निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और एसआईआर को केंद्र में रखकर जारी तीखी राजनीतिक बहस के बीच बुधवार को भारतीय जनता पार्टी ने प्रमुख विपक्षी दल पर जोरदार हमला बोला। एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए भाजपा सांसद संबित पात्रा ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला की पुरानी नियुक्ति और उनके कार्यकाल का ब्योरा सामने रखकर कांग्रेस के तमाम दावों पर सवाल खड़े किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर शोर मचाने वाली कांग्रेस का अपना इतिहास ऐसी संस्थाओं के राजनीतिक इस्तेमाल से भरा पड़ा है।
पूर्व चुनाव आयुक्तों के कार्यकाल और उपकृत करने के आरोपों पर घेरा
संबित पात्रा ने कहा कि मौजूदा दौर में मोदी सरकार ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता को अधिक सुदृढ़ बनाया है, जबकि कांग्रेस के पचास वर्षों के शासनकाल में इस संवैधानिक निकाय को महज एक कठपुतली बनाकर रख दिया गया था। अपने संबोधन में उन्होंने के वी के सुंदरम से लेकर नवीन चावला तक कई पूर्व चुनाव आयुक्तों के नाम सिलसिलेवार ढंग से गिनाए। पात्रा ने विस्तार से रेखांकित किया कि किस प्रकार कांग्रेस सरकारों ने सेवानिवृत्ति के पश्चात इन पूर्व चुनाव आयुक्तों को विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर बैठाकर उपकृत करने का काम किया। उन्होंने कहा कि आज जब जनता कांग्रेस को लगातार लोकतांत्रिक रूप से नकार चुकी है, तब अपनी राजनीतिक खिसियाहट मिटाने के लिए पार्टी के नेता भाजपा पर बेबुनियाद और अनर्गल आरोप मढ़ रहे हैं।
2009 के आम चुनाव और चयन समिति में हुआ बदलाव
भाजपा सांसद ने ऐतिहासिक घटनाक्रम को साझा करते हुए दावा किया कि नवीन चावला को वर्ष 2005 में चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। बाद में 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान वह देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर आसीन थे। पात्रा ने याद दिलाया कि उसी 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए को सत्ता मिली थी। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को सामने रखकर उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व और आयोग के आपसी समीकरणों पर गंभीर सवाल खड़े किए। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयुक्तों के चयन के विधायी नियमों में हुए हालिया बदलावों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2023 तक नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया में केवल प्रधानमंत्री की भूमिका प्रमुख रहा करती थी, जबकि नई व्यवस्था के तहत गठित चयन समिति में लोकसभा में विपक्ष के नेता को भी आधिकारिक तौर पर शामिल किया गया है, जिससे प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक पारदर्शी बन चुकी है।
एसआईआर विवाद और आयोग के भीतर असंतोष की बातें
संबित पात्रा की यह तीखी प्रतिक्रिया ऐसे वक्त में आई है जब एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज पर विपक्षी दल लगातार घेराबंदी कर रहे हैं। इस पूरे विवाद में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा निर्णय लेने और संस्थान को हाईजैक करने के गंभीर आरोप सामने आए। आयोग के दो साथी चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से यह आपत्ति जताई गई कि ज्ञानेश कुमार बाकी दोनों आयुक्तों की राय सुने बिना अपनी मर्जी से आयोग का संचालन कर रहे हैं और लिए गए फैसलों की जानकारी उन्हें संचार माध्यमों से मिल रही है। इन दोनों चुनाव आयुक्तों ने दस महीनों के भीतर चौदह बार इस स्थिति की शिकायत की और कैबिनेट सचिव को औपचारिक पत्र भी भेजे, जिन पर कोई जवाब नहीं मिला। हालांकि चुनाव आयोग ने इन सभी बातों पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि किसी भी संवैधानिक संस्थागत विचार-विमर्श में विभिन्न दृष्टिकोणों का होना स्वाभाविक प्रक्रिया है और एसआईआर से जुड़े सभी अंतिम फैसले पूरी सर्वसम्मति के साथ लिए गए हैं।
























