मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के संगमा ने स्वास्थ्य विभाग को राज्य भर में मौजूद प्राथमिक चिकित्सकीय चुनौतियों की बारीकी से पहचान करने और उनके स्थायी समाधान के लिए एक सुनियोजित एवं केंद्रित कार्यप्रणाली अपनाने का स्पष्ट आह्वान किया है। शिलांग में आयोजित 'रीथिंकिंग एनीमिया: टुवर्ड्स कॉम्प्रिहेंसिव एनीमिया केयर' सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में केवल ऊपरी लक्षणों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय समस्याओं के मूल कारणों को समझना आवश्यक है। यह आयोजन पिछले वर्ष आयोजित पहले मेघालय हेल्थ समिट की निरंतरता में किया गया था, जिसका उद्देश्य सरकार, निजी चिकित्सालयों, नागरिक संगठनों और आम नागरिकों को एक साझा मंच पर लाकर समन्वित प्रयास शुरू करना था।
सम्मेलन में अपनी बात रखते हुए मुख्यमंत्री ने रेखांकित किया कि स्वास्थ्य विभाग को हर साल या संभव हो तो प्रत्येक छह महीने में एक विशेष स्वास्थ्य मुद्दे अथवा गंभीर चिंता का चयन करना चाहिए। विभाग को उस चयनित विषय पर कम से कम छह महीने तक निरंतर अभियान चलाना चाहिए, ताकि जनसामान्य में उस समस्या के प्रति पूरी तरह जागरूकता पैदा की जा सके। जब तक किसी विशिष्ट विषय पर लगातार केंद्रित होकर काम नहीं किया जाएगा, तब तक व्यापक समाज में व्यवहारिक बदलाव लाना संभव नहीं होगा।
खानपान की आदतें और गैर-संचारी बीमारियों का बढ़ता खतरा
जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की बढ़ती गंभीरता पर प्रकाश डालते हुए मुख्यमंत्री ने तुरा क्रिश्चियन हॉस्पिटल के डॉ बेंजामिन द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार अस्वस्थ आहार, शर्करा और कार्बोहाइड्रेट का अत्यधिक सेवन तथा खराब दिनचर्या लोगों में गुर्दे की विफलता (किडनी फेलियर) जैसी रोकी जा सकने वाली गंभीर बीमारियों को बढ़ा रही है। खानपान की ये गलत आदतें शुरुआती उम्र से ही शुरू हो जाती हैं, जिससे आगे चलकर जीवन संकट में पड़ जाता है।
इस संबंध में उन्होंने सरकार के 1,000-दिवसीय कार्यक्रम का हवाला दिया और एक सामान्य सामाजिक प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की। अक्सर माता-पिता अपने नौ महीने से दो साल के नन्हे बच्चों को बहलाने अथवा खुश रखने के लिए चिप्स और चॉकलेट जैसी अस्वास्थ्यकर चीजें खाने को दे देते हैं। अनजाने में की जाने वाली यह चूक बच्चों के नाजुक स्वास्थ्य पर अत्यंत बुरा प्रभाव डालती है। मुख्यमंत्री ने बल देकर कहा कि ये छोटी-छोटी बातें हैं जिन्हें प्रत्येक नागरिक को समझाना आवश्यक है, और इसके लिए किसी को लगातार जमीनी स्तर पर संवाद स्थापित करना होगा। ऐसे गंभीर विषयों पर परिणाम तभी मिलेंगे जब सभी संबंधित पक्ष एकजुट होकर एक स्पष्ट लक्ष्य की दिशा में मिलकर काम करें।
संसाधनों से परे सोच और संस्थागत साझेदारी
मुख्यमंत्री ने साझा किया कि पिछले 8 वर्षों के दौरान सरकार का सबसे महत्वपूर्ण कदम समान विचारधारा वाले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर साझेदारी स्थापित करना रहा है। स्वास्थ्य सेवा में सुधार केवल वित्तीय बजट बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि इसके लिए नवीन विचारों, विशेषज्ञता और बदलाव लाने के इच्छुक लोगों की सामूहिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है। मेघालय अपने कुल राज्य बजट का 9 प्रतिशत स्वास्थ्य क्षेत्र को आवंटित करता है, जो अपने आप में एक बड़ा हिस्सा है। लेकिन सिर्फ धन खर्च करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मुख्य ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि इन सार्वजनिक निधियों का उपयोग सटीक समय पर सही प्राथमिकताओं को पूरा करने में प्रभावी रूप से किया जाए।
