मेघालय की खासी-जयंतिया हिल्स में शुक्रवार को यूनिटेरियन आंदोलन की 139वीं वर्षगांठ पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई। इस अवसर पर क्षेत्र भर में अनुयायी एकत्रित हुए और विशेष प्रार्थना सभाओं के साथ कई सामुदायिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। यह वार्षिक आयोजन पूर्वोत्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक विविधता का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
1887 में जोवाई से हुई थी आंदोलन की शुरुआत
इस महत्वपूर्ण दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 18 सितंबर 1887 से जुड़ी हुई है, जब इस स्वदेशी यूनिटेरियन आंदोलन की नींव रखी गई थी। आंदोलन के संस्थापक माने जाने वाले हाजोम किसोर सिंह ने जोवाई स्थित अपने आवास पर पहली बार यूनिटेरियन प्रार्थना सभा का आयोजन किया था। उस ऐतिहासिक दिन के बाद से इस परंपरा ने स्थानीय समाज में एक गहरी और विशिष्ट पहचान स्थापित की है।
समय बीतने के साथ 'का नियाम यूनिटेरियन' ने अपनी अलग धार्मिक पहचान को सुदृढ़ किया है। इस आध्यात्मिक धारा की सबसे बड़ी खूबी यह रही है कि इसने खासी और जयंतिया संस्कृति, स्थानीय परंपराओं और सामुदायिक जीवन मूल्यों के साथ अपना गहरा संबंध लगातार बनाए रखा है। यह विश्वास स्थानीय रीति-रिवाजों और आधुनिक आध्यात्मिक सोच का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।
शांति और सामाजिक जिम्मेदारी के संकल्प
इस 139वीं वर्षगांठ के दौरान आयोजित धार्मिक सभाओं में समुदाय के सदस्यों ने अपने इतिहास पर विचार-विमर्श किया। इन बैठकों में आधुनिक समाज के संदर्भ में इस विश्वास की निरंतर प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया। पूरे आयोजन के केंद्र में आध्यात्मिकता, सामाजिक जिम्मेदारी, सामुदायिक सेवा और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसे आधारभूत मानवीय मूल्य रहे, जिन पर विशेष जोर दिया गया।
मुख्यमंत्री कॉनराड के संगमा ने इस पावन अवसर पर यूनिटेरियन समुदाय को हार्दिक शुभकामनाएं दीं। X पर लिखा अपने संदेश में उन्होंने कहा, “139वें यूनिटेरियन दिवस पर हम एक अनूठी आध्यात्मिक परंपरा का सम्मान करते हैं जिसकी जड़ें खासी क्षेत्र में बेहद गहरी हैं।” उन्होंने पूरे समुदाय के लिए विश्वास, शांति और आत्मचिंतन से भरे दिन की कामना की।
नई पीढ़ी तक परंपराएं पहुंचाने का अवसर
यूनिटेरियन वर्षगांठ दिवस अनुयायियों के लिए अपने पूर्वजों के योगदान को याद करने का भी एक अहम जरिया है। इस दिन समुदाय के लोग आंदोलन के विकास में पिछली पीढ़ियों की भूमिका को नमन करते हैं और इसके मूल सिद्धांतों के प्रति अपनी निष्ठा दोहराते हैं।
इसके साथ ही यह वार्षिक उत्सव युवा पीढ़ी को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत सौंपने का एक सशक्त माध्यम बनता है। इससे मेघालय के विविधतापूर्ण सामाजिक ताने-बाने और सांस्कृतिक परिवेश में इस आंदोलन की स्थिति और अधिक मजबूत होती है।



















