पश्चिम एशिया के अशांत भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यमन के ईरान समर्थित हूती आंदोलन पर सैन्य हमलों को लेकर दो बार अपना रुख बदला। शुरुआत में ट्रंप ने अपने सलाहकारों के सामने स्पष्ट किया था कि वह हूती विद्रोहियों के खिलाफ किसी भी तरह के सैन्य हमले के पक्ष में नहीं हैं। इसके बावजूद सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप पर व्यक्तिगत रूप से संपर्क साधते हुए अमेरिकी हवाई हमलों को अंजाम देने का दबाव बनाया। इस द्विपक्षीय बातचीत के बाद ट्रंप ने पेंटागन को सैन्य कार्रवाई की तैयारी करने का निर्देश जारी किया, लेकिन महज कुछ ही दिनों के भीतर उन्होंने अपना यह कदम वापस खींच लिया।
सऊदी राजधानी पर बैलिस्टिक मिसाइल हमले से भड़का तनाव
सऊदी अरब और अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व के बीच यह रणनीतिक खींचतान अचानक शुरू नहीं हुई। हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद को निशाना बनाते हुए एक बैलिस्टिक मिसाइल दागी थी। हालांकि सऊदी रक्षा बलों ने इस मिसाइल को हवा में ही मार गिराया, लेकिन हूती गुट ने इसके तुरंत बाद रियाद के कई संवेदनशील ठिकानों पर हमलों को अंजाम देने का दावा ठोक दिया। इसी सैन्य उकसावे के बाद सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर रियाद की चिंताएं चरम पर पहुंच गईं, जिसने क्राउन प्रिंस को वॉशिंगटन से सीधी सैन्य मदद और त्वरित जवाबी कार्रवाई की मांग करने पर मजबूर किया।
कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय बाजार पर सीधा असर
भू-राजनीतिक घटनाक्रमों और मध्य पूर्व में तनाव के चलते कमोडिटी बाजार में हलचल तेज हो गई। अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) की कीमत दिन के कारोबार में 1.74 फीसदी की गिरावट दर्ज करते हुए 93.60 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर देखी गई। वहीं ताजा बंद आंकड़ों के अनुसार क्रूड ऑयल का भाव 94.29 डॉलर प्रति बैरल पर दर्ज हुआ, जो इसके पिछले बंद भाव 100.30 डॉलर से 5.99 फीसदी की कमजोरी दिखाता है। इसका 52 हफ्तों का दायरा 54.98 डॉलर से लेकर 119.48 डॉलर के बीच बना हुआ है।
डब्ल्यूटीआई कच्चा तेल वैश्विक ऊर्जा व्यापार में सबसे महत्वपूर्ण बेंचमार्क्स में से एक माना जाता है, जिसमें ब्रेंट और दुबई क्रूड भी शामिल हैं। अपेक्षाकृत कम घनत्व और सल्फर की बेहद कम मात्रा होने की वजह से डब्ल्यूटीआई को 'लाइट' और 'स्वीट' क्रूड की श्रेणी में रखा जाता है। इस उच्च गुणवत्ता वाले कच्चे तेल को शोधित करना अपेक्षाकृत काफी आसान और किफायती होता है। अमेरिका में उत्पादित होने वाले इस तेल का वितरण कशिंग हब से संचालित होता है, जिसे वैश्विक पाइपलाइन तंत्र का चौराहा माना जाता है। वित्तीय जगत और प्रमुख समाचार मंचों में तेल की कीमतों का आकलन करने के लिए इसी बेंचमार्क के आंकड़ों का प्राथमिक रूप से उपयोग किया जाता है।
मांग, आपूर्ति और भू-राजनीतिक कारक कैसे तय करते हैं भाव
किसी भी वित्तीय परिसंपत्ति की तरह कच्चे तेल के भाव का निर्धारण भी मांग और आपूर्ति के मूलभूत नियमों पर निर्भर करता है। वैश्विक आर्थिक वृद्धि में तेजी ऊर्जा की मांग को बढ़ावा देती है, जिससे कीमतों में मजबूती आती है। इसके विपरीत, कमजोर आर्थिक विकास मांग को सुस्त कर देता है। दूसरी तरफ युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता, प्रतिबंध और आपूर्ति मार्गों में रुकावट सीधे तौर पर उत्पादन और वितरण को बाधित करती हैं। इसके अलावा 12 सदस्य देशों वाले पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक द्वारा उत्पादन को लेकर लिए गए फैसले भी बाजार को गहराई से प्रभावित करते हैं। जब ओपेक देश उत्पादन कोटे में कटौती करते हैं, तो आपूर्ति सीमित होने से कीमतें ऊपर की ओर भागती हैं, जबकि उत्पादन बढ़ाने पर इसके ठीक उलट असर होता है। ओपेक प्लस समूह में रूस जैसे 10 अतिरिक्त गैर-ओपेक देश भी शामिल हैं, जो रणनीतिक आपूर्ति निर्णयों में अहम भूमिका निभाते हैं। अमेरिकी डॉलर के उतार-चढ़ाव का भी तेल की खरीद पर सीधा असर पड़ता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल का व्यापार मुख्यतः डॉलर में ही होता है।
