दस्तावेजों पर बैंक खाते खुलवाते हैं और आसानी से मिलने वाले सिम कार्ड का इस्तेमाल ठगी में करते हैं.
इस मुद्दे पर पुलिस प्रशासन का क्या कहना है?
भोपाल पुलिस कमिश्नर संजय कुमार ने कहा कि इंस्पेक्टरों की कमी की समीक्षा कर जरूरत के अनुसार स्टाफ बढ़ाया जाएगा.
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