महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में एसआईआर की कवायद को लेकर खींचतान तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने इस व्यवस्था के खिलाफ ठाकरे बंधुओं द्वारा निकाले गए 'गर्जना मोर्चा' पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा संसद में दिए गए पुराने भाषण का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करते हुए उन्होंने आंदोलन कर रहे नेताओं और विपक्षी दलों के सामने कई तीखे सवाल रखे हैं।
लोकतंत्र और मतदाता सूची पर उठे बुनियादी सवाल
रविंद्र चव्हाण ने केंद्रीय गृह मंत्री के संसद में दिए गए वक्तव्यों का हवाला देते हुए मोर्चा निकालने वाले नेताओं से सीधा सवाल किया कि क्या किसी देश के प्रधानमंत्री या किसी राज्य के मुख्यमंत्री का चयन घुसपैठियों के हाथ में होना चाहिए। उन्होंने चिंता जाहिर की कि यदि ऐसी स्थिति बनती है तो क्या लोकतांत्रिक ढांचा पूरी तरह सुरक्षित रह पाएगा।
सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करते हुए चव्हाण ने यह भी पूछा कि क्या किसी एक मतदाता को कई अलग-अलग मतदान केंद्रों या शहरों में वोट डालने का अधिकार मिलना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने यह बिंदु भी सामने रखा कि जो नागरिक अब इस दुनिया में नहीं हैं, क्या उनके नाम लगातार चुनावी सूची में दर्ज रहने चाहिए।
फर्जी नामों और दोहरी प्रविष्टियों पर सफाई की मांग
बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष और पारदर्शी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनावी नामावलियों का शुद्ध होना सबसे जरूरी आधार है। उन्होंने आंदोलनकारियों से पूछा कि अगर किसी व्यक्ति का नाम एक से अधिक जगहों पर दर्ज है या फिर मृत नागरिकों के नाम सूची में बरकरार हैं, तो ऐसी गंभीर खामियों को सुधारने वाली प्रशासनिक जांच का विरोध किस आधार पर किया जा रहा है।
चव्हाण ने विरोध प्रदर्शन कर रहे राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि सड़क पर उतरने से पहले उन्हें इन बुनियादी विसंगतियों पर अपनी राय स्पष्ट करनी चाहिए। उनके अनुसार चुनाव प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखने के लिए ऐसी त्रुटियों को ठीक करना बेहद आवश्यक कदम है।
विरोध से पहले स्थिति स्पष्ट करने की चुनौती
रविंद्र चव्हाण ने कड़े लहजे में कहा कि आंदोलन की अगुवाई कर रहे नेताओं को पहले इन व्यावहारिक सवालों के उत्तर देने चाहिए, उसके बाद ही किसी प्रक्रिया के खिलाफ मोर्चा निकालना चाहिए। ठाकरे बंधुओं के सड़क पर उतरने के बाद चव्हाण के इन सवालों ने पूरे राज्य के सियासी माहौल को और गरमा दिया है। एक तरफ जहां विपक्षी खेमा इस पूरी प्रक्रिया के औचित्य पर सवाल उठा रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इसे चुनावी सूचियों को पारदर्शी, सटीक और व्यवस्थित बनाने के बड़े प्रयास के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।























