बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की दिसंबर के महीने में स्वदेश वापसी की संभावनाओं ने पड़ोसी मुल्क की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है। ब्लिट्ज के संपादक शोएब चौधरी ने एक विशेष बातचीत के दौरान दावा किया है कि यदि शेख हसीना वापस ढाका की सरजमीं पर कदम रखती हैं, तो वहां एक बहुत बड़ा राजनीतिक परिवर्तन देखने को मिल सकता है। उन्होंने 5 अगस्त 2024 को हुए सत्ता परिवर्तन के बाद से बांग्लादेश के भीतर उभरे आर्थिक संकट, सामाजिक असुरक्षा और लोकतांत्रिक ढांचे में आई गिरावट पर विस्तार से अपनी राय रखी।
5 अगस्त 2024 के बाद बांग्लादेश की बदली हुई जमीनी हकीकत
साल 2009 से लेकर 2024 के शुरुआती महीनों तक बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था लगातार तेजी से आगे बढ़ रही थी। उस दौर में वैश्विक मंच पर बांग्लादेश को एक उभरते हुए आर्थिक सितारे के रूप में पहचाना जाने लगा था। शोएब चौधरी के अनुसार, उस विकास काल के दौरान बांग्लादेश की GDP वृद्धि दर एक वक्त ऐसी ऊंचाई पर पहुंच गई थी कि उसने भारत की विकास दर को भी पीछे छोड़ दिया था।
हालांकि, 5 अगस्त 2024 की घटनाओं के बाद मुल्क की दिशा पूरी तरह बदल गई। उनका तर्क है कि इसके बाद देश को जानबूझकर पीछे धकेलने की कोशिशें हुईं, जिसके सीधे परिणाम के रूप में राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को भारी आघात पहुंचा। सामाजिक ढांचे में आई विकृति की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सामान्य लोगों के हाथों में हथियार और धारदार चाकू थमा दिए गए। जो युवा कल तक शिक्षा हासिल कर रहे थे, उन्हें हिंसा और अपराध के रास्ते पर धकेल दिया गया। मौजूदा समय में बांग्लादेश के अंदर सरेआम जबरन वसूली, छिनैती, चोरी, डकैती और कत्ल जैसी संगीन वारदातों में अप्रत्याशित उछाल देखा जा रहा है।
करीब एक करोड़ लोगों की आजीविका पर संकट और महंगाई की मार
शोएब चौधरी ने रेखांकित किया कि पिछले वर्षों में जब आर्थिक प्रगति हो रही थी, तब बड़े पैमाने पर युवाओं और नागरिकों के लिए रोजगार के नए अवसर बन रहे थे। इसके विपरीत मौजूदा हालात में रोजगार सृजन पूरी तरह ठप हो चुका है। उनका दावा है कि इस राजनीतिक उथल-पुथल और अस्थिरता की वजह से बांग्लादेश में लगभग एक करोड़ लोग बेरोजगार हो चुके हैं।
बेरोजगारी के इस विकराल संकट के साथ-साथ आम जनता महंगाई और आसमान छूते बिजली बिलों के बोझ तले दब चुकी है। उन्होंने बताया कि विगत दो वर्षों में रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं के दाम बेतहाशा बढ़े हैं और बिजली आपूर्ति का खर्च आम परिवारों के बजट से बाहर हो गया है। अपने पारिवारिक बजट का प्रत्यक्ष उदाहरण साझा करते हुए उन्होंने बताया कि जिस घर का मासिक खर्च पहले करीब 30 हजार टका आता था, आज उसी परिवार का घरेलू खर्च बढ़कर 75 हजार टका प्रति माह तक पहुंच गया है।
ईंधन की दरों में भारी उछाल और पाकिस्तान जैसी बदहाली की तुलना
ईंधन बाजार का हाल भी बेहद खस्ता है। पिछले सात महीनों के भीतर पेट्रोलियम की कीमतों में प्रति लीटर लगभग 45 टका की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। अभी के समय में बांग्लादेश के भीतर एक लीटर पेट्रोल की कीमत लगभग 160 टका पर पहुंच चुकी है, जो भारतीय मुद्रा के हिसाब से करीब 124.94 रुपये बैठती है।
इस कमरतोड़ महंगाई, काम-धंधों के खात्मे और बेरोजगारी के कारण कामकाजी वर्ग, मध्यम वर्ग, छोटे कारोबारी और वेतनभोगी तबके का जीना मुहाल हो गया है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि किसी भी आम नागरिक को यह भरोसा नहीं रह गया है कि सुबह काम के सिलसिले में घर से निकलने के बाद वह शाम को सकुशल वापस लौटेगा या नहीं। बांग्लादेश के इन बदतर आंतरिक हालात की तुलना उन्होंने पाकिस्तान की मौजूदा बदहाली और असुरक्षा से की। उनका मानना है कि जनता के भीतर इसी असुरक्षा और आर्थिक तंगी के चलते गहरा गुस्सा पनप रहा है, जिससे वे लोग भी अब शेख हसीना की वापसी की मांग करने लगे हैं जो पहले उनके खिलाफ नारे लगाते थे।
