सुल्तानपुर का ऐतिहासिक महत्व
सुल्तानपुर का क्षेत्र, अपने भौगोलिक दायरे से कहीं बढ़कर, प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारत के कई महत्वपूर्ण राजवंशों और शख्सियतों से जुड़ा रहा है। यह जिला, जो भारतीय इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज कराने वाले कई ऐतिहासिक घटनाक्रमों का साक्षी रहा है, कभी 12 प्रशासनिक इकाइयों, जिन्हें 'परगना' कहा जाता था, में बंटा हुआ था। 'परगना' शब्द, जिसका आज भी राजस्व अभिलेखों में 'मोहाल' या 'इलाके' के रूप में इस्तेमाल होता है, इस क्षेत्र की समृद्ध प्रशासनिक विरासत का एक अहम हिस्सा है।
'परगना' शब्द की उत्पत्ति और प्रारंभिक उपयोग
'परगना' शब्द की उत्पत्ति 12वीं शताब्दी में हुई थी, और इसे पहली बार Abul Fazal के लेखन में उल्लेखित पाया जाता है। इतिहासकार Rajeshwar Singh ने अपनी पुस्तक 'सुल्तानपुर इतिहास की झलक' के पृष्ठ 33 पर इस बात का जिक्र किया है कि 'परगना' का प्रयोग भूमिकर के भुगतान के संदर्भ में सबसे पहले 1210 ईस्वी में किया गया था। C.A. Elliot ने अपनी 'Unnao Chronicle' में यह भी बताया है कि Shihabuddin Ghori के शासनकाल के दौरान इस शब्द का पहली बार इस्तेमाल हुआ। Dr. W. Oldam ने भी इस तथ्य को पुष्ट किया है कि प्रारंभिक मुस्लिम काल में, यह शब्द जंगलों के बीच जोती गई भूमि के निश्चित भूभागों के लिए इस्तेमाल होता था, जिन पर अक्सर विशिष्ट वंशों और जातियों का अधिकार होता था। साधारण शब्दों में कहें तो, प्राचीन परगने आज की तहसीलों के समान थे; जिस प्रकार आज एक जनपद में कई तहसीलें होती हैं, उसी तरह मुस्लिम काल में कई परगने हुआ करते थे।
ब्रिटिश शासन के दौरान परगनों का पुनर्गठन
वरिष्ठ पत्रकार Vikram Brijendra Singh ने TrendKia को बताया कि 1869 से पहले, Sultanpur में कुल 12 परगने मौजूद थे। हालांकि, जब अंग्रेजों ने सत्ता का अधिग्रहण किया, तो Sultanpur और आसपास के जिलों की प्रशासनिक सीमाओं का एक व्यापक पुनर्गठन किया गया। इस पुनर्गठन के तहत, Isouli, Barosa और Aldemau जैसे परगनों को Faizabad से अलग कर Sultanpur में शामिल कर दिया गया। इसके विपरीत, Inhauna, Jaish, Simrauta, Mohanlalganj और Subiha जैसे परगनों को Sultanpur से निकालकर पड़ोसी जिलों में मिला दिया गया। ये ऐतिहासिक तथ्य और भौगोलिक परिवर्तन उस दौर की सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
राजस्व प्रशासन में 'परगना' की निरंतर प्रासंगिकता
आज भले ही देश में मुगलकालीन राजनीतिक व्यवस्था प्रभावी न हो, लेकिन उसकी प्रशासनिक और भाषाई विरासत अभी भी भारतीय शासन प्रणाली में कायम है। कई जिलों में राजस्व से संबंधित कामकाज में आज भी अरबी और फारसी के शब्द, जो मुगल दरबार की भाषा का हिस्सा थे, इस्तेमाल किए जाते हैं। इसी ऐतिहासिक परंपरा के तहत, 'परगना' शब्द आज भी भारतीय राजस्व अभिलेखों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है, जो उस समय के प्रशासनिक विभाजनों और उनके दीर्घकालिक प्रभावों की याद दिलाता है।













