अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी ने कनाडा की राष्ट्रीय आय के समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है। ऊर्जा उत्पादों के निर्यात से मिलने वाले भारी राजस्व के चलते देश की वास्तविक ग्रॉस डोमेस्टिक इनकम यानी सकल घरेलू आय की रफ्तार सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में कहीं अधिक तेज दर्ज की जा रही है। हालांकि, इस आर्थिक लाभ का वितरण पूरे मुल्क में समान रूप से नहीं हो पा रहा है। ऊर्जा का दोहन करने वाली बड़ी कंपनियां और तेल संपदा से समृद्ध सूबे इस अप्रत्याशित कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा हासिल कर रहे हैं, जबकि अन्य प्रांतों में रहने वाले आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी पर इसका विपरीत असर दिखाई दे रहा है।
मुनाफे में तेल कंपनियों और चुनिंदा प्रांतों का दबदबा
राष्ट्रीय आय में हालिया उछाल के पीछे सबसे बड़ा इंजन कॉरपोरेट मुनाफा रहा है। गैर वित्तीय औद्योगिक क्षेत्र की शुद्ध आय में हुई कुल बढ़ोतरी में लगभग 30 प्रतिशत योगदान अकेले तेल और प्राकृतिक गैस निष्कर्षण उद्योग का रहा है। जब वैश्विक स्तर पर हाइड्रोकार्बन की कीमतें मजबूत होती हैं, तो उत्पादन करने वाली फर्मों के बहीखातों में सीधे शुद्ध मुनाफा दर्ज होता है। इसके साथ ही प्रांतीय सरकारों को मिलने वाली रॉयल्टी और टैक्स का एक बहुत बड़ा प्रवाह सीधे ऊर्जा उत्पादक क्षेत्रों के सरकारी खजाने में पहुंच रहा है। इसके उलट, जिन प्रांतों में ऊर्जा के प्राकृतिक संसाधन मौजूद नहीं हैं, वहां न तो इस स्तर का कॉरपोरेट निवेश पहुंच रहा है और न ही स्थानीय सरकारों को कोई अतिरिक्त राजस्व मिल रहा है।
ईंधन की खपत घटी लेकिन खर्च में भारी उछाल
रॉयल बैंक ऑफ कनाडा के अर्थशास्त्री नाथन जानज़ेन के विश्लेषण के अनुसार, देश के अधिकांश परिवारों को किसी भी प्रत्यक्ष आय लाभ के बिना केवल बढ़ती महंगाई का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी तिमाही के आंकड़ों पर गौर करें तो कनाडाई नागरिकों ने एक साल पहले की समान अवधि की तुलना में मोटर वाहन ईंधन पर अनुमानित 2.6 अरब डॉलर अधिक खर्च किए हैं। औसतन प्रति परिवार यह अतिरिक्त वित्तीय बोझ लगभग 150 डॉलर बैठता है। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि परिवारों ने पिछले साल के मुकाबले 3 प्रतिशत कम मात्रा में ईंधन खरीदा, फिर भी उन्हें इसके लिए कहीं अधिक कीमत चुकानी पड़ी। इस मूल्य वृद्धि की सबसे भीषण मार उन प्रांतों पर पड़ी है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए तेल आयात पर निर्भर हैं।
केंद्रीय बैंक के सामने मौद्रिक नीति का जटिल संकट
क्षेत्रीय स्तर पर आर्थिक स्थितियों का यह असंतुलन केंद्रीय बैंक यानी बैंक ऑफ कनाडा के लिए नीति निर्धारण को बेहद पेचीदा बना रहा है। बैंक ऑफ कनाडा पूरे देश के लिए केवल एक ही मानक ब्याज दर तय करता है। सामान्य तौर पर कच्चे तेल की मजबूत कीमतें देश की समग्र आर्थिक वृद्धि के लिए तटस्थ से लेकर मामूली सकारात्मक मानी जाती हैं। फिर भी, यदि ऊर्जा कीमतें लंबे समय तक ऊपरी स्तरों पर टिकी रहती हैं, तो इसका सीधा खतरा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के कड़े होने के साथ-साथ व्यापक मुद्रास्फीति दबावों को हवा देने का होता है। एक तरफ तेल उत्पादक क्षेत्रों में अतिरिक्त पूंजी का प्रवाह मांग बढ़ा सकता है, वहीं आयातक प्रांतों में आम लोगों की क्रय शक्ति घटने से मंदी जैसी स्थिति बन सकती है, जिससे साझा मौद्रिक कदम उठाना मुश्किल हो जाता है।
वैश्विक मुद्रा और बॉन्ड बाजारों की हलचल
ऊर्जा क्षेत्र के इन घटनाक्रमों के बीच वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी व्यापक उथल-पुथल देखने को मिली है। शुक्रवार के एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर 0.6950 के स्तर की ओर बढ़ गया। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन वॉर्श की टिप्पणियों के बाद अमेरिकी डॉलर पर भारी बिकवाली का दबाव देखा गया। वॉर्श ने स्पष्ट किया कि वह मूल्य स्थिरता बनाए रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं, लेकिन उन्होंने आने वाले समय में ब्याज दरों के रास्ते को लेकर कोई निश्चित संकेत नहीं दिए। इस अनिर्णय की स्थिति के कारण अमेरिकी डॉलर कमजोर हुआ और डॉलर-येन जोड़ी 158.00 के स्तर से नीचे फिसल गई। इसके अलावा अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में मामूली सुधार और डॉलर की सुस्ती के बीच सोना प्रति ट्रॉय औंस 4,200 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर के नीचे घट-बढ़ के साथ कारोबार करता रहा।
क्रिप्टो बाजार पर वृहद आर्थिक दबाव
अक्टूबर के महीने में डिजिटल परिसंपत्ति बाजार पर भी व्यापक आर्थिक दबाव साफ नजर आया है। प्रमुख क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन हफ्ते की शुरुआत में फिसलकर 80,000 डॉलर के स्तर से नीचे चली गई थी, हालांकि शुक्रवार को इसमें मामूली सुधार देखा गया और यह 82,000 डॉलर के आसपास कारोबार करती दिखी। समग्र आर्थिक मोर्चे पर बढ़ती अनिश्चितता और निवेशकों की तरफ से घटती मांग के चलते क्रिप्टो बाजार लगातार सुस्ती और उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहा है। ऊर्जा की लागत, ब्याज दरों की अनिश्चित दिशा और मुद्राओं के उतार-चढ़ाव ने वैश्विक निवेशकों को सतर्क रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है।


















