तेजी से फैलते आधुनिक मशीनी युग में जब ज्यादातर हस्तशिल्प और पारंपरिक उद्योग संकट से जूझ रहे हैं, राजस्थान के जालोर जिले का एक छोटा सा गांव अपनी पुश्तैनी कारीगरी के दम पर एक मिसाल पेश कर रहा है। जिला मुख्यालय से लगभग 7 से 8 किलोमीटर दूर बसा लेटा गांव अपने पारंपरिक हथकरघा उद्योग के लिए विशिष्ट पहचान रखता है। यहां के बुनकर परिवार कई पीढ़ियों से बिना किसी मशीन की मदद के, अपने हाथों के जादू से विशेष प्रकार के कंबल तैयार कर रहे हैं, जिन्हें स्थानीय बोलचाल में खेसला कहा जाता है। तकनीक के इस दौर में भी लेटा के कारीगरों ने अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर को न केवल संभाल रखा है, बल्कि इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ भी बना दिया है।
शुद्ध कपास का ताना-बाना और दोनों मौसमों में उपयोगिता
लेटा गांव में तैयार होने वाले खेसलों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी शुद्धता और विशिष्ट बुनावट है। स्थानीय भाषा में कंबल के रूप में पहचाने जाने वाले ये खेसले 100 प्रतिशत शुद्ध कपास के धागों से ही बुने जाते हैं। इनमें किसी भी प्रकार के सिंथेटिक या अन्य धागों की मिलावट बिल्कुल नहीं की जाती, जिसकी वजह से इनकी बनावट और गुणवत्ता बेहद खास होती है। प्राकृतिक सूती धागों के कारण यह कपड़ा हर मौसम के अनुकूल साबित होता है। सर्दियों के दिनों में यह शरीर को जरूरी गर्माहट प्रदान करता है, वहीं गर्मियों के समय सूती धागे ठंडक और सहज आराम का अहसास कराते हैं। मौसम के अनुरूप इसी संतुलन की वजह से स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि बाहर से आने वाले यात्री और कई सरकारी अधिकारी भी खास तौर पर लेटा पहुंचकर इन पारंपरिक खेसलों की खरीदारी करते हैं।
करघे पर धागों की सधी बुनाई और बारीकी का काम
गांव के निवासी शक्तिदान बताते हैं कि खेसला निर्माण का यह काम कोई नया उद्यम नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चला आ रहा पुश्तैनी हुनर है जिसे एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को बहुत सहजता से सौंपा है। एक बेहतर खेसला तैयार करने के पीछे कारीगरों का लंबा धैर्य और कड़ी शारीरिक मेहनत छिपी होती है। निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत सबसे पहले कपास के धागों को छांटने और उन्हें तैयार करने से होती है। इसके बाद धागों को व्यवस्थित करके करघे पर बुनाई के लिए चढ़ाया जाता है। बड़ी संख्या में धागों के ताने-बाने को करघे पर लगाकर कारीगर उंगलियों के सधे संतुलन से बेहद बारीकी के साथ उनकी बुनाई पूरी करते हैं। हर एक खेसले की बनावट में कारीगर का निजी समर्पण और पीढ़ियों का तजुर्बा साफ नजर आता है।
आकार, वाजिब दाम और महिला सशक्तिकरण का जरिया
लेटा गांव के करघों पर केवल खेसले ही नहीं बनते, बल्कि यहां चादर और तौलिए जैसे अन्य जरूरी हैंडलूम उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं। आकार की बात करें तो ये पारंपरिक खेसले करीब 8 फीट लंबे और साढ़े 4 फीट चौड़े होते हैं। इनकी कीमत लगभग 500 से 1000 रुपए के बीच रहती है, जो इनकी मेहनत और प्राकृतिक शुद्धता को देखते हुए बेहद वाजिब मानी जाती है। इन उत्पादों की बिक्री स्थानीय हाट-बाजारों के अलावा अब ऑनलाइन माध्यमों से भी की जा रही है, जिससे दूर-दराज के ग्राहकों तक भी यह कारीगरी पहुंच रही है। सबसे खास बात यह है कि यह उद्योग गांव के कई परिवारों का जीवनयापन चलाता है। घर के अन्य सदस्यों के साथ महिलाएं भी धागों की तैयारी और कताई-बुनाई के काम में सक्रिय हाथ बंटाती हैं। घर बैठे मिलने वाले इस रोजगार से जहां ग्रामीण महिलाओं को संबल मिलता है, वहीं जालोर की यह गौरवशाली पहचान भी मजबूती से कायम है।



















