मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक का विरोध प्रदर्शन लगातार तीसरे दिन भी देखने को मिला. संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पिछले कई महीनों से निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं और उन पर वोट चोरी के गंभीर आरोप लगा रहे हैं. उनके निशाने पर विशेष रूप से मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर कार्यक्रम रहा है. उनका आरोप है कि आयोग भारतीय जनता पार्टी के चुनावी लाभ के लिए मतदाता सूचियों में हेरफेर कर रहा है. यहां तक कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उनके इस्तीफे की मांग भी की गई है और पूरा विपक्षी खेमा इस मांग के समर्थन में खड़ा दिख रहा है. हालांकि, यदि इन आरोपों की पृष्ठभूमि में चुनावी आंकड़ों, संस्थागत फैसलों और प्रशासनिक नियमों का गहनता से विश्लेषण किया जाए, तो जमीनी हकीकत इन सियासी दावों से काफी अलग नजर आती है.
चुनावी नतीजे और सीटों का गणित
विपक्ष की ओर से पेश किए जा रहे मुख्य तर्क का केंद्र यह दावा है कि एसआईआर और आयोग के प्रशासनिक फैसलों से सीधे तौर पर भाजपा को चुनावी लाभ पहुंचाया जा रहा है और दोनों की कथित साठगांठ से विपक्षी दलों को नुकसान उठाना पड़ रहा है. इस दावे की जांच के लिए सबसे पहले 2024 के आम चुनाव के आंकड़ों को देखना जरूरी है. तथ्य यह है कि वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव ज्ञानेश कुमार के मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनने से पहले ही संपन्न हो चुका था. वे मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त के रूप में आयोग में शामिल हुए थे, जबकि उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी फरवरी 2025 में मिली. यदि चुनाव नतीजों पर नजर डालें, तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें 2019 के 303 के आंकड़े से घटकर 240 पर सिमट गईं. पार्टी की चुनावी जीत का सफर 2014 से चला आ रहा है, जब ज्ञानेश कुमार आयोग के शीर्ष पद पर नहीं थे. वर्ष 2014 में भाजपा ने अपने दम पर 282 सीटें हासिल की थीं, जो 2019 में बढ़कर 303 हो गई थीं.
यदि निर्वाचन आयोग किसी सुनियोजित योजना के तहत सत्ताधारी दल का पक्ष ले रहा होता, तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अकेले दम पर पूर्ण बहुमत जुटाने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता और न ही उसकी सीटों में 63 सीटों की भारी गिरावट दर्ज होती. इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम भी किसी एक दल के पक्ष में एकतरफा नहीं रहे हैं, बल्कि वहां मिले-जुले नतीजे देखने को मिले हैं. कई राज्यों में भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा अथवा उसकी सीटों में कमी आई. निर्वाचन प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान मतदाताओं के नाम जुड़ने और हटने की प्रक्रिया किसी एक पार्टी के प्रभाव वाले क्षेत्रों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सभी राजनीतिक दलों के क्षेत्रों में एक समान प्रशासनिक मानदंडों के आधार पर हुई. आयोग का स्पष्ट कहना है कि दोहरी प्रविष्टियों, दिवंगत व्यक्तियों और स्थान परिवर्तन कर चुके मतदाताओं के नाम हटाना एक सामान्य और नियमित प्रशासनिक अभ्यास है. किसी ठोस दस्तावेजी प्रमाण के बिना इस प्रशासनिक कवायद को चुनावी हेरफेर बताना तथ्यों से मेल नहीं खाता.
एसआईआर प्रक्रिया और नाम हटाने के नियम
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान ड्राफ्ट सूची से करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाए जाने को विपक्ष मताधिकार छीनने की एक बड़ी साजिश बता रहा है. इसके विपरीत निर्वाचन आयोग की ओर से इस मामले में स्पष्टीकरण दिया गया है कि एसआईआर का प्राथमिक लक्ष्य पुरानी विसंगतियों, फर्जी एंट्री और गलत आंकड़ों को दुरुस्त करना है. आयोग के अनुसार, जिन नामों को हटाया गया, वे या तो मृत व्यक्तियों के थे, या फिर वे लोग स्थायी रूप से किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित हो चुके थे अथवा उनके नाम एक से अधिक जगहों पर दर्ज थे. निर्वाचन नियमों के तहत किसी भी मतदाता का नाम काटे जाने के बाद दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का एक निर्धारित कानूनी प्रावधान मौजूद है. इस प्रक्रिया के तहत कई राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे नाम पुनः बहाल भी किए गए, जहां प्रक्रियागत त्रुटियां पाई गई थीं.
