उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनाव से पहले विधायक छोटे लाल वर्मा के निधन से बदला समीकरणउत्तर प्रदेश में मीठे पानी की सीपों से मोती की खेती पर 40% सब्सिडी, तीन श्रेणियों में तय हुए सरकारी प्रोजेक्टनिचले स्तरों पर लिवाली से संभले सेंसेक्स और निफ्टी, बैंकिंग व ऑटो शेयरों ने दिया सहारासंस्थागत पूंजी और व्हेल निवेशकों की खरीद से ऑल्टकॉइन्स में तेजी के संकेतमूलांक 9 अंकज्योतिष 25 सितंबर 2026: एकरस दिनचर्या से बेचैनी मुमकिन, काम करने का सलीका बदलकर पाएं मानसिक सुकूनचंडीगढ़ के सेक्टर-22 में हेड कांस्टेबल की गोली मारकर हत्या, बेटे पर सर्विस रिवॉल्वर से जान लेने का आरोपकालकाजी गैंगरेप पीड़िता की दर्दनाक दास्तां, जन्मदिन पर मंदिर गई युवती से तीन दरिंदों ने की थी बर्बरताइरडा के नए कमीशन नियमों से सहमा बीमा बाजार, पॉलिसीबाजार समेत दिग्गज शेयरों में भारी गिरावटहिमाचल पर्यटन विकास निगम में वेतन संकट गहराया, भड़के कर्मचारियों ने उठाई चेयरमैन को हटाने की मांगपाकिस्तान के दिग्गज ओपनर सईद अनवर का सफर, जब पारिवारिक त्रासदी ने बदल दी थी जिंदगी
राजस्थान निकाय चुनाव: बिना पार्षद बने धौलपुर सभापति बने गिरीश गर्ग, समझिए पूरा सियासी गणितराजस्थान
21 सित॰ 2026, 9:46 am (4 दिन पहले)· 0

राजस्थान निकाय चुनाव: बिना पार्षद बने धौलपुर सभापति बने गिरीश गर्ग, समझिए पूरा सियासी गणित

धौलपुर नगर परिषद में कांग्रेस के 27 पार्षद जीतने के बावजूद बिना चुनाव लड़े गिरीश गर्ग निर्विरोध सभापति चुन लिए गए, जो राजस्थान की हाइब्रिड चुनाव व्यवस्था से संभव हुआ।

राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों में धौलपुर नगर परिषद का नतीजा राजनीतिक हलकों में खासी चर्चा बटोर रहा है। यहां वार्ड स्तर के मुकाबलों में कांग्रेस 27 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, लेकिन शीर्ष पद यानी सभापति की कुर्सी गिरीश गर्ग के पाले में चली गई। इस सियासी घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि गिरीश गर्ग ने मौजूदा चुनावों में पार्षद पद के लिए कोई पर्चा ही दाखिल नहीं किया था। बिना पार्षद बने ही वे सीधे नगर परिषद के मुखिया की कुर्सी तक पहुंच गए, जो राज्य के चुनावी नियमों में शामिल हाइब्रिड मॉडल के कारण संभव हुआ है।

धौलपुर नगर परिषद का चुनावी समीकरण और सीटों का ब्योरा

धौलपुर नगर परिषद के अंतर्गत कुल 60 वार्ड आते हैं। हालिया चुनाव परिणामों में किसी भी एक पार्टी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हुआ था। परिणामों के मुताबिक कांग्रेस ने 27 वार्डों में विजय प्राप्त की, जबकि बीजेपी के खाते में 11 सीटें आईं। इसके अलावा 19 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की और बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा को 3 वार्डों में कामयाबी मिली थी।

ये भी पढ़ें

नगर परिषद में अपना सभापति बनाने के लिए 31 पार्षदों के समर्थन का जादुई आंकड़ा जरूरी था। कांग्रेस पार्टी 27 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी तो जरूर बन गई, मगर बहुमत के जरूरी आंकड़े से चार कदम दूर रह गई। सभापति पद की दौड़ के लिए कुल सात उम्मीदवारों ने अपना नामांकन दाखिल किया था। नामांकन प्रक्रिया के बाद छह प्रत्याशियों ने चुनावी मैदान से अपने नाम वापस ले लिए। नाम वापसी की मियाद खत्म होने के बाद मैदान में केवल गिरीश गर्ग अकेले प्रत्याशी बचे, जिसके चलते मतदान की नौबत नहीं आई और उन्हें निर्विरोध सभापति घोषित कर दिया गया।

पार्षद का चुनाव लड़े बिना सीधे सभापति पद पर नामांकन

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात गिरीश गर्ग का चुनावी सफर रहा। उन्होंने नगर परिषद के किसी भी वार्ड से पार्षद का चुनाव नहीं लड़ा था। इसके बावजूद वे सीधे सभापति पद के चुनाव में बतौर प्रत्याशी उतरे। छह अन्य दावेदारों के नाम वापस लेने से उनके सामने कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा। बिना किसी विरोध के वे सीधे धौलपुर नगर परिषद के सभापति निर्वाचित हो गए।

क्या है राजस्थान का हाइब्रिड चुनावी मॉडल?