साझेदारी के सफल उदाहरण के रूप में उन्होंने इंटरनेशनल फंड फॉर एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट (आईएफएडी / IFAD) का उल्लेख किया। इस वैश्विक संस्था के पूरे कार्यकारी बोर्ड ने अपने सात दिवसीय भारत दौरे के दौरान तीन पूरे दिन मेघालय में बिताए और राज्य के सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों का प्रत्यक्ष दौरा किया। उन्होंने सम्मेलन में उपस्थित प्रतिभागियों और विशेषज्ञों से आग्रह किया कि वे अपनी चर्चाओं को केवल सम्मेलन कक्षों तक सीमित न रखें, बल्कि उन निर्णयों को गांव-गांव और जमीनी धरातल पर ठोस कार्रवाई में बदलें।
उन्होंने जमीनी स्तर के प्रयासों के महत्व को समझाते हुए कहा कि किसी गांव की एकल मां को जागरूक करना या स्कूली छात्राओं से महत्वपूर्ण विषयों पर संवाद करना भी व्यापक बदलाव ला सकता है। सरकार इसी प्रकार के निरंतर सामुदायिक जुड़ाव और भागीदारी को राज्य के स्वास्थ्य तंत्र का आधार बनाना चाहती है।
पिछली कमियों की समीक्षा और मातृ मृत्यु दर कार्यक्रम का अनुभव
मेघालय के पुराने सामाजिक संकेतकों को स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री ने माना कि टीकाकरण कवरेज, मातृ मृत्यु दर (एमएमआर / MMR) और बच्चों में कुपोषण जनित बौनेपन (स्टंटिंग) के मामलों में राज्य कभी देश के सबसे निचले पायदानों पर था। हालांकि, सरकार ने इन कमजोर आंकड़ों को विफलता के रूप में देखने के बजाय एक बड़ी चुनौती माना, जिसे हर हाल में सुधारा जाना था। सकारात्मक बदलाव लाने के इस अवसर को एक दायित्व और जीवन के उद्देश्य के रूप में स्वीकार किया गया।
वर्ष 2019 में शुरू किए गए मातृ मृत्यु दर न्यूनीकरण कार्यक्रम की पृष्ठभूमि साझा करते हुए उन्होंने बताया कि तत्कालीन अंपाती उपायुक्त रामकुमार एस को सबसे पहले प्रत्येक गर्भवती महिला का जीवन बचाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। शुरुआत में इस कार्यक्रम ने मुख्य रूप से संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने और जागरूकता फैलाने पर अपना ध्यान केंद्रित किया था, लेकिन इसके अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ रहे थे।
गहन समीक्षा के बाद सरकार को यह समझ आया कि समस्या गर्भवती महिलाओं द्वारा अस्पताल न जाने की अनिच्छा नहीं थी, बल्कि वास्तविक बाधा स्वास्थ्य सुविधाओं की अनुपलब्धता थी। कई गांव ऐसे दुर्गम स्थानों पर थे जहां से नजदीकी अस्पताल पहुंचने में ही दो से तीन घंटे का कठिन सफर तय करना पड़ता था। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी समस्या के केवल बाहरी स्वरूप को देखने के बजाय उसकी आंतरिक और जमीनी वजहों की पहचान करना अनिवार्य है। बिना सटीक विश्लेषण के समाधान लागू करने से बचना चाहिए, क्योंकि समस्या को व्यवस्थित ढंग से समझना और उसके मूल कारणों को खोजना ही समाधान के 80 प्रतिशत कार्य को पूरा कर देता है।
एनीमिया नियंत्रण की कार्ययोजना और स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार
मुख्यमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि एनीमिया महिलाओं में मातृ मृत्यु दर, बच्चों के जन्म के समय कम वजन, बौनेपन और मानसिक तथा शारीरिक विकास में रुकावट का एक बहुत बड़ा कारक है। इस चुनौती से निपटने के लिए राज्य सरकार एनीमिया के समग्र प्रबंधन पर केंद्रित कार्ययोजना लागू करेगी। इस रणनीति में व्यापक जांच, त्वरित उपचार, पोषण संबंधी हस्तक्षेप और नियमित निगरानी शामिल है, जिसमें विशेष प्राथमिकता किशोरियों और गर्भवती महिलाओं को दी जाएगी।
राज्य सरकार द्वारा लगातार किए गए प्रयासों और सुनियोजित पहलों के कारण मेघालय के प्रमुख स्वास्थ्य संकेतकों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। राज्य में दर्ज मातृ मृत्यु का आंकड़ा वर्ष 2021-22 के 228 से घटकर वर्ष 2025-26 में 106 पर आ गया है। इसके साथ ही, अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में होने वाले संस्थागत प्रसव की दर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस / NFHS) 5 के 58.1 प्रतिशत से बढ़कर NFHS-6 में 65.6 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बच्चों में स्टंटिंग की दर भी 46.5 प्रतिशत से गिरकर 36.8 प्रतिशत रह गई है, जबकि राज्य की कुल प्रजनन दर (टीएफआर / TFR) 2.9 से सुधरकर 2.2 दर्ज की गई है।


















