अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में यूरो और अमेरिकी डॉलर की विनिमय दर में असाधारण शांति देखने को मिल रही है, लेकिन वित्तीय संकेतकों में उभरता हुआ अंतर आने वाले दिनों में तेज झटकों की ओर इशारा कर रहा है। तीन महीनों की अवधि में यूरो और डॉलर के बीच वास्तविक वोलैटिलिटी यानी कीमतों में वास्तविक उतार-चढ़ाव कल गिरकर 4.53 प्रतिशत पर आ गया। यह स्तर पिछले लगभग पांच वर्षों के दौरान सबसे निचले पायदानों में गिना जा रहा है। ऐतिहासिक आंकड़ों के नजरिए से देखें तो 31 मई 2007 से लेकर अब तक के लगभग 20 वर्षों के रिकॉर्ड में ऐसे केवल तीन अवसर आए हैं जब तीन महीने की वास्तविक वोलैटिलिटी मौजूदा स्तर से भी नीचे दर्ज की गई थी। पूरे 20 वर्षों के कारोबारी इतिहास में केवल 2.2 प्रतिशत दिनों में ही यह पैमाना कल दर्ज किए गए स्तर से नीचे रहा है।
ऑप्शंस बाजार और वास्तविक आंकड़ों में गहरा अंतर
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस साल मुद्रा बाजार में इस असामान्य स्थिरता के पीछे कच्चे तेल की कीमतों पर केंद्रित गतिविधियां एक भूमिका निभा रही हैं, हालांकि केवल कच्चा तेल इतनी भारी गिरावट की पूरी व्याख्या नहीं कर सकता। सामान्य परिस्थितियों में तीन महीने की ऐतिहासिक वोलैटिलिटी और ऑप्शंस अनुबंधों की कीमतों से आंकी जाने वाली अगले तीन महीनों की अनुमानित वोलैटिलिटी लगभग एक ही दिशा में साथ-साथ कदमताल करती हैं। पिछले लगभग दो दशकों के दौरान अनुमानित वोलैटिलिटी में होने वाले 80 प्रतिशत बदलावों की व्याख्या ऐतिहासिक वोलैटिलिटी के आधार पर की जाती रही है। वर्तमान समय में दोनों पैमानों के बीच एक स्पष्ट अलगाव बन चुका है, जहां ऐतिहासिक वोलैटिलिटी अनुमानित वोलैटिलिटी की तुलना में एक प्रतिशत अंक से भी अधिक नीचे चल रही है।
समग्र स्तरों के इतना कम होने के बावजूद दोनों संकेतकों के बीच इतना बड़ा अंतर पिछले 20 वर्षों के कारोबारी दिनों में केवल लगभग 4 प्रतिशत मौकों पर ही देखा गया है। इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि पिछले तीन महीनों के दौरान भले ही वास्तविक रूप से बाजार बेहद शांत रहा हो, लेकिन ऑप्शंस बाजार निकट भविष्य में विनिमय दर में तेज उतार-चढ़ाव लौटने की पूरी उम्मीद लगाए बैठा है। लाइव तकनीकी आंकड़ों के मुताबिक यूरो और डॉलर की दर 1.14 के स्तर पर बनी हुई है, जो पिछले बंद भाव 1.14 की तुलना में 0.02 प्रतिशत की मामूली बढ़त दर्शाती है। इसका 52 हफ्तों का दायरा 1.13 से 1.20 के बीच रहा है। तकनीकी संकेतकों में 14 दिवसीय रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स यानी RSI 26 पर आ चुका है, जो इसे ओवरसोल्ड जोन में दर्शाता है। 20-दिवसीय मूविंग एवरेज 1.15, 50-दिवसीय 1.15 और 200-दिवसीय मूविंग एवरेज 1.16 के स्तर पर बना हुआ है, जो डेथ क्रॉस के साथ लॉन्ग-टर्म डाउनट्रेंड को रेखांकित करता है।
कच्चे तेल में तेजी और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का दबाव
