अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के चौंकाने वाले नतीजों ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में उथल-पुथल मचा दी है। सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों सदनों में डेमोक्रेट पार्टी द्वारा बहुमत हासिल करने के बाद अमेरिकी डॉलर पर चौतरफा बिकवाली का दबाव देखा जा रहा है। सत्ता संतुलन में आए इस बड़े बदलाव के कारण निवेशकों के बीच वाशिंगटन में आगामी दो वर्षों के लिए राजनीतिक गतिरोध की चिंता बढ़ गई है, जिससे विदेशी मुद्रा बाजार में ग्रीनबैक अपने प्रमुख प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले लगातार पिछड़ रहा है।
संसद पर विपक्ष का कब्जा और व्हाइट हाउस की प्रतिक्रिया
मतगणना के आंकड़ों के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के आखिरी दो वर्षों के दौरान डेमोक्रेट्स ने संसद के दोनों सदनों पर पूर्ण नियंत्रण हासिल कर लिया है। इस चुनावी पराजय के कारणों पर बात करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने स्वीकार किया कि ईरान युद्ध इस हार के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार है। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपने मौजूदा प्रशासन के भीतर किसी भी तरह के बड़े फेरबदल की योजना नहीं बना रहे हैं।
वाशिंगटन में सत्ता के इस नए समीकरण ने शेयर बाजार के वायदा कारोबार को सीमित दायरे में ला दिया है। दूसरी ओर, अमेरिकी सरकार के दस वर्षीय ट्रेजरी बॉन्ड पर मिलने वाला यील्ड दबाव में आकर 4.95 प्रतिशत के स्तर से नीचे फिसल गया है। डॉलर इंडेक्स भी सितंबर महीने के अंत के बाद से अपने सबसे निचले दायरे में पहुँचते हुए 101.50 के करीब आ गया है। विश्लेषकों का मानना है कि दोनों दलों के बीच शक्ति के विभाजन से नीतिगत फैसले अटक सकते हैं, जिसका सीधा असर वित्तीय परिसंपत्तियों पर पड़ रहा है।
ग्लोबल करेंसी मार्केट में हलचल और सुरक्षित निवेश की मांग
मुद्रा विनिमय बाजार में बुधवार के शुरुआती सत्र के दौरान अमेरिकी डॉलर सबसे कमजोर स्विस फ्रैंक के खिलाफ नजर आया। वहीं जापानी येन के मुकाबले भी मुद्रा जोड़ी 158.00 के स्तर से नीचे फिसल गई थी, हालांकि बाद के कारोबार में इसमें हल्की रिकवरी देखी गई और यह करीब 0.4 प्रतिशत की दैनिक गिरावट के साथ 158.00 के थोड़ा ऊपर टिकी रही। राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ने की वजह से पूंजी अब सुरक्षित पनाहगाह समझी जाने वाली संपत्तियों की तरफ रुख कर रही है।
प्रशांत क्षेत्र की मुद्राओं की बात करें तो न्यूजीलैंड में तीसरी तिमाही के दौरान बेरोजगारी दर 5.6 प्रतिशत से बढ़कर 5.7 प्रतिशत तक पहुँच गई, जो कि बाजार के 5.5 प्रतिशत के अनुमान से ज्यादा कमजोर थी। इसके बावजूद कमजोर डॉलर के चलते कीवी डॉलर यानी NZD/USD में तेजी देखने को मिली और यह 0.4 प्रतिशत चढ़कर 0.5600 के पार निकल गया। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलियाई डॉलर यानी AUD/USD भी करीब 0.6965 के स्तर पर अपने दो सप्ताह के निचले स्तर से उबरता दिखा। हालांकि रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया के कम आक्रामक रुख ने इसकी बढ़त को एक सीमित दायरे में ही बांधे रखा।
