केंद्रीय मंत्रिमंडल में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए बड़े छात्र और युवा प्रदर्शनों के बीच विपक्ष यह दावा कर रहा है कि केंद्र सरकार दबाव में आ गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति के संदर्भ में भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर किए गए हमलों के बाद विपक्षी गठबंधन सरकार के गिर जाने तक की भविष्यवाणियां कर रहा है। हालांकि, मौजूदा राजनीतिक समीकरणों और पिछले ढाई दशकों के घटनाक्रमों को देखने पर पता चलता है कि यह फैसला किसी त्वरित दबाव के बजाय एक सोची-समझी रणनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।
दो दशकों का राजनीतिक सफर और संकट प्रबंधन
अगले महीने नरेंद्र मोदी के मुख्य मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक के 25 साल के राजनीतिक सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव पूरा हो रहा है। इस ढाई दशक लंबे कालखंड में कई बड़े विवाद और चुनौतियां सामने आईं। गुजरात की घटनाओं के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी आलोचनाएं हुईं और कई पुराने सहयोगियों ने राहें अलग कर लीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका द्वारा वीजा देने से मना करने जैसी स्थितियां भी उत्पन्न हुईं, जिसका उद्देश्य वैश्विक मंच पर उनकी छवि को प्रभावित करना था। इसके बावजूद, इन तमाम बाधाओं को पार करते हुए भारतीय राजनीति में उनकी स्थिति मजबूत बनी रही। पार्टी द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला नारा मोदी है तो मुमकिन है जहां समर्थकों के लिए एक भरोसा है, वहीं विरोधी इसे केवल एक प्रचार तंत्र बताते हैं।
कूटनीतिक तटस्थता और वैश्विक ऊर्जा नीति
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की विदेश नीति में बड़े बदलाव देखे गए हैं। रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध हो या फिर ईरान और अमेरिका के मध्य बढ़ता तनाव, भारत ने किसी भी गुट का हिस्सा बनने के बजाय संजीदगी से तटस्थ रहने का रास्ता चुना। जब अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने रूस से व्यापार और विशेष रूप से कच्चे तेल का आयात रोकने के सख्त निर्देश दिए, तब भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी। वैश्विक बाजार में तेल और गैस की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद भी भारत ने रूस से ईंधन की खरीदारी जारी रखी। इसके साथ ही खाड़ी देशों और अन्य नए बाजारों से भी तेल आयात के रास्ते तलाशे गए। कच्चे तेल को रिफाइन करके अन्य देशों को निर्यात करने की क्षमता बढ़ाकर आपदा में अवसर की अवधारणा को धरातल पर उतारा गया, जिससे घरेलू स्तर पर नागरिकों को अत्यधिक महंगाई से राहत मिली।
जन धन योजना और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण
घरेलू मोर्चे पर लागू की गई आर्थिक नीतियों ने प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया। जब जन धन योजना के तहत करोड़ों नागरिकों के बैंक खाते खोलने का अभियान शुरू किया गया था, तब शुरुआत में इसकी उपयोगिता पर सवाल उठाए गए थे। हालांकि, इसका मुख्य उद्देश्य सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के पैसे को सीधे नागरिकों के खातों में भेजना था। 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चिंता व्यक्त की थी कि केंद्र सरकार द्वारा जनता के विकास के लिए भेजे गए 100 पैसे में से केवल 15 पैसे ही अंतिम व्यक्ति तक पहुँच पाते हैं। जन धन खातों और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) की व्यवस्था ने इस लीकेज को समाप्त कर दिया। इसके अलावा, कोरोना महामारी के संकट के दौरान 80 करोड़ राशन कार्ड धारकों को 5 किलो मुफ्त राशन देने का निर्णय लिया गया, जो व्यवस्था आज भी जारी है। स्वदेशी तकनीक से निर्मित टीकों के विकास ने भी महामारी से निपटने में अहम भूमिका निभाई।
आत्मनिर्भर भारत और स्थानीय निर्माण को प्रोत्साहन
आर्थिक स्वावलंबन को बढ़ावा देने के लिए वोकल फॉर लोकल और आत्मनिर्भर भारत अभियानों की शुरुआत की गई। इसका प्राथमिक उद्देश्य स्थानीय कारीगरों, छोटे उद्योगों और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना था। इस नीति के परिणामस्वरूप देश में स्टार्टअप संस्कृति को गति मिली और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से भारतीय उत्पादों की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बढ़ी। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में हुए सुधारों के कारण भारत में हर साल स्वदेशी तकनीक से 30 से 35 करोड़ मोबाइल फोन का उत्पादन हो रहा है। इसके साथ ही बनारसी साड़ी और दिवाली पर मिट्टी के दीयों जैसे पारंपरिक उद्योगों को नया प्रोत्साहन मिला। एक जिला एक उत्पाद योजना के माध्यम से प्रत्येक जिले के विशिष्ट उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने में सफलता मिली है, हालांकि विरोधी दल इसे भी राजनीतिक बयानबाजी करार देते हैं।
चुनावी समीकरण और मंत्रिमंडल फेर-बदल की पृष्ठभूमि
2024 के आम चुनावों में विपक्षी एकजुटता के कारण भाजपा की सीटों का आंकड़ा पिछले चुनाव के 303 के रिकॉर्ड से घटकर 240 पर आ गया। बहुमत के इस नए गणित के बाद विपक्ष को यह प्रतीत होने लगा कि सरकार को नीतिगत फैसलों पर झुकाना आसान हो गया है। सीजेपी के बैनर तले हुए हालिया प्रदर्शनों के बाद धर्मेंद्र प्रधान के पद छोड़ने को विपक्ष अपनी रणनीतिक जीत के रूप में देख रहा है। लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि सरकार में काफी समय से मंत्रिमंडल पुनर्गठन पर विचार चल रहा था। धर्मेंद्र प्रधान को संगठन में चुनाव प्रभारी या किसी अन्य महत्वपूर्ण पद पर नई जिम्मेदारी सौंपने की योजना पहले से तैयार थी। आंदोलन न होने की स्थिति में भी उनके विभाग में बदलाव तय था। ऐतिहासिक रूप से मौके की नजाकत को समझते हुए समय पर कदम उठाना और संकट को नए अवसर में बदलना इस शासन शैली की प्रमुख विशेषता रही है।





















