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महाराष्ट्र में मॉनसून की बेरुखी से खरीफ की फसलें चौपट, 1972 से भी बड़े सूखे का अंदेशामहाराष्ट्र
20 अक्तू॰ 2026, 3:37 pm (25 मिनट पहले)· 0

महाराष्ट्र में मॉनसून की बेरुखी से खरीफ की फसलें चौपट, 1972 से भी बड़े सूखे का अंदेशा

महाराष्ट्र में कम बारिश की वजह से 1.40 करोड़ हेक्टेयर की खरीफ फसलें नष्ट हो गई हैं और करीब 1.40 करोड़ किसान गंभीर संकट में घिर चुके हैं। हालात ऐसे हैं कि दशहरे-दिवाली से पहले ही ग्रामीण इलाकों से मजदूरों का पलायन शुरू हो चुका है।

कमज़ोर मानसूनी बारिश ने महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों की कमर तोड़कर रख दी है। खेतों में खड़ी कपास, सोयाबीन, दालें, फल और सब्जियां पानी के अभाव में सूख चुकी हैं। प्रमुख नकदी फसल गन्ने पर भी इसका बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिससे खेती-किसानी से जुड़े परिवारों की आमदनी को गहरा झटका लगा है। संकट केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पूरे ग्रामीण जनजीवन पर साफ महसूस किया जा रहा है।

समय से पहले पलायन को मजबूर हुए खेत मजदूर

आमतौर पर हर वर्ष गन्ने की कटाई करने वाले मजदूर दशहरे अथवा दिवाली के आसपास काम के लिए निकलते थे। इस बार हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि उन्हें कई सप्ताह पहले ही अपने घर छोड़ने पड़ रहे हैं। जालना इलाके के मजदूरों का कहना है कि मजदूरी चाहे कम मिले, लेकिन बाहर जाने पर कम से कम पीने के पानी की व्यवस्था तो हो सकेगी। जमीन के मालिक किसानों को नुकसान पर कुछ सरकारी राहत मिलने की उम्मीद रहती है, मगर भूमिहीन मजदूरों के सामने न रोजगार बचा है और न ही किसी नियमित आय का जरिया बचा है।

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1972 के ऐतिहासिक अकाल की यादें हुईं ताजा

साल 1960 के बाद से महाराष्ट्र अब तक 15 दफा सूखे की विभीषिका झेल चुका है। इनमें 1972 के अकाल को सबसे विनाशकारी माना जाता रहा है, जिसने पूरे प्रदेश में त्राहिमाम मचा दिया था। राज्य सरकार के मुताबिक मौजूदा हालात 1972 से भी अधिक भयावह रूप ले सकते हैं। पुराने दौर की तबाही देख चुके बुजुर्गों का कहना है कि अब उनमें एक और भयानक सूखे की मार झेलने की शारीरिक और मानसिक शक्ति नहीं बची है।

पेंशन और सरकारी योजनाओं की मदद में देरी से बढ़ी मुश्किलें

संकट के समय में गरीबों और कमजोर तबकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं जीवनरेखा साबित होती हैं। जब यह सहायता सही वक्त पर हाथों तक नहीं पहुंचती, तब रोजमर्रा का गुजारा करना नामुमकिन हो जाता है। लातूर जिले के मातेफल गांव में रहने वाले दिव्यांगों और बुजुर्ग नागरिकों के सामने नियमित भुगतान न मिलने से रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

राहत बजट पर सवाल और रबी फसलों पर संशय

सूखे से निपटने और रोजगार मुहैया कराने के मकसद से महाराष्ट्र सरकार ने ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत 6,728 करोड़ रुपये की व्यवस्था की है। हालांकि मजदूरों का मानना है कि चंद दिनों की दिहाड़ी उन्हें कई महीनों तक चलने वाली इस तंगी से बाहर नहीं निकाल पाएगी। राज्य में करीब 1 करोड़ 40 लाख हेक्टेयर में खरीफ की फसलें बर्बाद हो चुकी हैं, जिसका सीधा प्रभाव 1 करोड़ 40 लाख किसानों पर पड़ा है। जलाशयों और कुओं में पानी इतना कम बचा है कि आगामी रबी सत्र में बुवाई करने की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है। महाराष्ट्र से देशभर में अनाज, दालों और सब्जियों की आपूर्ति होती है, इसलिए इस क्षेत्रीय संकट की तपिश जल्द ही पूरे देश के बाजारों तक पहुंचेगी।

सवाल-जवाब

महाराष्ट्र में सूखे से कितनी कृषि भूमि और कितने किसान प्रभावित हुए हैं?
सूखे की वजह से लगभग 1 करोड़ 40 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलें बर्बाद हुई हैं और करीब 1 करोड़ 40 लाख किसान इससे प्रभावित हुए हैं।
किन प्रमुख फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है?
कपास, सोयाबीन, दालें, फल, सब्जियां और नकदी फसल गन्ना सूखे से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
मजदूर समय से पहले गांव क्यों छोड़ रहे हैं?
खेतों में काम न होने और गांवों में पानी की भारी किल्लत के कारण मजदूर दशहरे-दिवाली से कई हफ्ते पहले ही रोजगार की तलाश में निकल पड़े हैं।
महाराष्ट्र सरकार ने राहत के लिए कितना बजट तय किया है?
राज्य सरकार ने ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के संचालन के लिए 6,728 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।
क्या आगामी रबी सीजन में फसलें उगाई जा सकेंगी?
पानी की भारी किल्लत के चलते किसानों के अनुसार अगली रबी फसल की बुवाई कर पाना नामुमकिन नजर आ रहा है।
महाराष्ट्र में अब तक कितनी बार सूखे के हालात बन चुके हैं?
साल 1960 से लेकर अब तक महाराष्ट्र ने 15 बार सूखे का सामना किया है, जिसमें 1972 का सूखा सबसे गंभीर था।
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