अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में जापानी येन इस समय एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। जापानी केंद्रीय बैंक की आगामी मौद्रिक नीति समीक्षा को लेकर निवेशकों और रणनीतिकारों के बीच तीखी बहस छिड़ी हुई है। वर्षों तक शून्य से नीचे और अत्यधिक सुस्त ब्याज दरों के साये में रहने के बाद जापानी अर्थव्यवस्था अब मूल्य वृद्धि के नए दौर में प्रवेश कर रही है। ऐसे माहौल में केंद्रीय बैंक के गवर्नर काज़ुओ उएदा के सामने मुद्रास्फीति के दूसरे चरण के प्रभावों को नियंत्रित करने की गंभीर चुनौती पेश आ रही है। बाजार विशेषज्ञ यह परखने की कोशिश कर रहे हैं कि नीतिगत सख्ती की रफ्तार कितनी तेज होगी और क्या अमेरिकी डॉलर के मुकाबले येन अपनी हालिया बढ़त को बरकरार रख पाएगा।
मुद्रास्फीति का बदलता मिजाज और केंद्रीय बैंक की दुविधा
जापान में दशकों से चले आ रहे मंदी और अपस्फीति के दौर के खात्मे के बाद हालात काफी बदल चुके हैं। वहां अब केवल आयातित वस्तुओं की महंगाई ही चिंता का कारण नहीं है, बल्कि घरेलू कंपनियों और उपभोक्ताओं के व्यवहार में आ रहे मनोवैज्ञानिक बदलाव भी नीति निर्माताओं की परीक्षा ले रहे हैं। जब तक देश में कंपनियों द्वारा वेतन बढ़ाने और उपभोक्ताओं द्वारा अधिक खर्च स्वीकार करने का सिलसिला स्थायी नहीं होता, तब तक कीमतों में निरंतर संतुलन साधना आसान नहीं होगा। रैबोबैंक की वरिष्ठ विदेशी मुद्रा रणनीतिकार जेन फोली के अनुसार, बाजार यह देखना चाहता है कि क्या उएदा त्वरित नीतिगत सख्ती का स्पष्ट संदेश दे पाएंगे।
यदि केंद्रीय बैंक दरों में बढ़ोतरी के संकेत देने से चूक जाता है, तो बाजार में निराशा फैल सकती है। इस स्थिति में सप्ताह के अंत तक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले येन में मुनाफावसूली की प्रबल संभावना बन सकती है। हालांकि, जेन फोली का यह भी मानना है कि उएदा के पास सख्त मौद्रिक रुख अपनाने के लिए पर्याप्त आर्थिक आंकड़े मौजूद हैं। इस वजह से किसी बड़ी निराशा की आशंका सीमित हो जाती है और डॉलर-येन जोड़ी के 160.00 के ऊंचे स्तर तक लौटने का जोखिम भी टल सकता है। उनका तीन महीने का अनुमानित लक्ष्य डॉलर-येन के लिए 154.00 के आसपास केंद्रित है।
डॉलर के मुकाबले येन का हालिया कारोबार
विदेशी मुद्रा विनिमय में हाल के कारोबारी सत्रों के दौरान डॉलर-येन का उतार-चढ़ाव खासा दिलचस्प रहा है। एशियाई सत्र में यह जोड़ी 156.00 के निचले स्तर को छूने के बाद तुरंत संभलती नजर आई। इससे पहले लगातार तीन सत्रों तक चली बढ़त पर अचानक विराम लगा, जिसने इस जोड़ी को लगभग दो सप्ताह के उच्च स्तर तक पहुंचाया था। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आक्रामक संकेतों के बाद डॉलर अपने सात सप्ताह के उच्चतम शिखर पर पहुंचा था, लेकिन इसके बाद उसकी तेजी थोड़ी धीमी पड़ी।
दूसरी ओर, बैंक ऑफ जापान द्वारा अपनी नीतियों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया तेज करने की उम्मीदों ने जापानी मुद्रा को सहारा दिया है। इससे डॉलर की बढ़त काफी हद तक सीमित हो गई और निवेशकों का पूरा ध्यान शुक्रवार को आने वाले नीतिगत फैसले पर केंद्रित हो गया। बाजार प्रतिभागी इस बात को लेकर बेहद सतर्क हैं कि क्या बैंक तुरंत दरों में बढ़ोतरी की घोषणा करेगा या भविष्य की बैठकों के लिए राह तैयार करेगा।
सस्ते कर्जों के वैश्विक दौर का अंत
बीते एक दशक से भी अधिक समय तक जापान की अत्यधिक कम ब्याज दरों ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में पूंजी की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की थी। जापानी येन दुनिया भर में सबसे सस्ता और पसंदीदा फंडिंग स्रोत बना रहा, जिसकी बदौलत खरबों डॉलर के अंतरराष्ट्रीय निवेश खड़े किए गए। जब दुनिया भर के प्रमुख केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लगातार ऊंचा कर रहे थे, तब जापान दुनिया में एक अकेला अपवाद बना हुआ था।
अब बैंक ऑफ जापान द्वारा नीतिगत सख्ती के नए चरण में प्रवेश करने की संभावनाओं ने इस पुराने समीकरण को पूरी तरह हिलाकर रख दिया है। जापान के आर्थिक सुधारों से उम्मीद बंधी है कि येन आने वाले महीनों में मौजूदा स्तरों के आसपास स्थिरता हासिल कर सकेगा। हालांकि, नीतिगत फैसले के फौरन बाद नए खरीदारों द्वारा लाभ समेटने की कोशिशें अल्पकालिक उठापटक ला सकती हैं।
वैश्विक मुद्राओं और सोने के बाजार पर असर
मुद्रा बाजार की यह हलचल केवल जापान और अमेरिका तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अन्य प्रमुख संपत्तियों पर भी इसका असर साफ दिख रहा है। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर ने एशियाई सत्र में खरीदारों की वापसी के साथ 0.7100 का आंकड़ा दोबारा हासिल किया। अमेरिकी डॉलर की रैली में आए ठहराव, रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया की तरफ से ब्याज दरों में बढ़ोतरी की अटकलों और अमेरिका तथा ईरान के बीच राजनयिक प्रयासों की उम्मीदों ने जोखिम उठाने की भावना को बल दिया है।
वहीं दूसरी तरफ, यूरोपीय कारोबारी सत्र के पहले हिस्से में सोने की कीमतों में भी सुधार दर्ज किया गया। पीली धातु अपने छह सप्ताह के निचले स्तर से उबरने में कामयाब रही। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में मामूली गिरावट ने डॉलर में मुनाफावसूली को प्रेरित किया, जिससे सोने को तात्कालिक सहारा मिला। इसके बावजूद फेडरल रिजर्व के आक्रामक दृष्टिकोण और पश्चिम एशिया के बढ़ते तनाव ने अमेरिकी डॉलर को सुरक्षित ठिकाने के तौर पर मजबूत बनाए रखा है, जिससे बिना ब्याज वाली इस धातु की बढ़त पर कुछ सीमाएं भी लगी हुई हैं।


















