शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत ने रविवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के उस फैसले पर तीखा हमला बोला, जिसमें पार्टी के छह बागी सांसदों के एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना में विलय को मान्यता दी गई है। सावंत ने इस फैसले को संवैधानिक रूप से अवैध करार दिया और कहा कि अध्यक्ष का कार्यालय कानून से बाहर जाकर काम कर रहा है।
मानसून सत्र से पहले विपक्ष का वॉकआउट
सावंत ने बताया कि पार्टी ने अपना विरोध दर्ज कराने के लिए मानसून सत्र से पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक से वॉकआउट किया। मानसून सत्र सोमवार से शुरू हो रहा है। बैठक शुरू होने के कुछ ही मिनटों बाद विपक्षी सांसद बाहर निकल गए, हालांकि थोड़ी देर बाद वे वापस लौट आए। कई विपक्षी नेताओं ने इस विरोध को हाल ही में हुए कुछ राजनीतिक घटनाक्रमों से जोड़ा, जिसमें तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसदों का नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय की घोषणा शामिल है, वहीं शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसद अलग से एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ जुड़ गए।
वॉकआउट खत्म होने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए सावंत ने कहा कि इन बागी सांसदों के पास किसी तरह का कानूनी आधार नहीं है। उन्होंने कहा, "यह गैरकानूनी है, इसलिए हमने इसका विरोध किया है।" उनके मुताबिक न तो संविधान में और न ही दसवीं अनुसूची में ऐसा कोई प्रावधान है, जिसके तहत इस तरह के दलबदल को वैध माना जा सके।
अध्यक्ष के फैसले से शिवसेना की संख्या 13 पहुंची
सावंत की यह टिप्पणी अध्यक्ष ओम बिरला के शनिवार को लिए गए फैसले के अगले दिन आई है, जिसमें उन्होंने शिवसेना (यूबीटी) के छह बागी सांसदों के महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना में विलय को औपचारिक मंजूरी दी। इस मंजूरी के बाद शिंदे गुट की शिवसेना की लोकसभा में संख्या बढ़कर 13 हो गई है, जबकि यूबीटी सेना के पास अब लोकसभा में सिर्फ तीन सांसद रह गए हैं। यह आंकड़ा मायने रखता है क्योंकि मानसून सत्र के दौरान किस गुट को कितनी सीटें और बोलने का कितना समय मिलेगा, यह इसी संख्या से तय होता है।
इसके साथ ही अध्यक्ष ने लोकसभा में उन 20 सांसदों के लिए अलग बैठने की व्यवस्था को भी मंजूरी दी, जो तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर NCPI में विलय की घोषणा कर चुके हैं। हालांकि शिवसेना मामले के उलट, अध्यक्ष ने अब तक इन बागी तृणमूल सांसदों के NCPI में औपचारिक विलय को मंजूरी नहीं दी है, यानी यह प्रक्रिया अभी अटकी हुई है।
सावंत ने अध्यक्ष के पत्र की भाषा पर उठाए सवाल
सावंत ने कहा कि पार्टी अध्यक्ष के पत्र में इस्तेमाल की गई भाषा को बारीकी से देख रही है। उन्होंने बताया कि तृणमूल गुट को सिर्फ अलग बैठने की इजाजत दी गई है और अध्यक्ष के पत्र में इसे "विलय" नहीं बल्कि "एफिलिएशन" कहा गया है। सावंत के मुताबिक पत्र में यह भी साफ नहीं किया गया कि यह फैसला किस कानूनी प्रावधान या ढांचे के तहत लिया गया है, और यही सबसे बड़ी खामी है जिसकी जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि औपचारिक विलय को दसवीं अनुसूची के तहत सुरक्षा मिलती है, जबकि सिर्फ अलग बैठने की व्यवस्था को ऐसा कोई कानूनी संरक्षण हासिल नहीं है।
आगे की रणनीति पर उद्धव ठाकरे लेंगे फैसला
यह पूछे जाने पर कि पार्टी आगे क्या कदम उठाएगी, सावंत ने कहा कि यूबीटी सेना पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे के मार्गदर्शन में ही आगे बढ़ेगी। उन्होंने कहा, "साहेब इस मामले में अंतिम फैसला लेंगे।" सावंत के मुताबिक कानूनी या राजनीतिक स्तर पर आगे क्या कार्रवाई की जाए, इसका फैसला उद्धव ठाकरे ही करेंगे और पार्टी नेतृत्व जल्द ही इस पर कोई रुख तय करेगा।
राम मंदिर चंदा विवाद पर भी सावंत का हमला
इसके बाद सावंत ने राम मंदिर में दान से जुड़े विवाद पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में गड़बड़ी करने वाले लोग सरकार से जुड़े हुए हैं। उन्होंने भगवान राम के मंदिर में चढ़ावे और दान पेटी से चोरी, मंदिर परिसर के आसपास जमीन के प्लॉट खरीदने में गड़बड़ी, और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार व कदाचार जैसे आरोप गिनाए। सावंत ने कहा कि इन सभी मामलों में जिम्मेदार लोग सरकार से ही जुड़े हैं।
सावंत ने यह भी कहा कि राम मंदिर के उद्घाटन के समय कोई भी शंकराचार्य वहां मौजूद नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने पूरे देश की भगवान रामचंद्र के प्रति आस्था को भुनाकर सत्ता हासिल की और अब उसी आस्था को फिर से एक बाजार में तब्दील कर दिया गया है।




















