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राजस्थान के करौली में मौजूद है 500 साल पुराना अनूठा मंदिर, 16 खंभों पर खड़ी है महर्षि वेदव्यास की यह अद्भुत इमारतराजस्थान
16 सित॰ 2026, 8:12 am (9 दिन पहले)· 0

राजस्थान के करौली में मौजूद है 500 साल पुराना अनूठा मंदिर, 16 खंभों पर खड़ी है महर्षि वेदव्यास की यह अद्भुत इमारत

राजस्थान के करौली जिले के भांकरी गांव में महर्षि वेदव्यास का 500 साल पुराना मंदिर स्थित है, जिसे स्थानीय लोग 'बड़ा मंदिर' कहते हैं। यह मंदिर बिना चूना-बजरी के जोड़े गए लाल पत्थरों और 16 मजबूत खंभों पर टिका हुआ है।

राजस्थान के करौली जिले में सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन वास्तुकला का एक ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जिसके विषय में बहुत कम लोगों को जानकारी है। जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भांकरी गांव के केंद्र में महर्षि वेदव्यास का लगभग 500 साल पुराना मंदिर आज भी अपनी ऐतिहासिक पहचान और धार्मिक परंपराओं को संजोए हुए है। स्थानीय ग्रामीण इस पावन स्थल को 'बड़ा मंदिर' कहकर पुकारते हैं।

गांव के व्यास परिवारों द्वारा लगभग पांच सदी पहले निर्मित इस मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों का ऐसा विश्वास है कि यह राजस्थान में महर्षि वेदव्यास का एकमात्र मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने ही वेदों का संकलन कर उन्हें सामान्य जनमानस के लिए बोधगम्य और सरल बनाया था। महाभारत, श्रीमद्भागवत महापुराण समेत कई महान ग्रंथों की रचना और संपादन से उनका नाम गहराई से जुड़ा हुआ है। यही मुख्य वजह है कि भांकरी के इस धार्मिक स्थल पर महर्षि वेदव्यास के दर्शन करने और वेदों के मंत्रोच्चार का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता है।

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स्थानीय निवासी जनार्दन उपाध्याय के अनुसार, इस ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना करीब 500 वर्ष पूर्व गांव के व्यास परिवारों ने सामूहिक रूप से करवाई थी। मंदिर के गर्भ गृह में महर्षि वेदव्यास की लगभग 3 फीट ऊंची अष्टधातु की भव्य प्रतिमा स्थापित है। इसके अतिरिक्त, संकट मोचन हनुमान की मूर्ति भी यहां आने वाले श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का मुख्य केंद्र बनी हुई है। इन दोनों पावन देव प्रतिमाओं के दर्शन के लिए न केवल स्थानीय नागरिक बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से भी भारी संख्या में भक्तजन पहुंचते हैं।

भांकरी के इस प्राचीन धाम में आसपास के गांवों के साथ-साथ राजधानी जयपुर, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, अलवर समेत कई दूरवर्ती इलाकों से भी लोग दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर के पुजारी राधेश्याम शर्मा का कहना है कि यहां महर्षि वेदव्यास की पूजा-अर्चना और दर्शन को लेकर भक्तों के मन में अनन्य श्रद्धा है। ऐसी गहरी मान्यता है कि इस पवित्र मंदिर परिसर में वेदों का उच्चारण करने से सभी प्रकार के संकटों का निवारण होता है और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

इस प्राचीन मंदिर की सबसे विशिष्ट खासियत इसकी अनूठी और प्राचीन निर्माण शैली है। पूरी इमारत बिना किसी आधुनिक सहारे के 16 मजबूत खंभों के ऊपर टिकी हुई है। इसके निर्माण कार्य में लाल पत्थरों के बड़े और भारी-भरकम टुकड़ों का उपयोग किया गया है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, लगभग 7 से 8 इंच मोटाई वाले इन पत्थरों को बिना किसी चूने और बजरी के इस्तेमाल के आपस में सटीक तरीके से जोड़कर इस मंदिर को खड़ा किया गया था। सदियों पुराना होने के बावजूद यह प्राचीन वास्तुकला आज भी देखने वालों के लिए कौतुक और आकर्षण का विषय बनी हुई है।

मंदिर में सामान्य दिनों के अलावा प्रत्येक पूर्णिमा तिथि और विभिन्न प्रमुख पर्वों के अवसर पर विशेष धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-अर्चना संपन्न होती है। पुजारी के अनुसार, महर्षि वेदव्यास को मुख्य रूप से खीर-पूरी, हलवा, लड्डू और पंचमेवा का नैवेद्य अर्पित किया जाता है। मंदिर में नियमित रूप से सुबह और शाम के समय पारंपरिक तरीके से झालर बजाकर आरती की जाती है। अनुष्ठान के दौरान गूंजने वाले वैदिक मंत्रोच्चार से संपूर्ण मंदिर परिसर में प्रातः काल से लेकर रात्रि तक पूरी तरह भक्तिमय वातावरण बना रहता है।