वापसी के दिन सड़कों पर तूफानी जनसैलाब का अनुमान
शेख हसीना की वतन वापसी के संभावित पहले दिन के परिदृश्य पर चर्चा करते हुए शोएब चौधरी ने कहा कि वह दिन पूरे बांग्लादेश के लिए किसी भारी राजनीतिक तूफान जैसा साबित होगा। उनका मानना है कि पूर्व प्रधानमंत्री के बांग्लादेश की धरती पर पैर रखते ही लाखों-करोड़ों समर्थकों का हुजूम सड़कों पर उमड़ पड़ेगा।
उन्होंने सांख्यिकीय समीकरण रखते हुए कहा कि देश की 18 करोड़ की कुल आबादी में से कम से कम 40 प्रतिशत जनता आज भी शेख हसीना की निष्ठावान समर्थक है। अगर इस 40 प्रतिशत आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपने घरों से निकलकर सड़कों पर उतर आता है, तो मुल्क में एक अप्रत्याशित शक्ति संतुलन बन जाएगा। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह दावा भी किया कि उस अभूतपूर्व जनज्वार के सामने शेख हसीना को गिरफ्तार करने या उनके विरुद्ध कोई कठोर दंडात्मक कार्रवाई करने का माद्दा न तो किसी मौजूदा सरकार में होगा और न ही जमात के संगठनों में रहेगा।
पाकिस्तान का रुख, रूपपुर परमाणु संयंत्र और अमेरिका का नजरिया
क्षेत्रीय राजनीति और बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप पर बोलते हुए शोएब चौधरी ने पाकिस्तान और अमेरिका के संदर्भ में कई गंभीर बिंदु उठाए। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की मौजूदा अस्थिर स्थिति के पीछे पाकिस्तान की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। उन्होंने रूपपुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र का अहम उदाहरण दिया, जिसे रूस की मदद से तैयार किया जा रहा है। पाकिस्तान ने इस न्यूक्लियर पावर प्लांट के लिए अत्यंत आवश्यक यूरेनियम ले जा रहे विमान को अपने हवाई क्षेत्र से गुजरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। इसके अलावा उनका दावा है कि इस्लामाबाद बांग्लादेश में BNP के पक्ष में नहीं है, बल्कि वह जमात-ए-इस्लामी के प्रभाव को सत्ता में देखना चाहता है।
वहीं अमेरिका के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन को भी अब इस बात का बखूबी अहसास हो चुका है कि भारत की मजबूत मौजूदगी और प्रभाव के रहते बांग्लादेश के मामले में एकतरफा हस्तक्षेप करना कतई संभव नहीं है।
कूटनीतिक संतुलन में भारत का प्रभाव और भविष्य का नेतृत्व
शोएब चौधरी का मानना है कि शेख हसीना के समर्थन में भारत की स्थिति बेहद सुदृढ़ है और बांग्लादेश के भविष्य के निर्धारण में नई दिल्ली की भूमिका निर्णायक रहेगी। उन्होंने हालिया BRICS शिखर सम्मेलन का उल्लेख करते हुए बताया कि भारत ने इस वैश्विक मंच पर अपनी कूटनीतिक धमक मजबूती से दर्ज कराई है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जैसे शीर्ष वैश्विक नेताओं की मौजूदगी के बीच भारत ने अपने रुख को बिल्कुल स्पष्ट रखा। पूरी दुनिया अब भारत की विदेश नीति की परिपक्वता को समझ रही है, क्योंकि भारत शांति और रणनीतिक धैर्य के साथ अपने हितों पर आगे बढ़ता है।
उन्होंने विश्वास जताया कि मौजूदा संकटग्रस्त दौर से बांग्लादेश को बाहर निकालने में भारत ही सबसे महत्वपूर्ण मददगार साबित हो सकता है। जब देश में स्थिरता बहाल होगी, तब शेख हसीना दोबारा व्यवस्था को पटरी पर लाने की जिम्मेदारी संभालेंगी। उत्तराधिकार के सवाल पर जब यह पूछा गया कि शेख हसीना के बाद उनके बेटे सजीब वाजेद जॉय या उनकी बेटी साइमा वाजेद में से किसे नेतृत्व की कमान संभालनी चाहिए, तो शोएब चौधरी ने अपनी निजी राय रखते हुए कहा कि साइमा वाजेद इस भूमिका के लिए अधिक उपयुक्त हैं। उनके अनुसार, साइमा वाजेद बेहद सक्षम हैं, उनका आचरण और व्यक्तित्व पूरी तरह पारंपरिक बंगाली संस्कृति से जुड़ा हुआ है और वे स्थानीय भाषा व जनमानस को गहराई से समझती हैं।



