वैश्विक वित्तीय परिदृश्य पर ऊर्जा संकट और महंगाई का साया गहराने लगा है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर निकल चुकी हैं। इसके साथ ही अमेरिका के परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी PMI आंकड़े बहु-वर्षीय उच्च स्तरों को छू रहे हैं। फेडरल ओपन मार्केट कमेटी यानी FOMC के सदस्य आगामी ब्याज दरों के रास्ते को लेकर लगातार कड़ा रुख अपना रहे हैं। इन तमाम वजहों से अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड कर्व के दोनों सिरों पर सरकारी बॉन्ड की प्रतिफल दरें कई साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि कुल मार्केटेबल ट्रेजरीज में ट्रेजरी नोट्स की हिस्सेदारी लगभग 52 प्रतिशत बैठती है, इसलिए इन प्रतिफलों में होने वाली किसी भी बढ़ोतरी का असर अमेरिका के वित्तीय परिदृश्य पर काफी दर्दनाक साबित हो रहा है।
अमेरिकी डॉलर सूचकांक को भू-राजनीतिक तनावों से भी भरपूर सहारा मिल रहा है, जिससे डॉलर दो महीने के उच्चतम स्तर तक चढ़ने में कामयाब रहा है। इस मजबूत अमेरिकी रुख का असर अन्य प्रमुख मुद्राओं और कीमती धातुओं पर भी साफ देखा जा सकता है।
ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और येन पर बढ़ता दबाव
एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर शुक्रवार को अगस्त की शुरुआत के बाद के सबसे निचले स्तर पर फिसल गया। रातभर के कारोबार में 200-दिवसीय सिंपल मूविंग एवरेज से नीचे टूटने के बाद यह मुद्रा 0.7000 के स्तर के पास बेहद कमजोर नजर आ रही है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आक्रामक मिजाज, दो दिनों से कच्चे तेल में जारी उछाल से उपजी महंगाई की चिंताओं और बढ़ती बॉन्ड यील्ड के आगे ऑस्ट्रेलियाई केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीदें भी फीकी पड़ गई हैं। भू-राजनीतिक जोखिमों से मजबूत हुआ अमेरिकी डॉलर ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा पर भारी दबाव बना रहा है।
दूसरी ओर जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की तेज चाल शुक्रवार को एशियाई सत्र में थोड़ी थमती दिखी। तीन सप्ताह के उच्च स्तर 159.00 तक पहुंचने के बाद यह रफ्तार सीमित हुई है, क्योंकि बाजार में येन मंदड़ियों के मन में जापानी अधिकारियों द्वारा संभावित करेंसी हस्तक्षेप का डर बैठ गया है। बैंक ऑफ जापान ने पिछले सप्ताह अपनी मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में एक और कदम उठाते हुए 7-2 के बहुमत से अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया। यह फैसला कई हफ्तों से बनी बाजार की आम उम्मीदों के पूरी तरह अनुकूल रहा। हालांकि बैंक ऑफ जापान के इस रुख को बहुत आक्रामक नहीं माना गया, जिससे येन की रिकवरी सीमित रह सकती है और डॉलर को बढ़त बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
सोने में नरमी और आगामी बाजार रुझान
कमोडिटी बाजार में सोना लगातार एक सीमित दायरे में कारोबार कर रहा है और कमजोर बुनियादी परिदृश्य के चलते पिछले दिन बने साप्ताहिक निचले स्तर के करीब सुस्त पड़ा हुआ है। अमेरिकी डॉलर की तेज रैली के बाद आई हल्की सुस्ती ने सोने को मामूली सहारा जरूर दिया है, लेकिन अमेरिकी फेडरल रिजर्व का आक्रामक दृष्टिकोण, बॉन्ड प्रतिफलों के ऊंचे स्तर और अनसुलझी भू-राजनीतिक परिस्थितियां डॉलर खरीदारों का पक्ष मजबूत बनाए हुए हैं।
यूरो और डॉलर के मौजूदा शांत दायरे के पीछे ऑप्शंस ट्रेडर्स जिस बड़े तूफान की तैयारी कर रहे हैं, वह संकेत देता है कि आने वाले हफ्तों में मुद्रा बाजारों की यह सुस्ती खत्म हो सकती है। अमेरिकी बॉन्ड बाजार का तनाव और 100 डॉलर से ऊपर तैरता कच्चा तेल जल्द ही विनिमय दरों को नए सिरे से संतुलित करने पर मजबूर कर सकते हैं।

















