राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित प्रसिद्ध तीर्थस्थल रामदेवरा में पश्चिमी देशों से आए श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने एक बार फिर बाबा रामदेव के व्यापक प्रभाव को दर्शाया है। यूरोप के देश फ्रांस से भारत भ्रमण पर पहुंचे एक चिकित्सक दंपति ने रामदेवरा के मुख्य मंदिर में पहुंचकर बाबा रामदेव की समाधि के दर्शन किए और अपनी दीर्घकालिक आध्यात्मिक अभिलाषा को पूरा किया। मंदिर परिसर में कदम रखते ही दोनों श्रद्धालु स्थानीय भक्तिमय माहौल में रंगे नजर आए और पूरी श्रद्धा के साथ धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए।
पंचरंगी ध्वजा और मखमली चादर के साथ पूजा
फ्रांस के शार्ट शहर से आए डॉक्टर हार्ड और उनकी पत्नी डॉक्टर क्रिस्टो/क्रिस्टी रविवार के दिन रामदेवरा तीर्थ पर पहुंचे थे। राजस्थान की धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए दंपति ने हाथों में पंचरंगी ध्वजा थामी और कतारबद्ध होकर मुख्य मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश किया। वहां उन्होंने बाबा की पावन समाधि पर मखमली चादर अर्पित की और विशेष पूजा-अर्चना संपन्न कराई। समाधि स्थल के समक्ष शीश नवाते हुए दोनों ने अपने परिजनों, परिचितों और संपूर्ण विश्व के कल्याण एवं शांति की कामना की।
डिजिटल माध्यम और लक्खी मेले की ख्याति ने खींचा ध्यान
इस धार्मिक यात्रा की पृष्ठभूमि साझा करते हुए फ्रांसीसी दंपति ने बताया कि उन्हें इस स्थान की प्रेरणा डिजिटल मंचों से मिली थी। इंटरनेट पर खोजबीन के दौरान उन्हें बाबा रामदेव के जीवन दर्शन, सामाजिक समरसता के सिद्धांतों और उनसे जुड़ी चमत्कारी कथाओं के बारे में पढ़ने का अवसर मिला। इसके अलावा, उन्हें यह भी ज्ञात हुआ कि हालिया लक्खी मेले के दौरान लगभग एक करोड़ भक्तों ने यहां हाजिरी लगाई थी। जनमानस की इतनी विशाल आस्था देखकर दंपति ने संकल्प लिया था कि अपनी अगली भारत यात्रा में वे पश्चिमी राजस्थान स्थित रामदेवरा धाम अवश्य जाएंगे।
स्थानीय बाजार से स्मृति चिन्ह लेकर फ्रांस रवाना
रामदेवरा प्रवास के पलों को सहेजने के लिए विदेशी पर्यटकों ने मंदिर प्रांगण और उसके आसपास के रमणीय स्थलों पर छायाचित्र खींचे। दर्शन के उपरांत उन्होंने रामदेवरा के स्थानीय हाट-बाजार का रुख किया, जहां से धार्मिक पूजन सामग्री, बाबा का पावन प्रतीक चिन्ह और कई तरह के स्मृति चिन्ह खरीदे। यह सामग्री वे फ्रांस स्थित अपने घर ले जाने के लिए सहेज कर साथ ले गए। लोक देवता का सामाजिक सद्भाव और जनकल्याण का संदेश अब भौगोलिक सीमाओं को लांघकर सात समंदर पार भी अपनी अमिट छाप छोड़ रहा है।


