डॉलर की कमजोरी और ट्रेजरी यील्ड में आई सुस्ती का सीधा लाभ सोने को मिला है। यूरोपीय कारोबारी सत्र के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोना अपने साप्ताहिक उच्च स्तर के करीब पहुँचते हुए 4,000 डॉलर के मनोवैज्ञानिक बैरियर से काफी ऊपर मजबूती से कारोबार कर रहा है। निवेशकों द्वारा सुरक्षित निवेश के विकल्प तलाशने से कीमती धातुओं को लगातार ठोस समर्थन मिल रहा है।
राजनीतिक जोखिम और दीर्घकालिक परिदृश्य
राजनीतिक विश्लेषकों और बैंकिंग संस्थानों का ध्यान अब इस बात पर है कि संसद में यह नया टकराव अमेरिकी आर्थिक नीतियों को किस दिशा में ले जाएगा। कॉमर्सबैंक ने संकेत दिया है कि यदि अमेरिका में राजनीतिक विमर्श किसी रचनात्मक दिशा में लौटता है, जो कि फिलहाल काफी मुश्किल लगता है, तो इससे डॉलर में शामिल राजनीतिक जोखिम का दबाव घट सकता है और लंबी अवधि में मुद्रा को बुनियादी मजबूती मिल सकती है।
मौजूदा माहौल में निवेशक इस बात को लेकर सतर्क हैं कि क्या नया विधायी ढांचा बजटीय खर्चों, उधारी सीमा और फेडरल रिजर्व से जुड़ी नीतियों पर नई रुकावटें खड़ी करेगा। ट्रेजरी बॉन्ड पर घटता रिटर्न इस बात का साफ संकेत है कि निवेशक भविष्य के आर्थिक विकास को लेकर बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं हैं।
वैश्विक वित्तीय तंत्र में डॉलर की हैसियत और फेड की नीतियां
दुनिया भर के विदेशी मुद्रा कारोबार में अमेरिकी डॉलर की स्थिति बेहद केंद्रीय रही है। वर्ष 2022 के आंकड़ों के मुताबिक, वैश्विक विदेशी मुद्रा के कुल कारोबार में 88 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी अकेले डॉलर की है, जो दैनिक रूप से लगभग 6.6 ट्रिलियन डॉलर के वित्तीय लेन-देन के बराबर बैठती है। दूसरे विश्व युद्ध के उपरांत डॉलर ने ब्रिटिश पाउंड की जगह लेते हुए दुनिया की प्रमुख आरक्षित मुद्रा का दर्जा प्राप्त किया था। ऐतिहासिक रूप से यह मुद्रा सोने पर आधारित थी, लेकिन 1971 के ब्रेटन वुड्स समझौते के खत्म होने के साथ ही गोल्ड स्टैंडर्ड समाप्त हो गया।
अमेरिकी डॉलर के मूल्य को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला कारक फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति है। केंद्रीय बैंक के दो मुख्य उद्देश्य हैं: मुद्रास्फीति को नियंत्रित कर मूल्य स्थिरता लाना और अधिकतम रोजगार सृजन को बढ़ावा देना। फेड का प्राथमिक उपकरण ब्याज दरों में बदलाव करना है। जब महंगाई 2 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर निकलती है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाता है, जिससे डॉलर को मजबूती मिलती है। इसके विपरीत जब आर्थिक विकास सुस्त पड़ता है या बेरोजगारी बढ़ती है, तो दरों में कटौती की जाती है, जिसका प्रतिकूल असर डॉलर के मूल्य पर पड़ता है।
असाधारण वित्तीय संकट के समय फेडरल रिजर्व राहत पैकेज के तहत अतिरिक्त डॉलर जारी कर क्वांटिटेटिव ईजिंग यानी मात्रात्मक सहजता का सहारा लेता है। 2008 के वित्तीय संकट के दौरान जब बैंकों ने आपसी अविश्वास के कारण कर्ज देना बंद कर दिया था, तब केंद्रीय बैंक ने वित्तीय संस्थानों से सरकारी बॉन्ड खरीदकर तरलता बढ़ाने के लिए इसका भरपूर इस्तेमाल किया था। यह उपाय आमतौर पर डॉलर को कमजोर करता है। इसके विपरीत जब फेड बॉन्ड खरीद बंद कर बैलेंस शीट सिकोड़ता है, जिसे क्वांटिटेटिव टाइटनिंग कहा जाता है, तो उससे सामान्य तौर पर डॉलर को समर्थन मिलता है। वर्तमान चुनावी परिणाम और आर्थिक अनिश्चितता के बीच फेडरल रिजर्व के अगले कदमों पर पूरे बाजार की निगाहें टिकी हुई हैं।
















