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हाथों के हुनर से चमकती जालोर की पहचान, लेटा गांव में शुद्ध सूती खेसलों से संवर रही आजीविकाराजस्थान
8 अक्तू॰ 2026, 6:56 pm (59 मिनट पहले)· 0

हाथों के हुनर से चमकती जालोर की पहचान, लेटा गांव में शुद्ध सूती खेसलों से संवर रही आजीविका

जालोर के निकटवर्ती लेटा गांव में कारीगर पीढ़ियों से शुद्ध कपास से पारंपरिक खेसले तैयार कर हथकरघा विरासत को जिंदा रखे हुए हैं। हर मौसम में मुफीद रहने वाले इन हथकरघा कंबलों की मांग स्थानीय खरीदारों से लेकर सरकारी अधिकारियों तक में खूब देखी जाती है।

तेजी से फैलते आधुनिक मशीनी युग में जब ज्यादातर हस्तशिल्प और पारंपरिक उद्योग संकट से जूझ रहे हैं, राजस्थान के जालोर जिले का एक छोटा सा गांव अपनी पुश्तैनी कारीगरी के दम पर एक मिसाल पेश कर रहा है। जिला मुख्यालय से लगभग 7 से 8 किलोमीटर दूर बसा लेटा गांव अपने पारंपरिक हथकरघा उद्योग के लिए विशिष्ट पहचान रखता है। यहां के बुनकर परिवार कई पीढ़ियों से बिना किसी मशीन की मदद के, अपने हाथों के जादू से विशेष प्रकार के कंबल तैयार कर रहे हैं, जिन्हें स्थानीय बोलचाल में खेसला कहा जाता है। तकनीक के इस दौर में भी लेटा के कारीगरों ने अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर को न केवल संभाल रखा है, बल्कि इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ भी बना दिया है।

शुद्ध कपास का ताना-बाना और दोनों मौसमों में उपयोगिता

लेटा गांव में तैयार होने वाले खेसलों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी शुद्धता और विशिष्ट बुनावट है। स्थानीय भाषा में कंबल के रूप में पहचाने जाने वाले ये खेसले 100 प्रतिशत शुद्ध कपास के धागों से ही बुने जाते हैं। इनमें किसी भी प्रकार के सिंथेटिक या अन्य धागों की मिलावट बिल्कुल नहीं की जाती, जिसकी वजह से इनकी बनावट और गुणवत्ता बेहद खास होती है। प्राकृतिक सूती धागों के कारण यह कपड़ा हर मौसम के अनुकूल साबित होता है। सर्दियों के दिनों में यह शरीर को जरूरी गर्माहट प्रदान करता है, वहीं गर्मियों के समय सूती धागे ठंडक और सहज आराम का अहसास कराते हैं। मौसम के अनुरूप इसी संतुलन की वजह से स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि बाहर से आने वाले यात्री और कई सरकारी अधिकारी भी खास तौर पर लेटा पहुंचकर इन पारंपरिक खेसलों की खरीदारी करते हैं।

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करघे पर धागों की सधी बुनाई और बारीकी का काम

गांव के निवासी शक्तिदान बताते हैं कि खेसला निर्माण का यह काम कोई नया उद्यम नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चला आ रहा पुश्तैनी हुनर है जिसे एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को बहुत सहजता से सौंपा है। एक बेहतर खेसला तैयार करने के पीछे कारीगरों का लंबा धैर्य और कड़ी शारीरिक मेहनत छिपी होती है। निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत सबसे पहले कपास के धागों को छांटने और उन्हें तैयार करने से होती है। इसके बाद धागों को व्यवस्थित करके करघे पर बुनाई के लिए चढ़ाया जाता है। बड़ी संख्या में धागों के ताने-बाने को करघे पर लगाकर कारीगर उंगलियों के सधे संतुलन से बेहद बारीकी के साथ उनकी बुनाई पूरी करते हैं। हर एक खेसले की बनावट में कारीगर का निजी समर्पण और पीढ़ियों का तजुर्बा साफ नजर आता है।

