देश की शीर्ष अदालत में एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान उस वक्त बेहद रोचक और खुशनुमा माहौल बन गया जब गुजारे भत्ते की भारी-भरकम राशि पर दिलचस्प चर्चा छिड़ गई। तारीख 1 अक्टूबर की थी, जब सुप्रीम कोर्ट में तलाक और भरण-पोषण से जुड़े एक मुकदमे की कार्यवाही चल रही थी। पत्नी के वकील ने अदालत के सामने वित्तीय मांगों का विवरण पेश करते हुए जब गुजारे भत्ते के आंकड़े रखे, तो रकम को लेकर शुरू में बेंच और वकील के बीच थोड़ी असमंजस की स्थिति बन गई। जब यह साफ हुआ कि मामला लाखों का नहीं बल्कि करोड़ों का है, तब बेंच पर मौजूद न्यायाधीश की त्वरित हाजिरजवाबी ने पूरे कोर्टरूम को मुस्कराने पर मजबूर कर दिया।
लाखों से करोड़ों तक पहुंचा भ्रम
मुकदमे की कार्यवाही के दौरान जस्टिस एससी शर्मा ने पत्नी की ओर से पैरवी कर रहे वकील से वित्तीय दावों का ब्योरा समझने के लिए सवाल किया। न्यायाधीश ने यह स्पष्ट करना चाहा कि क्या पत्नी के लिए 45 की रकम मांगी जा रही है और क्या बच्चे के भविष्य के लिए किसी ट्रस्ट में 30 लाख रुपये जमा करने की मांग रखी गई है। इस पर स्थिति स्पष्ट करते हुए वकील ने अदालत को अवगत कराया कि यह आंकड़ा 30 लाख रुपये का नहीं है, बल्कि बच्चे के ट्रस्ट के लिए 30 करोड़ रुपये की मांग की जा रही है।
लाखों की जगह सीधे 30 करोड़ रुपये का आंकड़ा सामने आते ही कोर्टरूम में मौजूद सभी लोगों का ध्यान इस विशाल धनराशि की ओर खिंच गया। इतनी बड़ी वित्तीय मांग सुनकर जस्टिस एससी शर्मा ने बेहद सहज और मजाकिया लहजे में अपनी बात रखी।
वेतन और अंकों के फेर पर जज की चुटकी
मांग की गई विशाल राशि की हकीकत सामने आने के बाद जस्टिस एससी शर्मा ने अपनी बात रखते हुए कहा कि न्यायाधीशों को वेतन लाखों में मिलता है, इसलिए पांच अंकों के आगे दिमाग काम नहीं करता। अपनी इस मजेदार बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने यह भी साझा किया कि कभी-कभी उन्हें भी मिलियन और बिलियन की गणना में भ्रम हो जाता है। न्यायाधीश की इस बेबाक और हल्की-फुल्की टिप्पणी ने गंभीर कानूनी बहस के बीच तनाव को पूरी तरह दूर कर दिया। कोर्टरूम में मौजूद साथी वकीलों और कानूनविदों के बीच यह त्वरित टिप्पणी काफी देर तक चर्चा का विषय बनी रही।
फैसला सुरक्षित और कार्यवाही का समापन
यह पूरा कानूनी विवाद पति और पत्नी के बीच चल रहे वैवाहिक अलगाव और उससे जुड़ी भारी वित्तीय देनदारियों से संबंधित है। पत्नी के पक्ष ने अपनी आर्थिक आवश्यकताओं और बच्चे की परवरिश के संदर्भ में अपनी मांगें अदालत के समक्ष मजबूती से रखीं। दोनों पक्षों की ओर से पेश वकीलों ने अपने-अपने मुवक्किलों के अधिकारों को लेकर विस्तृत दलीलें पेश कीं।
दोनों पक्षों की लंबी कानूनी तकरार और आर्थिक दावों को विस्तार से सुनने के पश्चात सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। अदालत ने तत्काल फैसला सुनाने के स्थान पर विस्तृत आदेश बाद में जारी करने का निर्णय लिया। दिलचस्प वाकया यहीं समाप्त नहीं हुआ। जब इस मामले की सुनवाई पूरी हुई, तो जस्टिस एससी शर्मा बेंच से उठकर जाने लगे। उसी क्षण कोर्ट मास्टर ने उन्हें विनम्रतापूर्वक याद दिलाया कि कार्यसूची के अनुसार उस दिन सुनवाई के लिए अभी कुछ अन्य मुकदमे भी सूचीबद्ध हैं। इस पर जस्टिस शर्मा ने मुस्कुराते हुए अपने सहज अंदाज में कहा कि अच्छा, मामले अभी बाकी हैं, सॉरी। इसके बाद पीठ ने शेष मुकदमों की सुनवाई की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।



















