अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति समिति ने हाल ही में नीतिगत ब्याज दरों में 25 आधार अंकों (bps) की वृद्धि की है, जो अगस्त 2023 के बाद से वहां दर वृद्धि का पहला कदम है। इस फैसले के ठीक अगले दिन बैंक ऑफ इंग्लैंड ने अपने रुख पर कायम रहते हुए नीतिगत दर को 3.75 प्रतिशत पर स्थिर रखा, जो पिछले साल के अंत से इसी स्तर पर बरकरार है। इसके बाद वैश्विक वित्तीय विश्लेषकों और नीति निर्माताओं के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या बैंक ऑफ इंग्लैंड भी अमेरिकी केंद्रीय बैंक के इस कड़े रुख के दबाव में अपनी मौद्रिक नीति को सख्त करने पर मजबूर होगा, विशेष रूप से तब जब दिसंबर में फेडरल रिजर्व की ओर से 25 आधार अंकों की एक और बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है।
केंद्रीय बैंकों के बीच तालमेल और वैश्विक प्रभाव
सहस्राब्दी की शुरुआत के बाद से अमेरिकी फेडरल रिजर्व और बैंक ऑफ इंग्लैंड के नीतिगत निर्णयों में बढ़ती समानता के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। इसके पीछे वैश्विक आर्थिक कारकों की बढ़ती भूमिका एक अहम वजह मानी जाती है। मौद्रिक नीति समिति की सदस्य मेगन ग्रीन ने इस साल की शुरुआत में दिए गए एक भाषण में इसका विस्तार से उल्लेख किया था। उन्होंने रेखांकित किया कि वैश्विक ब्याज दर कारक 1970 और 1999 के बीच घरेलू नीति दरों में होने वाले उतार-चढ़ाव के सिर्फ 10 प्रतिशत हिस्से की व्याख्या करता था, लेकिन 1999 के बाद यह प्रभाव बढ़कर 38 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से पहले और कोरोना महामारी के बाद के नीतिगत चक्र इसके प्रमुख उदाहरण हैं, हालांकि इन दोनों दौर में बैंक ऑफ इंग्लैंड ने फेडरल रिजर्व से पहले दरों में बदलाव शुरू किया था।
नीतिगत समानता अनिवार्य नहीं, ब्रेक्जिट का ऐतिहासिक उदाहरण
हालांकि ऐतिहासिक आंकड़े यह भी साबित करते हैं कि दोनों केंद्रीय बैंकों के बीच नीतिगत तालमेल पूरी तरह स्वचालित या अनिवार्य नहीं होता है। वर्ष 2016 से 2019 के बीच फेडरल रिजर्व के दर वृद्धि चक्र के दौरान यह साफ देखा गया था। उस दौर में ब्रिटेन में ब्रेक्जिट से जुड़ी चिंताओं और मांग में कमी के कारण बैंक ऑफ इंग्लैंड ने ब्याज दरों में कटौती की थी, जिसके करीब एक साल बाद ही उसने मामूली दर वृद्धि की शुरुआत की थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व का सख्त रुख अपने आप में ब्रिटिश केंद्रीय बैंक को दरें बढ़ाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। बाजार की विश्वसनीयता बनाए रखने का पहलू बेशक अहम है, लेकिन अंतिम निर्णय ब्रिटेन के आंतरिक आर्थिक आंकड़ों के आधार पर ही लिया जाता है, जहां वर्तमान परिस्थितियों में दरों को स्थिर रखने का पलड़ा थोड़ा भारी नजर आ रहा है।
करेंसी बाजारों में डॉलर का दबदबा और येन में नरमी
अमेरिकी केंद्रीय बैंक के आक्रामक रुख और कच्चे तेल की कीमतों में दो दिनों की तेजी ने मुद्रास्फीति की चिंताओं को फिर से हवा दे दी है, जिसके चलते अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बहु-वर्षीय उच्च स्तर पर पहुंच गई है। इसके साथ ही भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं ने अमेरिकी डॉलर को दो महीने के उच्च स्तर पर पहुंचा दिया है। मुद्रा बाजार में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर दबाव में आकर शुक्रवार को एशियाई सत्र के दौरान 0.7000 के मनोवैज्ञानिक स्तर के करीब कमजोर दिखा, जो अगस्त की शुरुआत के बाद का निचला स्तर है और इसने अपने 200-दिवसीय सरल मूविंग एवरेज (SMA) को भी तोड़ दिया है। इससे ऑस्ट्रेलियाई रिजर्व बैंक की दर वृद्धि की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया है।
दूसरी ओर, जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर (USD/JPY) तीन सप्ताह के उच्चतम स्तर 159.00 तक पहुंचने के बाद थोड़ा सुस्त पड़ा है। बाजार में जापानी अधिकारियों द्वारा संभावित मुद्रा हस्तक्षेप के डर से ट्रेडर्स सतर्क रुख अपना रहे हैं। बैंक ऑफ जापान ने पिछले सप्ताह अपनी मौद्रिक नीति को सामान्य करने के क्रम में अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया था, जिसे 7-2 के बहुमत से मंजूरी मिली थी। वर्तमान में तकनीकी आंकड़ों के अनुसार, USD/JPY 158.21 के आसपास कारोबार कर रहा है, जहां 14-दिवसीय आरएसआई 56 पर है और 20-दिवसीय, 50-दिवसीय तथा 200-दिवसीय ईएमए क्रमशः 156.94, 158.07 और 157.67 पर बने हुए हैं। दैनिक धुरी स्तर 158.34 है, जिसमें प्रमुख प्रतिरोध 158.73 और 159.25 पर तथा समर्थन स्तर 157.82 और 157.43 पर मौजूद हैं।
सोने की कीमतों में सीमित उतार-चढ़ाव
कमोडिटी बाजार में सोना शुक्रवार को शुरुआती यूरोपीय सत्र के दौरान एक संकीर्ण दायरे में संघर्ष करता नजर आया और अपने साप्ताहिक निचले स्तर के करीब बना रहा। अमेरिकी डॉलर की हालिया तेज बढ़त में हल्का ठहराव आने से सोने को थोड़ा सहारा जरूर मिला, लेकिन ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और फेडरल रिजर्व के कड़े मौद्रिक रुख के कारण सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने में बड़ी खरीदारी नहीं देखी जा रही है। वैश्विक वित्तीय बाजारों का रुख पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले हफ्तों में आर्थिक वृद्धि और महंगाई के आंकड़े केंद्रीय बैंकों की नीतियों को किस दिशा में ले जाते हैं।
















