केंद्रीय बैंकों के लिए नीतिगत फैसले लेना तब सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाता है जब अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति सिर उठाने लगे और आम जनता की क्रय शक्ति में सुस्ती छाने लगे। न्यूज़ीलैंड का केंद्रीय बैंक, रिज़र्व बैंक ऑफ न्यूज़ीलैंड, इस समय ठीक इसी दोहरी चुनौती के चक्रव्यूह में उलझ गया है। एक तरफ घरेलू स्तर पर जरूरी वस्तुओं की कीमतें लगातार ऊपर चढ़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वास्तविक उपभोक्ता मांग में भारी संकुचन दिखाई दे रहा है। वित्तीय बाजारों में इस बात की 80 प्रतिशत संभावना जताई जा रही है कि केंद्रीय बैंक अगले दो सप्ताह में ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है, लेकिन आगामी तिमाही आंकड़ों से पहले नीति निर्माताओं के सामने असमंजस गहरा गया है।
मासिक मूल्य सूचकांक में उछाल और ऊर्जा कीमतों का दबाव
न्यूज़ीलैंड के ताजा आर्थिक आंकड़ों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि देश में महंगाई का दबाव उम्मीद से कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है। सितंबर के मासिक मूल्य सूचकांक में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 5.2 प्रतिशत की भारी तेजी दर्ज की गई है। यह सूचकांक न्यूज़ीलैंड के संपूर्ण उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई के लगभग आधे घटकों को ही दर्शाता है, क्योंकि व्यापक स्तर पर सीपीआई आंकड़े देश में केवल तिमाही आधार पर ही जारी किए जाते हैं।
इस तीव्र उछाल के पीछे ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े घटकों की सबसे बड़ी भूमिका रही है। ईंधन और परिवहन लागत में बढ़ोतरी ने समग्र आंकड़ों को ऊपर खींचने का काम किया है। हालांकि चिंता की बात केवल पेट्रोल या डीजल तक सीमित नहीं है। ईंधन की कीमतों को अलग हटाकर देखने पर भी अंतर्निहित महंगाई दर में तेजी आई है। अगस्त के महीने में पेट्रोल और डीजल के बिना महंगाई की सालाना दर 3.2 प्रतिशत थी, जो सितंबर में बढ़कर 3.6 प्रतिशत पर पहुंच गई। इससे यह संकेत मिलता है कि रोजमर्रा के अन्य उत्पादों में भी मूल्य वृद्धि का असर फैल चुका है।
इलेक्ट्रॉनिक कार्ड खर्च में ठहराव और नकारात्मक वास्तविक खपत
महंगाई के इस दबाव के बिल्कुल उलट, देश के खुदरा बाजार से आने वाले आंकड़े निराशाजनक तस्वीर पेश कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक कार्ड से किए जाने वाले लेन-देन के आंकड़ों के अनुसार न्यूज़ीलैंड में रिटेल बिक्री पूरी तरह से ठहर गई है। अगस्त की तुलना में मौसमी रूप से समायोजित खर्च में 0.4 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह गिरावट और भी गंभीर हो सकती थी, लेकिन पेट्रोल पर होने वाले खर्च में आए तेज उछाल ने समग्र आंकड़े को कुछ हद तक सहारा दे दिया।
यदि कुल खर्च में से पेट्रोल पर किए गए खर्च को हटा दिया जाए, तो खुदरा लेन-देन में 0.7 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि ये सभी आंकड़े केवल सांकेतिक मूल्यों पर आधारित हैं। जब इनमें मौजूदा मूल्य वृद्धि यानी महंगाई का समायोजन किया जाता है, तो न्यूज़ीलैंड में वास्तविक खपत की वृद्धि दर सालाना आधार पर स्पष्ट रूप से नकारात्मक दायरे में दिखाई देती है। इसका सीधा मतलब यह है कि घरेलू उपभोक्ता बढ़ती लागत के कारण अपनी वास्तविक खरीदारी में कटौती करने को मजबूर हो रहे हैं।
रिज़र्व बैंक ऑफ न्यूज़ीलैंड के सामने ब्याज दरों की दुविधा
कॉमर्सबैंक के विश्लेषक वोल्कमर बाउर का मानना है कि इन परस्पर विरोधी आंकड़ों ने न्यूज़ीलैंड डॉलर और केंद्रीय बैंक दोनों को एक कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया है। जहां एक ओर बढ़ता मासिक मूल्य सूचकांक आगामी तिमाही सीपीआई के उच्च स्तर पर रहने का स्पष्ट संकेत दे रहा है, वहीं दूसरी ओर घटता घरेलू खर्च यह चेतावनी दे रहा है कि अर्थव्यवस्था अत्यधिक सख्ती बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है।
बाजार भले ही आगामी दो हफ्तों में रिज़र्व बैंक ऑफ न्यूज़ीलैंड द्वारा दर वृद्धि की 80 प्रतिशत संभावना मानकर चल रहा हो, लेकिन विश्लेषक सतर्कता बरतने की सलाह दे रहे हैं। यही कारण है कि अगले सप्ताह जारी होने वाले संपूर्ण तिमाही सीपीआई आंकड़ों पर अब सामान्य से कहीं अधिक नजरें टिकी हुई हैं। यदि आधिकारिक सीपीआई आंकड़े उम्मीद से अधिक गर्म रहते हैं, तो केंद्रीय बैंक पर सख्त कदम उठाने का दबाव और अधिक बढ़ जाएगा, भले ही उससे घरेलू मांग पर और प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
वैश्विक मुद्रा बाजार और अमेरिकी डॉलर की कमजोरी का असर
न्यूज़ीलैंड की घरेलू आर्थिक स्थिति के समानांतर ही वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में भी महत्वपूर्ण हलचल देखने को मिल रही है। फेडरल रिज़र्व के चेयरमैन केविन वॉर्श की हालिया टिप्पणियों के बाद अमेरिकी डॉलर पर बिकवाली का दबाव बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की वार्षिक बैठकों के दौरान वॉर्श ने मूल्य स्थिरता हासिल करने की प्रतिबद्धता तो दोहराई, लेकिन भविष्य में ब्याज दरों के रास्ते को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया।
फेडरल रिज़र्व के इस गैर-प्रतिबद्ध रुख के चलते अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (डीएक्सवाई) गिरकर करीब दो सप्ताह के निचले स्तर पर आ गया। इसका असर विभिन्न मुद्रा युग्मों पर तत्काल दिखा। एशियाई कारोबारी सत्र में शुक्रवार को ऑस्ट्रेलियाई डॉलर मजबूत होकर 0.6950 के स्तर की ओर बढ़ गया। वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी डॉलर में आई कमजोरी के कारण यूएसडी/जेपीवाई फिसलकर 158.00 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे आ गया। डॉलर में आई इस नरमी ने सोने की कीमतों को भी सहारा दिया, जिससे सुरक्षित निवेश के रूप में पीली धातु में लगातार दूसरे दिन तेजी दर्ज की गई, हालांकि सोना अभी भी अपने दो सप्ताह के सीमित दायरे में बना हुआ है।


















