महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई के मालाड इलाके में एक बेहद अजीबोगरीब और चौंकाने वाला वाकया सामने आया है, जहाँ एक बंद पड़े डे-केयर सेंटर के भीतर डीप फ्रीजर में पिछले करीब चार वर्षों से एक 78 वर्षीय बुजुर्ग का शव संभालकर रखा हुआ था. यह पूरा मामला उस वक्त उजागर हुआ जब एक अज्ञात पार्सल के जरिए पुलिस तक गोपनीय सूचना पहुंची. जब अधिकारियों ने बंद सेंटर का ताला खुलवाया, तो अंदर डीप फ्रीजर में पार्थिव शरीर सुरक्षित अवस्था में मिला. परिजनों ने विज्ञान के क्रायोनिक्स सिद्धांत पर भरोसा करते हुए इस शव को संरक्षित करने का फैसला लिया था, जिस पर अब तक 50 लाख रुपये से भी अधिक का खर्च आने की बात सामने आई है.
संदिग्ध कूरियर पैकेट ने खोला वर्षों पुराना राज
इस सनसनीखेज मामले की शुरुआत सोमवार के दिन हुई, जब कुरार पुलिस स्टेशन में अचानक एक अज्ञात पार्सल पहुंचा. ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने किसी अनजान स्रोत से आए इस पैकेट को सीधे स्वीकार करने से इनकार कर दिया. इसके बाद रैपिडो का डिलीवरी कर्मचारी उस पैकेट को उस पते पर ले गया जो उस पर दर्ज था. यह पता मालाड स्थित कोंकणीपाड़ा के एक बंद पड़े डे-केयर सेंटर का निकला. सेंटर काफी समय से बंद था, लेकिन वहां मौजूद एक व्यक्ति ने उस पैकेट को देखकर तुरंत पुलिस प्रशासन को इसकी सूचना दी.
सूचना मिलने के बाद पुलिस की टीम मौके पर पहुंची और उन्होंने उस पार्सल को खोला. पैकेट के भीतर एक चिट्ठी रखी हुई थी, जिसमें साफ तौर पर लिखा था कि इस बंद पड़े सेंटर के अंदर रखे फ्रीजर में एक इंसान की लाश मौजूद है. चिट्ठी का यह मजमून पढ़ते ही पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया. फौरन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया गया, जिसके बाद जांच के लिए कई विशेष पुलिस टीमें मौके पर रवाना की गईं.
डॉक्टर की मौजूदगी में खुला ताला और बरामद हुआ शव
घटनास्थल पर पहुंचकर पुलिस ने डे-केयर सेंटर के मौजूदा कामकाज से जुड़े डॉक्टर अहमद सय्यद से संपर्क साधा. उनकी मदद से बंद पड़े परिसर का ताला खुलवाया गया. अंदर तलाशी लेने पर एक बड़ा डीप फ्रीजर दिखाई दिया. जब उस फ्रीजर का ढक्कन हटाया गया, तो उसमें 78 वर्षीय बुजुर्ग का पार्थिव शरीर रखा हुआ मिला. शव मिलते ही पुलिस ने डॉक्टर अहमद सय्यद से पूछताछ शुरू की और साथ ही मृतक के परिवार के सदस्यों को भी जांच में शामिल होने के लिए बुलाया. इस पूछताछ के दौरान परिजनों ने शव को इतने लंबे वक्त तक इस तरह रखने की पूरी वजह बताई.
मृतक बुजुर्ग की मौत जून 2022 में हुई थी और वे गंभीर रूप से बीमार थे. उन्हें कैंसर और किडनी फेल्योर की बीमारी थी. निधन के तुरंत बाद परिवार ने पार्थिव देह को कुछ समय के लिए अपने घर पर ही रखा था. हालांकि, आवासीय सोसायटी के अन्य निवासियों ने घर में शव रखे जाने का कड़ा विरोध शुरू कर दिया, जिसके चलते परिवार के लिए शव को वहां रख पाना मुमकिन नहीं रहा. इसके बाद परिजनों ने मालाड के कोंकणीपाड़ा वाले इस डे-केयर सेंटर में शव को सुरक्षित रखने का बंदोबस्त किया था.
क्रायोनिक्स की उम्मीद और 50 लाख रुपये का भारी-भरकम खर्च
पुलिस जांच में सामने आई जानकारी के अनुसार, परिवार इस शव को सुरक्षित रखने के एवज में हर महीने करीब 1.30 लाख रुपये का भुगतान करता था. हालांकि इस नियमित राशि की अभी कोई आधिकारिक कानूनी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन प्राथमिक जांच में यही बात सामने आई है कि बीते चार सालों के दौरान शव के रखरखाव और फ्रीजर की व्यवस्था पर 50 लाख रुपये से भी ज्यादा की रकम खर्च की जा चुकी है.
