भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक लंबा दौर ऐसा रहा जब प्रादेशिक राजनीतिक संगठनों ने केंद्र और राज्यों के सत्ता समीकरण तय करने में निर्णायक भूमिका निभाई। क्षेत्रीय पहचान, स्थानीय अस्मिता और प्रांतीय प्राथमिकताओं के बूते खड़े हुए ये दल अक्सर राष्ट्रीय ताकतों के सीधे विकल्प बनकर उभरे, जिसके चलते बड़े राष्ट्रीय दलों को भी केंद्र में सरकार बनाने या चलाने के लिए उन पर निर्भर रहना पड़ा। हालांकि, हालिया वर्षों का राजनीतिक घटनाक्रम एक अलग दिशा की ओर संकेत कर रहा है। प्रादेशिक ताकतों के भीतर लगातार उभरती आंतरिक कलह, विधायकों की बगावत और संगठनात्मक विभाजनों ने इन दलों के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। महाराष्ट्र में बालासाहेब ठाकरे द्वारा खड़ी की गई शिवसेना और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में दरार के बाद अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर हुए अभूतपूर्व बिखराव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रांतीय स्तर के दिग्गजों की पकड़ अब पहले जैसी अभेद्य नहीं रही।
इन संगठनात्मक विघटनों की पड़ताल करने पर एक साझा राजनीतिक पहलू सामने आता है, जहां विरोधी खेमे की आपसी खींचतान का अंतिम और सबसे बड़ा लाभ भारतीय जनता पार्टी की संगठनात्मक मजबूती के रूप में दिखाई देता है। जब भी किसी मजबूत प्रादेशिक पार्टी के भीतर असंतोष पनपता है और उसका एक बड़ा हिस्सा अलग राह चुनता है, तो बिखरे हुए विपक्ष की तुलना में सत्ता पक्ष का दबदबा स्वतः बढ़ जाता है। महाराष्ट्र की राजनीति में यह समीकरण बेहद सीधे तरीके से देखने को मिला, जहां मूल संगठनों से अलग हुए खेमों को न केवल सत्ता में भागीदारी मिली बल्कि सरकार की धुरी बनने का अवसर भी प्राप्त हुआ। इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल की जमीन पर बगावत की बिसात कुछ अलग तरीके से उलझ गई, जिससे संकेत मिलता है कि हर राज्य में विभाजन का परिणाम एक जैसा नहीं होता।
महाराष्ट्र में सत्ता समीकरणों को बदलने वाली दो बड़ी बगावतें
महाराष्ट्र के राजनीतिक परिदृश्य में दशकों तक शिवसेना का नाम प्रादेशिक स्वाभिमान का पर्याय बना रहा। वर्ष 2022 में पार्टी के भीतर तब एक बड़ा भूचाल आया जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधायकों के एक बड़े समूह ने तत्कालीन नेतृत्व के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया। इस बगावत के बाद शिंदे गुट ने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार का गठन किया और एकनाथ शिंदे राज्य के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे। इस सियासी जंग में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) को दोहरा झटका झेलना पड़ा, क्योंकि उन्हें न सिर्फ सत्ता गंवानी पड़ी बल्कि निर्वाचन आयोग के फैसले के तहत पार्टी का मूल नाम और तीर-कमान का पारंपरिक चुनाव चिह्न भी उनके हाथ से निकल गया। आयोग ने शिंदे गुट को ही विधिवत मूल शिवसेना की मान्यता दी, जिससे राज्य का राजनीतिक संतुलन पूरी तरह बदल गया और एक क्षेत्रीय दल की पूरी संगठनात्मक विरासत नए सत्ता गठजोड़ का हिस्सा बन गई।
शिवसेना में हुए इस बड़े फेरबदल के कुछ ही समय बाद शरद पवार द्वारा स्थापित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी इसी राह पर चलती दिखाई दी। शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने अपने समर्थक विधायकों के साथ मिलकर बगावती रुख अख्तियार किया और राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा-शिवसेना सरकार में शामिल हो गए। इस कदम के एवज में अजित पवार को उप मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। बाद में निर्वाचन आयोग ने संख्या बल के आधार पर अजित पवार खेमे को ही वास्तविक एनसीपी करार देते हुए पार्टी का नाम और घड़ी का चुनाव निशान सौंप दिया। इस निर्णय के चलते संगठन के संस्थापक शरद पवार को एक नए नाम और नई पहचान के सहारे चुनावी मैदान में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा। अजित पवार के निधन के बाद भी उप मुख्यमंत्री की इस कुर्सी पर उनके ही परिवार के सदस्य को बनाए रखा गया। हालांकि, इन दोनों बड़े प्रादेशिक दलों के दोफाड़ होने का सीधा असर यह हुआ कि राज्य में समूचा विपक्ष बिखर गया और सत्तारूढ़ गठबंधन ने अपनी सियासी जमीन बेहद मजबूत कर ली।
पश्चिम बंगाल में टीएमसी के विभाजन से दोनों खेमों को आघात
पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी वर्ष 2026 के विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद ऐसी ही उथल-पुथल देखने को मिली। तृणमूल कांग्रेस की चुनावी शिकस्त के उपरांत पार्टी में एक ऐतिहासिक आंतरिक दरार सामने आई, जब ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में लगभग 58 से 60 विधायकों ने संगठनात्मक नेतृत्व के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी। विधानसभा में संख्या बल की स्थिति को देखते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत गुट को सदन में नेता प्रतिपक्ष की आधिकारिक मान्यता प्रदान कर दी। इसके बाद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के खेमे तथा ऋतब्रत बनर्जी व अरूप राय के विद्रोही गुट के बीच पार्टी की असली पहचान, कानूनी हैसियत और चुनावी प्रतीक को लेकर तीखा टकराव शुरू हो गया।
विवाद जब चुनाव आयोग की चौखट पर पहुंचा, तो सितंबर 2026 में आयोग ने एक अंतरिम निर्देश जारी करते हुए तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक नाम और उसका ऐतिहासिक 'घास-फूल' चुनाव चिह्न दोनों जब्त यानी फ्रीज कर दिए। अंतरिम व्यवस्था के तहत ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले समूह को 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'फुटबॉल प्लेयर' का चुनाव निशान आवंटित किया गया। वहीं दूसरी ओर, ऋतब्रत बनर्जी के विद्रोही खेमे को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' का नया नाम और 'लिफाफा' चुनाव चिह्न दिया गया। महाराष्ट्र के उलट, जहां अलग हुए धड़े को सीधे सत्ता और मूल पार्टी का ठप्पा मिला, बंगाल में दोनों ही खेमों को नुकसान उठाना पड़ा। राज्य में भारतीय जनता पार्टी पहले से ही मजबूत संगठनात्मक स्थिति में खड़ी थी, इसलिए अलग हुए गुट को तत्काल कोई ठोस सत्ता सुख नहीं मिला। हालांकि बागी सांसदों ने एनसीपीआई के माध्यम से भाजपा के सहयोगी के रूप में खुद को स्थापित करने की कोशिश की, मगर उन्हें अब तक कोई ठोस राजनीतिक लाभ हासिल नहीं हो सका है।
आम आदमी पार्टी और राजद के सामने खड़ी चुनौतियां
क्षेत्रीय दलों के भीतर उठते असंतोष की यह लहर केवल महाराष्ट्र और बंगाल तक ही सीमित नहीं है। आम आदमी पार्टी में यद्यपि अभी तक संगठनात्मक रूप से कोई औपचारिक दोफाड़ नहीं हुआ है, लेकिन पार्टी के कुछ सांसदों के पाला बदलने से संगठन की आंतरिक पकड़ पर असर जरूर पड़ा है। इन अलग हुए सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया, जिसका नकारात्मक असर दिल्ली और पंजाब में पार्टी के जनाधार तथा छवि पर देखा गया। आंतरिक असंतोष और वरिष्ठ नेताओं का यह पलायन ऐसे समय में हुआ है जब पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। राजनीतिक हलकों में यह आशंका जताई जा रही है कि बदलती राजनीतिक बयार को देखते हुए आने वाले समय में आम आदमी पार्टी के कुछ और प्रमुख चेहरे भी पाला बदलकर भाजपा का रुख कर सकते हैं।
इसी तरह बिहार में लालू प्रसाद यादव द्वारा गठित राष्ट्रीय जनता दल पर भी संगठनात्मक विघटन का खतरा मंडराता दिखाई दे रहा है। बिहार विधानसभा में राजद के पास मौजूदा समय में कुल 25 विधायक हैं, जो किसी भी बड़े दल के लिहाज से बेहद सीमित संख्या है। सीमित विधायकों की मौजूदगी के कारण दलबदल कानून से बचने के लिए आवश्यक संख्या जुटाना विरोधी रणनीतिकारों के लिए तुलनात्मक रूप से ज्यादा कठिन नहीं माना जा रहा। पूर्व में राज्यसभा चुनाव के दौरान भी पार्टी का एक विधायक दल के आधिकारिक रुख से अलग हटकर मतदान कर चुका है। नेतृत्व शैली और परिवारवाद को लेकर पार्टी के भीतर समय-समय पर असंतोष की आवाजें उठती रही हैं, जबकि दूसरी ओर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेता लगातार यह दावा कर रहे हैं कि राजद के कई विधायक उनके संपर्क में हैं। यदि बिहार में भी राजद के भीतर कोई विभाजनकारी स्थिति बनती है, तो राज्य में विपक्षी खेमा पूरी तरह नेतृत्वविहीन और असहाय स्थिति में पहुंच सकता है।
बिखरता विपक्ष और राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ता असर
शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के घटनाक्रम इस बात की पुष्टि करते हैं कि जब भी किसी प्रांतीय दल में बिखराव होता है, उसका सबसे स्पष्ट और प्रत्यक्ष रणनीतिक लाभ भारतीय जनता पार्टी को प्राप्त होता है। महाराष्ट्र में जहां इस सियासी टूट ने सरकार बनाने और उसे स्थिर रखने का मार्ग प्रशस्त किया, वहीं पश्चिम बंगाल में इसने विपक्षी ताकत को दो फाड़ करके उसके पारंपरिक प्रभाव को सीमित कर दिया। इसके अलावा, संसद के दोनों सदनों में भी क्षेत्रीय दलों की इस आंतरिक कमजोरी ने समग्र विपक्षी संख्या बल को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। जब प्रादेशिक ताकतें अपने ही गढ़ में अपनी पहचान और सिंबल बचाने की कानूनी लड़ाइयों में उलझ जाती हैं, तो राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता पक्ष के विरुद्ध एक मजबूत और एकजुट मोर्चा खड़ा करने की विपक्षी संभावनाओं को गहरा धक्का पहुंचता है।




