आकार, वाजिब दाम और महिला सशक्तिकरण का जरिया

लेटा गांव के करघों पर केवल खेसले ही नहीं बनते, बल्कि यहां चादर और तौलिए जैसे अन्य जरूरी हैंडलूम उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं। आकार की बात करें तो ये पारंपरिक खेसले करीब 8 फीट लंबे और साढ़े 4 फीट चौड़े होते हैं। इनकी कीमत लगभग 500 से 1000 रुपए के बीच रहती है, जो इनकी मेहनत और प्राकृतिक शुद्धता को देखते हुए बेहद वाजिब मानी जाती है। इन उत्पादों की बिक्री स्थानीय हाट-बाजारों के अलावा अब ऑनलाइन माध्यमों से भी की जा रही है, जिससे दूर-दराज के ग्राहकों तक भी यह कारीगरी पहुंच रही है। सबसे खास बात यह है कि यह उद्योग गांव के कई परिवारों का जीवनयापन चलाता है। घर के अन्य सदस्यों के साथ महिलाएं भी धागों की तैयारी और कताई-बुनाई के काम में सक्रिय हाथ बंटाती हैं। घर बैठे मिलने वाले इस रोजगार से जहां ग्रामीण महिलाओं को संबल मिलता है, वहीं जालोर की यह गौरवशाली पहचान भी मजबूती से कायम है।

सवाल-जवाब

लेटा गांव किस जिले में स्थित है और जालोर से कितनी दूरी पर है?
लेटा गांव राजस्थान के जालोर जिले में स्थित है और यह जालोर से लगभग 7 से 8 किलोमीटर की दूरी पर बसा है।
स्थानीय भाषा में 'खेसला' किसे कहा जाता है?
स्थानीय बोलचाल में पारंपरिक रूप से हथकरघे पर 100 प्रतिशत शुद्ध कपास के धागों से बुने जाने वाले कंबलों को खेसला कहा जाता है।
लेटा के खेसलों की मुख्य खासियत क्या है?
ये खेसले बिना किसी मिलावट के शुद्ध सूती धागों से बनते हैं, जो सर्दियों में आवश्यक गर्माहट और गर्मियों में ठंडक व आराम प्रदान करते हैं।
एक पारंपरिक खेसले की लंबाई-चौड़ाई और कीमत कितनी होती है?
ये खेसले लगभग 8 फीट लंबे और साढ़े 4 फीट चौड़े होते हैं, जिनकी कीमत करीब 500 से 1000 रुपए के आसपास रहती है।
खेसला बनाने के अलावा गांव में कौन से अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं?
खेसलों के अलावा लेटा गांव में चादर और तौलिए जैसे अन्य जरूरी हैंडलूम उत्पाद भी करघों पर तैयार किए जाते हैं।
गांव के परिवारों में इस उद्योग से कौन-कौन जुड़ा हुआ है?
यह उद्योग कई परिवारों की आजीविका का मुख्य साधन है, जिसमें घर पर रहकर महिलाएं और अन्य सदस्य धागा व्यवस्थित करने और बुनाई में सहयोग करते हैं।
लेटा के खेसले खरीदने के लिए कौन से माध्यम उपलब्ध हैं?
इन खेसलों को सीधे लेटा गांव आकर स्थानीय स्तर पर खरीदा जा सकता है और इन्हें ऑनलाइन माध्यम से भी मंगवाया जा सकता है।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·33 मिनट पहले

लेटा गांव जाने पर उन करघों की आवाज़ आज भी कानों में गूंजती है। वहां के लोगों ने मशीनों के दौर में भी अपने हाथ के हुनर को जिंदा रखा है, और वो शुद्ध सूती खेसले वाकई कमाल के होते हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·33 मिनट पहले

करण भाई, 500 से 1000 रुपये में ऐसा शुद्ध सूती कंबल मिलना वाकई हैरान करने वाला है, आज के वक्त में इतनी मेहनत का इतना कम दाम मिलता है।

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