साप्ताहिक भंडार आंकड़े और तकनीकी संकेतक
तेल के बाजार में साप्ताहिक इन्वेंट्री आंकड़ों पर व्यापारियों की पैनी नजर रहती है। अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट यानी एपीआई प्रत्येक मंगलवार को अपने आंकड़े साझा करता है, जबकि एनर्जी इंफॉर्मेशन एजेंसी यानी ईआईए बुधवार को आधिकारिक सरकारी रिपोर्ट जारी करती है। करीब 75 फीसदी मौकों पर इन दोनों के नतीजों में अंतर 1 फीसदी से भी कम रहता है, हालांकि सरकारी एजेंसी होने के कारण ईआईए के आंकड़ों को अधिक विश्वसनीय माना जाता है। इन्वेंट्री में गिरावट मजबूत मांग का संकेत देती है, जिससे भाव चढ़ते हैं, जबकि भंडार बढ़ने से आपूर्ति अधिक होने का संकेत मिलता है और कीमतें गिरती हैं।
क्रूड ऑयल के तकनीकी चार्ट पर नजर डालें तो इसका 14-दिवसीय आरएसआई 52 के स्तर पर न्यूट्रल बना हुआ है। एमएसीडी 4.44 पर है जबकि सिग्नल लाइन 4.36 पर है, जिसका हिस्टोग्राम 0.08 के साथ बुलिश रुख दिखा रहा है। मूविंग एवरेजेज के मोर्चे पर 20-दिवसीय ईएमए 94.76 डॉलर, 50-दिवसीय ईएमए 89.31 डॉलर और 200-दिवसीय ईएमए 79.48 डॉलर पर स्थित है, जिसमें 50-दिवसीय ईएमए का 200-दिवसीय ईएमए से ऊपर होना गोल्डन क्रॉस और लंबी अवधि के अपट्रेंड को पुख्ता करता है। इसके अलावा 20-दिवसीय बोलिंजर बैंड 78.03 डॉलर से 108.37 डॉलर के दायरे में है, जहां वर्तमान कीमत बैंड के भीतर कारोबार कर रही है। पिवट स्तर 95.03 डॉलर है, जिसमें पहला रेजिस्टेंस 96.48 डॉलर और दूसरा रेजिस्टेंस 98.67 डॉलर पर है, जबकि पहला सपोर्ट 92.84 डॉलर और दूसरा सपोर्ट 91.39 डॉलर पर देखा जा रहा है।
विदेशी मुद्रा, सोना और वैश्विक केंद्रीय बैंकों की चाल
भू-राजनीतिक घटनाक्रमों का प्रभाव वैश्विक मुद्रा बाजारों और अन्य परिसंपत्तियों पर भी साफ देखा गया। एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.7100 के स्तर से ऊपर स्थिर बना रहा। पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना द्वारा लोन प्राइम रेट्स को यथावत रखने से ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर दबाव तो रहा, लेकिन रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया द्वारा संभावित ब्याज दर बढ़ोतरी के अनुमानों और आगामी ट्रंप-शी शिखर सम्मेलन से पहले इसे समर्थन मिला। वहीं जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर 157.00 के नीचे फिसल गया, जहां बैंक ऑफ जापान के रेट चेक और संभावित सरकारी हस्तक्षेप के जोखिमों ने व्यापारियों को सतर्क रखा।
सुरक्षित निवेश विकल्प माने जाने वाले सोने ने छह हफ्तों के निचले स्तर से अपनी रिकवरी को थाम लिया, जब 4,400 डॉलर के स्तर पर इसे कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। सोने का 14-दिवसीय आरएसआई न्यूट्रल रुख दर्शा रहा है। दूसरी ओर, डिजिटल परिसंपत्तियों में सोलाना ने पिछले सप्ताह 12 फीसदी की तेजी के बाद अपनी बढ़त को आगे बढ़ाते हुए 111.70 डॉलर से ऊपर कारोबार किया, जिसे टोकनाइज्ड इक्विटी इकोसिस्टम के विस्तार और संस्थागत मांग से समर्थन मिला। इस बीच बैंक ऑफ जापान ने मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने के क्रम में अपनी अल्पकालिक ब्याज दर के लक्ष्य को 7-2 के बहुमत से 1.00 फीसदी से बढ़ाकर 1.25 फीसदी कर दिया।


