आयोग ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि वैधानिक नियमों के अनुसार किसी भी मतदाता का नाम बिना औपचारिक सुनवाई और सत्यापन के नहीं हटाया जा सकता. जहां कहीं स्थानीय स्तर पर गलतियों की शिकायतें आईं, वहां उन्हें तत्काल सुधारने के प्रशासनिक निर्देश जारी किए गए. आयोग के भीतर प्रशासनिक स्तर पर आंतरिक असहमति की चर्चाएं भले ही सामने आई हों, लेकिन आयोग का औपचारिक पक्ष यही रहा है कि सभी अंतिम निर्णय सामूहिक प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं. केवल हटाए गए नामों की कुल संख्या के आधार पर इसे वोट चोरी का नाम नहीं दिया जा सकता, जब तक कि यह सिद्ध न किया जाए कि किसी दल विशेष के मतदाताओं को सुनियोजित तरीके से बाहर किया गया है.
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और समयसीमा
विपक्षी दलों की ओर से ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी निरंतर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. वे 2023 में पारित नए कानून के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनने वाले पहले अधिकारी हैं. इस नए कानून के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष शामिल होते हैं. नियुक्ति पर विवाद के बीच सबसे महत्वपूर्ण पहलू समयसीमा का है. वर्ष 2014, 2019 और 2024 के तीनों बड़े आम चुनाव ज्ञानेश कुमार के मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनने से पहले ही संपन्न हो चुके थे. यहां तक कि 2024 का आम चुनाव राजीव कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त रहते पूरा हुआ था. ऐसे में यह आरोप लगाना कि केंद्र में सत्ताधारी दल की चुनावी जीत ज्ञानेश कुमार की वजह से हो रही है, तार्किक और तथ्यात्मक रूप से सही नहीं ठहरता.
ज्ञानेश कुमार चुनाव आयुक्त के तौर पर उस चुनावी प्रक्रिया की व्यवस्था का हिस्सा अवश्य थे, लेकिन मुख्य कार्यकारी जिम्मेदारी उनके फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद ही शुरू हुई. हालांकि चयन प्रक्रिया के नए कानून को लेकर कानूनी बहस देश की शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है, परंतु चुनावी नतीजों को पूर्वव्यापी प्रभाव से उनकी नियुक्ति से जोड़ना ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है.
ईवीएम, अदालती चुनौतियां और राज्यों की तस्वीर
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने यह दावा भी किया कि 2024 के संसदीय चुनाव और उसके बाद हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनाव धांधली के सहारे जीते गए थे. चुनाव आयोग ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें पूरी तरह निराधार करार दिया है. आयोग की व्यवस्था के अनुसार कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक या ऑनलाइन तरीके से किसी अन्य नागरिक का नाम मतदाता सूची से सीधे नहीं कटवा सकता, क्योंकि इसके लिए व्यक्तिगत सुनवाई और भौतिक सत्यापन अनिवार्य है. जहां कहीं अनियमितता या गड़बड़ी की वास्तविक शिकायतें सामने आईं, जैसे कि कर्नाटक के आलंद क्षेत्र का मामला, वहां आयोग ने स्वयं संज्ञान लेते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई.
यदि जमीनी स्तर पर बड़े पैमाने पर चुनावी बेईमानी हुई होती, तो चुनावी कानून के अनुसार विपक्षी दलों को संबंधित उच्च न्यायालयों में चुनाव याचिकाएं दाखिल करनी चाहिए थीं. हकीकत यह है कि 2024 के चुनावों के बाद अधिकतर निर्वाचन क्षेत्रों में ऐसी औपचारिक चुनाव याचिकाएं न के बराबर दर्ज कराई गईं. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर भी बार-बार संदेह जताया गया, लेकिन देश की विभिन्न अदालतों ने किसी भी व्यवस्थित हेरफेर के आरोपों को स्वीकार नहीं किया और न ही कोई साक्ष्य पाया. इसके अलावा यदि चुनावी तंत्र में पक्षपात होता, तो गैर-भाजपा दल केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में सरकारें बनाने में सफल नहीं होते, जहां हाल के वर्षों में विपक्ष को स्पष्ट जनादेश मिला है.
शिकायतों के निपटारे और संवाद का सवाल
विपक्षी गठबंधन का एक प्रमुख आरोप यह भी रहा है कि निर्वाचन आयोग उनकी शिकायतों और ज्ञापनों पर गंभीरता से ध्यान नहीं देता. संसद परिसर में शुरू हुए आंदोलन के पहले ही दिन राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सांसदों के प्रतिनिधिमंडल को आयोग ने मुलाकात का अवसर नहीं दिया. इस पर आयोग की कार्यप्रणाली यह दर्शाती है कि वह सभी पंजीकृत राजनीतिक दलों की लिखित शिकायतों को दर्ज करता है और उनका औपचारिक जवाब देता है. इन ताजा आरोपों के बाद आयोग ने आधिकारिक वक्तव्य जारी करते हुए स्पष्ट किया था कि नेता प्रतिपक्ष के नेतृत्व में सांसदों का एक समूह मिलना चाहता है, इसकी सूचना आयोग को पहले से सीधे तौर पर नहीं दी गई थी बल्कि यह जानकारी पुलिस के माध्यम से प्राप्त हुई थी. आयोग के अनुसार विपक्षी नेताओं द्वारा नियमानुसार पूर्व समय मांगे बिना इस प्रकार के आरोप लगाना प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है.