लगभग पांच सौ वर्षों का लंबा कालखंड बीत जाने के बाद भी इस मंदिर की संरचना का इतनी मजबूत अवस्था में बने रहना आज भी लोगों को आश्चर्यचकित करता है। प्राचीन और उन्नत तकनीक के माध्यम से निर्मित यह पावन स्थल समय के थपेड़ों को झेलते हुए भी अपनी मूल वास्तुकला को सुरक्षित रखे हुए है। मंदिर में उपयोग किए गए मजबूत पत्थर और इसकी विशिष्ट निर्माण कला उस दौर की इंजीनियरिंग और कला कौशल की जीवंत मिसाल पेश करते हैं।

सवाल-जवाब

करौली का यह प्रसिद्ध मंदिर कहां स्थित है?
यह मंदिर करौली जिले से लगभग 30 किलोमीटर दूर भांकरी गांव के बीचों-बीच स्थित है।
इस मंदिर को किस नाम से जाना जाता है?
स्थानीय लोग इस प्राचीन मंदिर को 'बड़े मंदिर' के नाम से पुकारते हैं।
यह मंदिर कितने वर्ष पुराना है?
यह मंदिर करीब 500 साल पुराना माना जाता है जिसकी स्थापना गांव के व्यास परिवारों ने कराई थी।
मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में किसकी प्रतिमा विराजमान है?
मंदिर में महर्षि वेदव्यास की करीब 3 फीट ऊंची अष्टधातु की प्रतिमा और संकट मोचन हनुमान की मूर्ति स्थापित है।
इस मंदिर की निर्माण शैली की क्या विशेषता है?
पूरा मंदिर बिना चूना और बजरी के जोड़े गए लाल पत्थरों के टुकड़ों से बने 16 मजबूत खंभों पर टिका हुआ है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·8 दिन पहले

ऐसे प्राचीन धार्मिक और वास्तुकला धरोहर स्थल केवल सांस्कृतिक पहचान ही नहीं, बल्कि जनमानस के मानसिक स्वास्थ्य और आत्मिक शांति के लिए भी महत्वपूर्ण केंद्र हैं। मंदिर परिसर में मंत्रोच्चार और ध्यान जैसी पारंपरिक गतिविधियां तनाव दूर करने और मानसिक कल्याण को बढ़ावा देने में सहायक होती हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को वेलनेस और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता के साथ जोड़ने से दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के समग्र स्वास्थ्य और जीवन शैली में सकारात्मक सुधार लाया जा सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·8 दिन पहले

यह रिपोर्ट भारत की उस छिपी हुई सांस्कृतिक और वास्तुकला धरोहर को सामने लाती है, जो अब तक व्यापक स्तर पर चर्चा में नहीं आ पाई है। वित्तीय और पर्यटन दृष्टि से देखें तो राजस्थान में बिना चूने-गारे के 16 खंभों पर टिकी ऐसी ऐतिहासिक संरचनाएं केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखतीं, बल्कि इनमें ग्रामीण और हेरिटेज टूरिज्म को बढ़ावा देने की अपार संभावनाएं छिपी हैं। यदि ऐसे स्थानों के संरक्षण के साथ स्थानीय अवसंरचना का विकास किया जाए, तो यह क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन में बड़ा योगदान दे सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 दिन पहले

रविकेश के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए नीतिगत और प्रशासनिक पक्ष पर ध्यान देना जरूरी है। ऐसे ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण के लिए राज्य सरकार को इन्हें अपनी आधिकारिक पुरातत्व संरक्षण सूची और क्षेत्रीय पर्यटन सर्किट नीतियों में प्राथमिकता से शामिल करना चाहिए। स्थानीय ग्राम पंचायतों के पास इन 500 साल पुरानी अद्वितीय संरचनाओं के रखरखाव के लिए पर्याप्त बजट और तकनीकी विशेषज्ञता का अभाव रहता है। जब तक शासन स्तर पर अवसंरचना विकास और विशेष धरोहर निधि का आवंटन नहीं होगा, तब तक इस सांस्कृतिक विरासत का दीर्घकालिक संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक लाभ सुनिश्चित करना कठिन होगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·9 दिन पहले

करौली के इस प्राचीन मंदिर की वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए यह आवश्यक है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण या राज्य का कला एवं संस्कृति विभाग इसके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए। बिना चूना-बजरी के 16 खंभों पर टिकी यह 500 साल पुरानी अनूठी संरचना यदि उपेक्षित रही, तो हमारी अमूल्य विरासत नष्ट हो सकती है। इसे पर्यटन मानचित्र पर लाने से न केवल स्थानीय सुरक्षा और रख-रखाव बेहतर होगा, बल्कि ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा के प्रति प्रशासनिक जागरूकता भी बढ़ेगी।

Rohan Verma@rohan-verma·9 दिन पहले

करण मल्होत्रा के इस सुझाव को आगे बढ़ाते हुए, भांकरी गांव के इस 500 साल पुराने मंदिर के संरक्षण और इसे पर्यटन मानचित्र पर लाने की दिशा में तत्काल प्रशासनिक पहल की आवश्यकता है। यदि राज्य शासन और संबंधित विभाग इस दिशा में जल्द ठोस कदम उठाते हैं, तो न केवल प्राचीन वास्तुकला की यह अनूठी शैली सुरक्षित बचेगी, बल्कि क्षेत्रीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।

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