आम तौर पर निकाय चुनावों में यह माना जाता है कि वही व्यक्ति अध्यक्ष या सभापति बन सकता है जो पहले वार्ड स्तर पर पार्षद चुना गया हो। राजस्थान में लागू हाइब्रिड व्यवस्था इस पारंपरिक प्रक्रिया से अलग विकल्प देती है। इस नियम के तहत किसी भी योग्य नागरिक को सीधे निकाय प्रमुख यानी मेयर, सभापति या अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने की अनुमति होती है, भले ही वह वार्ड का पार्षद न हो।

वर्ष 2019 में लागू किए गए इस प्रावधान के अनुसार वार्ड पार्षदों का चुनाव और निकाय प्रमुख का चुनाव दो अलग-अलग स्तरों पर संचालित होता है। हालांकि, गैर-पार्षद रहते हुए अध्यक्ष या सभापति बनने वाले व्यक्ति के लिए एक अनिवार्य शर्त भी जुड़ी हुई है। यदि कोई व्यक्ति बिना पार्षद बने निकाय प्रमुख निर्वाचित होता है, तो उसे पद ग्रहण करने के बाद एक निश्चित समय सीमा के अंदर पार्षद की पात्रता पूरी करनी होती है।

छह महीने के भीतर जीतना होगा पार्षद का चुनाव

गिरीश गर्ग के मामले में भी यह अनिवार्य कानूनी प्रावधान पूरी तरह लागू होगा। बिना पार्षद का चुनाव लड़े सभापति बनने के बाद अब उन्हें अपने पद पर बने रहने के लिए आगामी छह महीने के भीतर किसी न किसी वार्ड से पार्षद का चुनाव जीतकर आना होगा। यदि वे इस छह महीने की तय मियाद में पार्षद बनने की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाते हैं, तो उनके पद पर संकट खड़ा हो सकता है। यानी उनका सभापति बनना भले ही वार्ड चुनाव से अलग रहा हो, लेकिन पद की निरंतरता आगे चलकर पार्षद बनने की शर्त पर ही टिकी रहेगी।

जीत के बाद पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से मुलाकात

धौलपुर नगर परिषद के सभापति पद पर निर्विरोध चुने जाने के तुरंत बाद गिरीश गर्ग ने पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे से मुलाकात की। इस मुलाकात को लेकर वसुंधरा राजे ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए जानकारी साझा की। उन्होंने लिखा कि धौलपुर नगर परिषद के निर्विरोध नवनिर्वाचित सभापति गिरीश गर्ग ने उनसे भेंट की और आभार प्रकट किया। इसके साथ ही उन्होंने धौलपुर के समग्र विकास के लिए संकल्प लिया। इस अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री ने नवनिर्वाचित सभापति को बधाई और शुभकामनाएं भी दीं।

कांग्रेस के 27 पार्षद होने के बावजूद क्यों फिसली कुर्सी?

धौलपुर के चुनावी गणित पर नजर डालें तो कांग्रेस के पास 27 पार्षद थे, जो बहुमत के 31 के आंकड़े से सिर्फ 4 कम थे। दूसरी ओर, गिरीश गर्ग को बीजेपी के 11 पार्षदों, बसपा के 3 पार्षदों और कुल 19 निर्दलीयों में से 17 पार्षदों का मजबूत समर्थन हासिल हुआ। इस तरह गर्ग के पक्ष में समर्थन का आंकड़ा 31 तक पहुंच गया। नामांकन वापसी के अंतिम दौर में अन्य छह उम्मीदवारों के हट जाने से वोटिंग की जरूरत ही खत्म हो गई। धौलपुर का यह परिणाम राजस्थान के हाइब्रिड सिस्टम की कार्यप्रणाली का एक बड़ा उदाहरण बन गया है, जहां निकाय प्रमुख का चयन वार्डों की दलीय स्थिति से बिल्कुल अलग मोड़ ले सकता है।