जांच के दौरान बुजुर्ग के पारिवारिक ढांचे का भी पता चला. मृतक की दो बेटियां, एक बेटा और उनकी पत्नी जीवित हैं. उनकी एक बेटी अमेरिका में रहती है. पूछताछ में परिजनों ने बताया कि अमेरिका में रहने वाली बेटी की बातचीत किसी वैज्ञानिक से हुई थी. उस वैज्ञानिक ने जानकारी दी थी कि अगर किसी मृत व्यक्ति के शरीर को विशेष तापमान और तकनीक के जरिए सुरक्षित रखा जाए, तो भविष्य में उन्नत चिकित्सा विज्ञान के जरिए दोबारा जीवन मिलने की संभावनाओं पर शोध चल रहा है. विज्ञान की इस तकनीक और अवधारणा को क्रायोनिक्स कहा जाता है. इसी वैज्ञानिक उम्मीद और भावनात्मक लगाव के चलते परिजनों ने शव का अंतिम संस्कार न करके उसे संरक्षित रखने का कठिन निर्णय लिया. अमेरिका में रहने वाली बेटी, भारत में रहने वाली दूसरी बेटी और बेटे के बीच लंबी बातचीत के बाद साल 2022 से शव को फ्रीजर में रखा गया था.
महिला के फोन कॉल और आधी रात को हुआ अंतिम संस्कार
इस पूरे मामले की कड़ियों को जोड़ने में पुलिस ने पाया कि इस पार्सल को भेजने के पीछे एक महिला की भूमिका थी. पुलिस सूत्रों के अनुसार, यह संदिग्ध पार्सल एक महिला द्वारा भेजा गया था. बताया जा रहा है कि वही महिला इससे पहले भी मुंबई पुलिस को लगातार फोन करके इस बारे में जानकारी देने की कोशिश कर रही थी, लेकिन शुरुआती स्तर पर फोन पर मिली इस बात को गंभीरता से नहीं लिया गया था. आखिरकार जब पार्सल कुरार पुलिस स्टेशन और फिर डे-केयर सेंटर पहुंचा, तब जाकर पुलिस हरकत में आई.
सच्चाई सामने आने के बाद पुलिस ने कानूनी औपचारिकताएं पूरी कीं. मंगलवार की देर रात करीब 3 बजे कड़े सुरक्षा घेरे के बीच उस बुजुर्ग के शव को डीप फ्रीजर से बाहर निकाला गया और पोस्टमार्टम व सुरक्षित रखने के लिए भायखला की मोर्चरी भेजा गया. इसके बाद बुधवार के दिन परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में बुजुर्ग का अंतिम संस्कार संपन्न कराया गया. अमेरिका में रहने वाली बेटी भारत नहीं आ सकी, इसलिए उसने वीडियो कॉल के जरिए अपने पिता के अंतिम संस्कार की रस्मों को देखा.
स्थानीय लोगों में दहशत और जमीन का पुराना विवाद
मालाड के कोंकणीपाड़ा में इस घटना की खबर फैलते ही आसपास के बाशिंदों में खौफ और चिंता का माहौल बन गया है. स्थानीय नागरिकों का कहना है कि उन्हें इस बात का तनिक भी अंदेशा नहीं था कि उनके पड़ोस में बंद पड़े इस सेंटर में चार साल से किसी इंसान का शव पड़ा हुआ है. लोगों ने यह भी शिकायत की है कि इलाके में शाम ढलते ही रोशनी की भारी कमी रहती है और अंधेरा पसरा रहता है, ऐसे में इस तरह की घटना सामने आने से लोग बेहद डरे हुए हैं.
इसके अलावा, स्थानीय लोगों ने सेंटर के आसपास मेडिकल कचरा, दवाइयों के खाली डिब्बे, ऑक्सीजन सिलिंडर, इस्तेमाल किए गए इंजेक्शन और अन्य चिकित्सीय उपकरण भी देखे जाने की बात कही है. इस डे-केयर सेंटर की जमीन को लेकर भी एक कानूनी विवाद चल रहा है, जिसका मामला बॉम्बे हाईकोर्ट में लंबित है. इस वजह से भी सेंटर लंबे समय से सामान्य गतिविधियों के लिए बंद पड़ा हुआ था.
जांच के दायरे में उठे कई कानूनी और प्रशासनिक सवाल
अब इस पूरे मामले में पुलिस कई गंभीर कोणों से तफ्तीश कर रही है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक बंद डे-केयर सेंटर में इतने लंबे समय तक किसी शव को फ्रीजर में रखने की व्यवस्था किन नियमों के तहत की गई थी? इस केंद्र के भीतर शव रखे होने की जानकारी डॉक्टर अहमद सय्यद और परिजनों के अलावा और किन-किन लोगों को थी? इसके साथ ही उस महिला की पहचान और उसके पार्सल भेजने के मकसद की भी पड़ताल की जा रही है कि आखिर उसने यह गोपनीय सूचना पुलिस तक क्यों और कैसे पहुंचाई.
पुलिस उस वित्तीय लेन-देन की भी गहराई से जांच कर रही है जिसके तहत हर महीने कथित तौर पर 1.30 लाख रुपये का भुगतान किया जा रहा था. इस वित्तीय पहलू और सेंटर की वास्तविक भूमिका को लेकर सबूत जुटाए जा रहे हैं. वहीं कई राजनीतिक नेताओं ने भी इस मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है. नेताओं का कहना है कि अपने परिजन के प्रति परिवार की भावनाओं और वैज्ञानिक उम्मीद को समझा जा सकता है, लेकिन यदि इसमें कानून का उल्लंघन, अवैध गतिविधि या किसी पक्ष की प्रशासनिक लापरवाही साबित होती है, तो उस पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए.


















