आंध्र प्रदेश के अन्नामय्या जिले में तेलंगाना की सीमा से सटे तंबल्लापल्ली मंडल का एक पुराना पहाड़ी गांव अब पूरी तरह वीरान हो गया है. गट्टूमीदपल्ली नाम के इस गांव में बचा हुआ आखिरी परिवार भी हाल ही में नीचे मैदानी इलाके में जाकर बस गया, जिसके बाद यह गांव आधिकारिक तौर पर उन बस्तियों की सूची में दर्ज हो गया है जिन्हें 'घोस्ट विलेज' यानी पूरी तरह इंसानों से खाली गांव कहा जाता है.
कभी यहां गूंजती थी त्योहारों की धूम
कोसुवारीपल्ली के पास एक ऊंची पहाड़ी पर बसा गट्टूमीदपल्ली दशकों पहले तक पूरी तरह जीवंत बस्ती थी. यहां त्योहारों के मौके पर पूरा गांव उत्सव में डूबा रहता था, खेतों में काम करते किसानों की आवाज़ें गूंजती थीं और गलियों में बच्चों की किलकारियां सुनाई देती थीं. पहाड़ी की पथरीली ढलानों पर एक के बाद एक कतार में बने पक्के मकान और मिट्टी से बने पुराने घर आज भी उस दौर की गवाही देते हैं, जब यहां एक आत्मनिर्भर समाज बसता था. लेकिन अब वहां सिर्फ सुनी पड़ी सड़कें, टूटती-ढहती दीवारें और ताला लगे दरवाजे ही नज़र आते हैं.
पानी की किल्लत ने तोड़ दी खेती की कमर
गांव के निवासी राजेन्द्र साहू के मुताबिक, गट्टूमीदपल्ली के खाली होने के पीछे सबसे बड़ी वजह पानी की भारी किल्लत रही. पहाड़ी इलाके में बसे होने के कारण यहां पीने के पानी और खेतों की सिंचाई के लिए पानी मिलना मुश्किल हो गया था. इसका सीधा असर गांव की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली पारंपरिक खेती पर पड़ा, जो धीरे-धीरे ठप हो गई. पानी के बिना खेतों में उत्पादन गिरता गया और परिवारों के लिए यहां टिके रहना मुश्किल होता चला गया.
सड़क तक नहीं पहुंची, स्कूल-अस्पताल के लिए मीलों का सफर
आज के दौर में भी इस गांव तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं बनाई जा सकी. नतीजा यह हुआ कि स्कूल जाने, अस्पताल पहुंचने या रोज़मर्रा के सामान के लिए बाज़ार तक जाने के लिए ग्रामीणों को हर दिन पथरीले और दुर्गम रास्तों पर मीलों पैदल चलना पड़ता था. यही मुश्किलें आगे चलकर पूरे गांव को खाली करने की वजह बन गईं.
जवान पीढ़ी शहरों की ओर, बुजुर्ग नीचे की बस्तियों में
बुनियादी सुविधाओं की इस लंबी कमी से थककर गांव के परिवारों ने धीरे-धीरे यहां से पलायन शुरू कर दिया. रोज़गार और पढ़ाई की तलाश में युवा पीढ़ी शहरों का रुख कर गई, जबकि बाकी बचे लोग बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए नीचे के गांवों में जा बसे. इस तरह एक-एक कर घर खाली होते चले गए, जब तक कि आखिरी परिवार भी नीचे नहीं उतर गया.
सिर्फ जमीन नहीं, यादों का भी अंत
गट्टूमीदपल्ली का इस तरह पूरी तरह वीरान हो जाना केवल एक भौगोलिक स्थान के खाली होने की कहानी नहीं है. यह उस पूरे इतिहास और उन यादों के हमेशा के लिए ठहर जाने की कहानी है, जो यहां पीढ़ियों से बसी थीं. यह घटना ग्रामीण भारत में बुनियादी विकास की कमी और उससे होने वाले पलायन पर एक गंभीर सवाल भी खड़ा करती है.



