सवाल-जवाब

धौलपुर नगर परिषद में कुल कितने वार्ड हैं और बहुमत का आंकड़ा क्या था?
धौलपुर नगर परिषद में कुल 60 वार्ड हैं। यहां सभापति पद के लिए 31 पार्षदों के समर्थन का बहुमत जरूरी था।
गिरीश गर्ग बिना पार्षद बने सभापति कैसे निर्वाचित हुए?
राजस्थान की 2019 की हाइब्रिड चुनाव व्यवस्था के तहत कोई भी पात्र व्यक्ति बिना पार्षद बने सीधे सभापति का चुनाव लड़ सकता है।
धौलपुर निकाय चुनाव में प्रमुख दलों को कितनी सीटें मिली थीं?
चुनाव परिणामों में कांग्रेस को 27, बीजेपी को 11, निर्दलीयों को 19 और बसपा को 3 सीटें प्राप्त हुईं।
गिरीश गर्ग को किन पार्षदों का समर्थन हासिल हुआ?
उन्हें बीजेपी के 11, बसपा के 3 और 19 में से 17 निर्दलीय पार्षदों का समर्थन मिला, जिससे उनका आंकड़ा 31 तक पहुंच गया।
क्या गिरीश गर्ग के लिए आगे पार्षद बनना अनिवार्य होगा?
हां, हाइब्रिड नियम के अनुसार बिना पार्षद बने सभापति चुने जाने पर छह महीने के भीतर पार्षद का चुनाव जीतना जरूरी है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Rohan Gupta@rohan-gupta·4 दिन पहले

राजस्थान के हाइब्रिड चुनावी मॉडल ने एक बार फिर पारंपरिक दलीय समीकरणों को चौंका दिया है, जहां धौलपुर में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस बहुमत के जादुई आंकड़े से चार कदम दूर रह गई। वार्ड स्तर पर पार्षद चुने बिना सीधे सभापति बनने की यह व्यवस्था भले ही कानूनी है, लेकिन यह राजनीतिक सौदेबाजी, निर्दलीयों की भूमिका और तकनीकी खामियों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। इस तरह के अप्रत्याशित चुनावी परिणाम भविष्य में शहरी स्थानीय निकायों के भीतर राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा दे सकते हैं, क्योंकि सदन के भीतर और बाहर नेतृत्व के बीच समन्वय बिठाना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

धौलपुर निकाय चुनाव का यह परिणाम राजस्थान की हाइब्रिड चुनावी व्यवस्था की राजनीतिक जटिलताओं को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। कांग्रेस के पास 27 पार्षद होने और बहुमत का जादुई आंकड़ा 31 न मिलने के कारण राजनीतिक गतिरोध की स्थिति बनी, जिसका फायदा उठाते हुए बिना पार्षद बने गिरीश गर्ग का निर्विरोध सभापति बनना इस बात का प्रमाण है कि इस व्यवस्था में दलीय संख्याबल से अधिक रणनीतिक प्रबंधन और दलबदल या निर्दलीयों की भूमिका निर्णायक हो जाती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

यह घटना दिखाती है कि कैसे खंडित जनादेश के दौर में हाइब्रिड मॉडल राजनीतिक दलों के आंतरिक समीकरणों और फ्लोर मैनेजमेंट की नई प्रयोगशाला बन रहा है। जब कोई दल स्पष्ट बहुमत से चार कदम दूर हो, तब वार्ड की लड़ाई जीतने से ज्यादा शीर्ष पद के लिए जोड़-तोड़ और रणनीतिक वॉकओवर की अहमियत बढ़ जाती है। भविष्य में इस तरह के प्रावधान शहरी स्थानीय निकायों में निर्दलीयों और बागी गुटों के महत्व को और अधिक बढ़ाएंगे, जिससे राजनीतिक स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

धौलपुर का यह मामला राजस्थान के हाइब्रिड चुनावी मॉडल की एक बड़ी राजनीतिक वास्तविकता को उजागर करता है। जहाँ एक तरफ कांग्रेस २७ पार्षद जीतकर भी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सत्ता से दूर रह गई, वहीं दूसरी तरफ निर्दलीय और अन्य दलों की गहमागहमी के बीच बिना पार्षद बने सीधे सभापति चुन लिया जाना इस प्रणाली के कानूनी और रणनीतिक पहलुओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आने वाले समय में ऐसे प्रावधान लोकतांत्रिक जवाबदेही और सदन के भीतर बहुमत के समीकरणों को किस प्रकार प्रभावित करेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

यह हाइब्रिड मॉडल संख्याबल पर रणनीतिक पैंतरेबाज़ी को तरजीह देता है। जब धौलपुर में 27 पार्षद होने के बावजूद कांग्रेस बहुमत से चार कदम दूर रह गई, तो इस प्रावधान ने निर्दलीय और अन्य दलों की भूमिका को और अधिक संवेदनशील बना दिया। बिना जनता के सीधे मुकाबले में उतरे शीर्ष पद हासिल करना इस चुनावी प्रणाली की अनूठी जटिलता को दर्शाता है, जो भविष्य के स्थानीय चुनावों में राजनीतिक गठजोड़ की परिभाषा बदल सकता है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp