पूर्वी लद्दाख के अत्यंत संवेदनशील सीमावर्ती इलाके में भारतीय सेना की पहुंच और रसद तंत्र को अभेद्य बनाने के उद्देश्य से एक नए सड़क मार्ग की रूपरेखा तैयार की गई है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के करीब सामरिक गतिविधियों को सुगम बनाए रखने के लिए सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने श्योक नदी के पूर्वी तट के समानांतर 150 किलोमीटर लंबे वैकल्पिक सड़क कॉरिडोर की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) पर औपचारिक कार्य शुरू कर दिया है। यह प्रस्तावित राजमार्ग दरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी सड़क तंत्र का हिस्सा बनेगा और सीधे सब-सेक्टर नॉर्थ में स्थित महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने दौलत बेग ओल्डी तक सुगम पहुंच सुनिश्चित करेगा।
पांच पैकेज में तैयार होगा नेशनल हाईवे डबल लेन मार्ग
इस नई बुनियादी ढांचा परियोजना को नेशनल हाईवे डबल लेन (एनएचडीएल) के कड़े तकनीकी मानकों पर विकसित करने की रूपरेखा तैयार की गई है। काम को व्यवस्थित और त्वरित गति से पूरा करने के लिए पूरे 150 किलोमीटर के हिस्से को पांच अलग-अलग पैकेजों में विभाजित किया गया है। वर्तमान में सीमा सड़क संगठन इसके तकनीकी पहलुओं, भूगर्भीय संरचना और आवश्यक निर्माण सामग्री के आकलन के लिए डीपीआर तैयार करने की प्रक्रिया में जुटा हुआ है। यह कॉरिडोर न केवल भारी सैन्य वाहनों की आवाजाही को संभाल सकेगा, बल्कि अग्रिम चौकियों तक तोपों, टैंकों और बख्तरबंद वाहनों की त्वरित तैनाती को भी संभव बनाएगा।
श्योक नदी के किनारे निर्माण में इंजीनियरिंग की कड़ी परीक्षा
भौगोलिक और मौसमी दृष्टि से श्योक नदी घाटी दुनिया के सबसे दुर्गम और विषम क्षेत्रों में गिनी जाती है। अत्यधिक ऊंचाई वाले इस क्षेत्र में तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है, जिससे निर्माण कार्यों की अवधि बेहद सीमित हो जाती है। गर्मियों के महीनों में ग्लेशियरों और बर्फ के तेजी से पिघलने के कारण श्योक नदी के जलस्तर और बहाव में भारी उतार-चढ़ाव आता है, जिससे किनारे कटने और अचानक जलभराव का खतरा बना रहता है।
इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए इस सड़क के निर्माण और दीर्घकालिक रखरखाव के लिए व्यापक सुरक्षात्मक उपाय करने होंगे। मार्ग में मजबूत तटबंधों, विशेष रिटेनिंग वॉल, दर्जनों आधुनिक पुलों और उन्नत इंजीनियरिंग तकनीकों का सहारा लिया जाएगा ताकि बाढ़ या हिमस्खलन की स्थिति में भी सड़क क्षतिग्रस्त न हो। इस चुनौतीपूर्ण भूभाग में टिकाऊ बुनियादी ढांचा खड़ा करना सीमा सड़क संगठन के इंजीनियरों के लिए एक बड़ा तकनीकी इम्तिहान साबित होगा।
अग्रिम मोर्चों के लिए जीवनरेखा साबित होगा वैकल्पिक संपर्क
पूर्वी लद्दाख के ऊंचाई वाले रेगिस्तानी इलाके में अचानक आने वाली बाढ़, ग्लेशियरों के खिसकने, चट्टानें गिरने और खराब मौसम की वजह से पारंपरिक रास्ते अक्सर बाधित हो जाते हैं। वर्तमान में इस्तेमाल हो रहा दरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी मार्ग लद्दाख के सुदूर उत्तरी छोर तक सैनिकों और रसद को पहुंचाने का प्रमुख जरिया रहा है। हालांकि, किसी भी प्राकृतिक आपदा या सैन्य आपातकाल के समय एकल मार्ग पर निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है।
श्योक के पूर्वी किनारे बनने वाला यह 150 किलोमीटर लंबा नया मार्ग मौजूदा व्यवस्था को एक मजबूत विकल्प प्रदान करेगा। यदि मुख्य मार्ग का कोई हिस्सा भूस्खलन या जलभराव से अवरुद्ध होता है, तो यह दूसरा रास्ता सैन्य वाहनों और आपूर्तियों की निर्बाध गतिशीलता बनाए रखेगा। इससे अग्रिम मोर्चों पर तैनात जवानों तक गोला-बारूद, रसद, ईंधन, दवाइयां और विशेष उपकरण पहुंचाने में किसी प्रकार का व्यवधान पैदा नहीं होगा।
देपसांग और काराकोरम क्षेत्र में बढ़ेगी सामरिक पकड़
दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) सब-सेक्टर नॉर्थ का बेहद अहम सामरिक बिंदु है, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा के बिल्कुल नजदीक स्थित है। इसके पास ही सामरिक महत्व का देपसांग मैदानी इलाका और काराकोरम दर्रा मौजूद हैं। इस अग्रिम क्षेत्र में बेहतर सड़क संपर्क सीधे तौर पर देश की रक्षा तैयारियों और निगरानी क्षमता को धार देता है।
पिछले कुछ वर्षों से सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण और विस्तार पर विशेष जोर दिया जा रहा है। अरुणाचल प्रदेश से लेकर लेह-लद्दाख तक हर मौसम में चालू रहने वाले ऑल वेदर सड़क नेटवर्क को अंतिम रूप दिया जा रहा है। श्योक नदी के समानांतर यह नया प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद देपसांग और दौलत बेग ओल्डी की ओर जाने वाला रक्षा ढांचा कई गुना सशक्त हो जाएगा, जिससे अग्रिम ठिकानों पर भारतीय सेना की प्रतिक्रिया का समय काफी घट जाएगा।















